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Sunday, February 24, 2019

सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 6

अथ दशमी आभरण पूजा
[राग-केदार में दूहा]
शिर सोहे जिनवर तणेरयण मुकुट झलकंत II
तिलक भाल अंगद भुजाश्रवण कुंडल अतिकंत II  II 
दशमी पूजा आभरणरचना यथा अनेक II
सुरपति प्रभु अंगे रचेतिम श्रावक सुविवेक II  II

रत्नों से बना हुआ देदीप्यमान मुकुट जिनवर के मस्तक में शोभायमान है, ललाट में तिलक, बांहों में अंगद (बाजूबंद), और कानों में कुण्डल बहुत ही प्रिय और मनोरम है (१). यह दसवीं पूजा आभूषण की है, जिसमे अनेक प्रकार से प्रभु की (अंग) रचना की जाती है. जिसप्रकार सुरपति अर्थात देवराज इंद्र ने प्रभु के अंगों को (सजाया था)  उसी प्रकार श्रावक भी विवेक पूर्वक यह कार्य करे (२). 

[राग -गुंड मल्हार]
पांच पीरोजा नीलू लसणीयामोती  माणकने लाल रसणीया,
हीरा सोहे रेमन मोहे रे,
धूनी चूनी पुलक करकेतनांजातरूप सुभग अंक अंजना,
मन मोहे रे II  II
मौलि मुकुट रयणें जडयोकाने कुंडल जुगते जुड़यो II
उरहारु रे मनवारु रे II  II
भाल तिलक बांहे अंगदाआभरण दशमी पूजा मुदा II
सुखकारु रेदुखहारू रे II  II

पांच प्रकार के रत्न, अथवा सभी रत्न पांच पांच की संख्या में फ़िरोज़ा, नीला, लसनिया, मोती, मानक, हीरा, आदि सभी शोभते हैं और मन को मोह रहे हैं. चुन्नी (मानक का एक रूप), तामड़ा, कर्केतक, सोना, अंजन रत्न, आदि मनोहारी एवं सौभाग्यसूचक रत्न मन को मोह रहे हैं (१). मस्तक में मुकुट रत्नों से जड़ा हुआ है, कानों में कुण्डल बहुत ही  बनाया गया है, (इनकी शोभा) ह्रदय का हरण करनेवाली है, और मन इनपे न्यौछावर हो जाता है (२). ललाट पे तिलक, और बाँहों में बाजूबंद, (ये सभी) आभरण (आभूषण) यह दशमी पूजा प्रमुदित करनेवाली है. सुख करनेवाली एवं दुःख हरनेवाली है (३). 

[राग-केदार]
प्रभु शिर सोहेमुकुट मणि रयणे जड्यो II
अंगद बांह तिलक भालस्थलयेहु देखउ कोन घडयो II प्रo II  II
श्रवण कुंडल शशि तरणि मंडल जीपेसुरतरु सम अलंकरयो II
दुख केदार चम सिंहासण,छत्र शिर उवरि धरयो,
अलंकृति उचित वरयो II  II

प्रभु के मस्तक पर मणि रत्नों से जड़ित मुकुट शोभायमान है. बाँहों में बाज़ू बंद, ललाट में तिलक (की शोभा) देख कर कवि आश्चर्य से चकित पूछते हैं की इन्हे किसने बनाया? (१) कानों में कुण्डल चन्द्रमा और सूर्य की भी काँटी को जीतने वाली अर्थात उस से भी अधिक है, और प्रभु कल्पवृक्ष के सामान (अलंकारों से) अलंकृत हैं.  दुखों को नष्ट करने वाले केदार राग में गेय (केदार शब्द का द्विअर्थी प्रयोग) यह पूजा है. प्रभ चामर, सिंहासन अदि (प्रातिहार्यों से) सुशोभित हैं और शिर के ऊपर छत्र धरा हुआ है, इस प्रकार प्रभु श्रेष्ठ आभूषणों से उचित प्रकार से अलंकृत हैं (२). 

अथ एकादश फूलधर पूजा
[दूहा]
फूलधरो अति शोभतो, फुन्दे  लहके फूल II
महके परिमल महमहेग्यारमी पूज अमूल II  II

फूलों से शोभित घर (फूलघर) अत्यंत शोभायमान है जिस्म फंडों में फूल खिल रहा है. यहाँ पर "महके परिमल महमहे" तीनों लगभग समानार्थक हैं और खुशबू की आत्यंतिक अवस्था का वोध कराने के लिए  शब्दों का एक साथ प्रयोग किया गया है. भावार्थ ये है की फूलघर के फूलों की विशिष्ट सुवास चारों दिशाओं में तेजी से फ़ैल रही है. यह ग्यारहवीं पूजा अनमोल है. 


{राग-रामगिरि कौतिकीया]
कोज अंकोल रायबेली नव मालिका,
कुंद मचकुंद वर विचकूल  हांरे अइयो विचकूल  II
तिलक दमण दलं मोगरा परिमलं,
कोमल पारिधि पाडलु हांरे अइयो  चोरणूं   II  II

कोज, अंकोल अर्थात ढेरा या थेल नामक फूल(एलैजियम सैल्बीफोलियम या एलैजियम लामार्की), रायबेली, नवमल्लिका, चमेली, नागचम्पा,  और श्रेष्ठ विचकूल फूल, तिलिया, दौना, मोगरा आदि की खुशबु से महकता हुआ, और कोमल परिध एवं पाडल का फुल चित्त को चुरानेवाला है. 

[राग-कौतिकिया रामगिरि]
मेरो मन मोह्योफूलघरे आणंद झिले II
असत उसत दाम वघरी मनोहर,
देखत सबही दुरित खीले II फूo II  II
कुसुम मंडप थंभ गुच्छ चंद्रोदय,
कोरणि चारु विमाणि सझे II
इग्यारमी पूज भणी हे रामगिरि,
विबुध विमाण जिको तिपुरी भजे II फूo II  II


फूलघर ने मेरे मन को मोह लिया है और आनंद से तृप्त कर दिया है. दाम अर्थात फूलों की माला, बघरी अर्थात फूलों की बंगड़ी बना कर (फूलघर सजाया गया है जिसे) देख कर सभी पाप खीर गए अर्थात जहर गए या नष्ट हो गए. फूलघर में पुष्प का मंडप बनाया गया है,  खम्भों को पुष्प गुच्छ से सुसज्जित किया गया है और उसमे चँदवा भी लगाया गया है. सुन्दर मनमोहक कोरनी से इसे (देव) विमान सदृश सजाया गया है. यह ग्यारहवीं पूजा रामगिरि राग में गाई गई है और यह पूजा ऐसी है जैसे देव विमान में इंद्र प्रभु की स्तवन करते हैं. 


सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 3

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