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Tuesday, May 28, 2019

जैन धर्म में अरिहंत का स्वरुप

जैन धर्म में अरिहंत  का स्वरुप 

ज्योति कोठारी

अरिहंत जैन मान्यतानुसार विश्व ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च सत्ता है. व्युत्पत्तिगत रूप से अरिहंत शब्द के तीन रूप हैं - अरिहंत, अर्हन्त, अरुहन्त। नवकार मन्त्र के प्रथम पद में अरिहंतों को नमस्कार किया गया है. उनके १२ गुण होते हैं. अर्हन्त तीर्थंकर भी कहलाते हैं और वे धर्म तीर्थ की स्थापना करते हैं. साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका रूप  चतुर्विध संघ जंगम धर्म तीर्थ कहलाता है. भरत क्षेत्र में इस काल में श्री ऋषभ देव से लेकर महावीर स्वामी तक कुल २४ तीर्थंकर हुए हैं.



अरिहंत शब्दार्थ एवं व्याख्या 

अरि अर्थात शत्रु एवं हन्त अर्थात नष्ट करनेवाले. अतः जिन्होंने अपने आतंरिक शत्रुओं राग-द्वेष को सम्पूर्ण रूप से नष्ट किया है वे अरिहंत कहलाते हैं. प्रकारांतर से जिन्होंने अपने ४ घाती कर्म ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय, एवं अन्तराय को क्षय कर केवल ज्ञान प्राप्त किया है वे अरिहंत हैं. वे वीतराग, सर्वज्ञ, एवं सर्वदर्शी भी हैं. 

अर्हन्त शब्दार्थ एवं व्याख्या

अर्ह शब्द का पूजा के अर्थ में व्यवहार होता है. अर्थात अर्ह वो है जिसकी पूजा होती हो. जो तीनलोक में पूज्य हैं; देवेन्द्र व नरेंद्र भी जिनकी पूजा अर्चना करते हैं वे परम पूज्य परमेष्ठी अर्हन्त हैं. उनके ४ मूल अतिशय, ८ प्रातिहार्य एवं कुल ३४ अतिशय, व वाणी के ३५ गुण होते हैं. वे डिवॉन के द्वारा रचित समवशरण में स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हो कर १२ पर्षदा के सामने देशना अर्थात धर्मोपदेश देते हैं. उस समय देव पुष्प वृष्टि करते हैं और देव दुंदुभि का निनाद करते हैं.


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