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Sunday, February 24, 2019

सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 7

अथ द्वादस पुष्पवर्षा पूजा
[दूहा-मल्हार]
वरषै  बारमी पूज मेंकुसुम बादलिया फूल II
हरण ताप सवि लोक कोजानु समा बहु मूल II  II

यह बारहवीं पुष्पवर्षा पूजा है. जगत के सभी ताप को दूर करने के लिए फूल बादल बन कर इतने बरसे की धरती घुटने तक फूलों से भर गई. 

[राग-भीम मल्हार गुंड़मिश्र-देशी कड़खानी]
मेघ बरसै भरीपुप्फ वादल करी,
जानु परिणाम करि कुसुम पगरं II
पंच वरणें बन्योविकच अनुक्रम चन्यो,
अधोवृंतें नहु=नहीं पी पसरं II मेo II  II
वास महके मिलैभमर भमरी भिले,
सरस रसरंग तिणि दुख निवारी I
जिनप आगे करैसुरप जिम सुख वरै,
बारमी पूज तिण पर अगारी II मेo II  II

फूलों का बादल बना है ऐसा मेघ बरस रहा है और घुटने तक फूल भर गया है. पांच रंगों के फूल  इस प्रकार से स्थित हैं की जिनमे उनकी डंडियां नीचे की तरफ हैं (और पंखुड़ियां ऊपर की ओर) और (जिनेश्वर देव के अतिशय से) उन्हें कोई पीड़ा भी नहीं होती है (१). (उन फूलों की) खुशबू से, महक से भौंरे -भौंरी आ कर (उनका  रसपान कर रहे हैं). यह सरस रसरंग दुःख निवारण करनेवाला है. सुरपति इंद्र ने जिनपति के आगे इस प्रकार पुष्पवर्षा की उसी प्रकार बारहवीं पूजा में श्रावक भी करते हैं (२). 
[राग-भीम मल्हार]
पुप्फ वादलिया वरसे सुसमां II अहो पुo II 
योजन अशुचिहर  वरसे गंधोदकमनोहर जानु  समा II अहो पुo II  II
गमन आगमन कुं पीर नहीं तसु, इ जिनको अतिशय गुनें II
गुंजत गुंजत मधुकर इम पभणेमधुर वचन जिन गुण थुणे II  II
कुसुमसु परिसेवा जो करैतसु पीर नहीं सुमिणे II
समवसरण पंचवरण अधोवृन्तविबुध रचे सुमनां सुसमां II पुo II  II
बारमी पूज भविक तिम करेकुसुम विकसी हसी उच्चरे II
तसु भीम बंधन अधरा हुवे,  जे करै जै जिन नमा II पुo II  II
सुखकारक पुष्प के बादल बरस रहे हैं. योजन प्रमाण भूमि के अशुचि को हरण करनेवाला गंधोदक भी बरस रहा है. घुटने तक मनोहर फूल बरस गया है (१). इन पुष्पों के ऊपर आने-जाने वालों से इन्हे किसी प्रकार की पीड़ा नहीं होती यह जिनेश्वर देव का अतिशय है. इन फूलों पर भौंरे गुंजराव कर रहे हैं मानो मधुर वचन से जिनेश्वर देव के गन गा रहे हों (२). फूलों से जो (तीर्थंकर परमात्मा की) सेवा अर्थात पूजा करता है उसका मन प्रसन्न रहता है और उसे किसी भी प्रकार की पीड़ा नहीं होती. समवशरण में देवगण पांच रंगों के सुखदायक अधोवृन्त फूलों की यह रचना करते हैं अर्थात यह देवकृत अतिशय है (३). (जिस प्रकार देवों ने किया) उस प्रकार जो भव्य जीव बारहवीं पूजा में पुष्पवर्षा करता है और विकसित पुष्प के समान आनंदित हो कर (प्रभगुण) का उच्चारण करता है और जिनेश्वर देव का जय जयकार करते हुए उन्हें नमन करता है उसके (कर्मों के) दृढ एवं भयानक वंधन ढीले हो जाते हैं (४). 


अथ त्रयोदश अष्ट मंगल पूजा
[दूहा-कल्याण राग]
तेरमि पूजा अवसरेमंगल अष्ट विधान Ii
युगति रचे सुमंतें सहीपरमानंद निधान II  II

तेरहवीं पूजा में अष्टमंगल का विधान है. कुशलता पूर्वक शुभमति से (यह पूजा करने पर) परमानन्द रूप निधान की प्राप्ति होती है. 
{राग-वसंत]
अतुल विमल मिल्याअखंड गुणे भिल्यासालि रजत तणा तंदुला  II
श्लषण समाजकंविचि पंच (पञ्चविध) वरणकंचन्द्रकिरण जैसा ऊजला  II
मेलि मंगल लिखैसयल मंगल अखेजिनप आगें सुथानक धरे  II
तेरमि पूजविधि ते रमि मन मेरेअष्ट मंगल अष्ट सिद्धि करे  II o II  II

अतुलनीय, निर्मल, अखण्ड आदि गुणों से परिपूर्ण एवं चन्द्रकिरण के सामान उज्जवल शालि धान्य, चावल, चांदी के चावल आदि पांच रंगों के धान से अष्ट मंगल लिख (आलेखन कर) जिनपति के आगे अच्छे स्थान में रखनेवाले के सभी मंगल अक्षय होते हैं. यह तेरहवीं पूजा मेरे मन में रम गई है. अष्ट मंगल अष्ट सिद्धि प्रदान करनेवाली है. 
 [राग-कल्याण]
हां हो तेरी पूजा बणी है रसमें II
अष्ट मंगल लिखैकुशल निधानंतेज तरणि के रसमें II हांo II  II
दप्पण भद्रासण नंद्यावर्त्त पूर्ण कुंभमच्छयुग श्रीवच्छ तसु मे II
वर्द्धमान स्वस्तिक पूज मंगलकीआनंद कल्याण सुखरसमें II हांo II  II

हे प्रभु तुम्हारी पूजा बड़ी रसीली है. अष्टमंगल का आलेखन करने से कुशल मंगल रूप संपत्ति और सूर्य के समान तेज प्राप्त होता है।  कल्याण राग में गेय इस पूजा में दर्पण, भद्रासन, नंद्यावर्त, पूर्णकलश, मत्स्य युगल, श्रीवत्स, वर्द्धमान एवं स्वस्तिक  इन अष्ट मंगलों से पूजा करने से आनंद, कल्याण एवं सुखरस की प्राप्ति होती है. 



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