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Saturday, February 23, 2019

सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 5


अथ अष्ठम गंधवटी पूजा
 (प्रक्षिप्त) [दूहा राग-सोरठ]
सोरठ राग सुहामणी, मुखें न मेली जाय II
ज्युं ज्युं रात गलंतियां, त्यूं त्यूं मीठी थाय II १ II
सोरठ थारां देश में, गढ़ां बड़ो गिरनार II
नित उठ यादव वांदस्यां, स्वामी नेम कुमार II २ II
जो हूंती  चंपो बिरख, वा गिरनार पहार II
फूलन हार गुंथावती, चढ़ती नेम कुमार II ३ II
राजीमती गिरवर चढ़ी, उभी करे पुकार II
स्वामी अजहु न बाहुडे, मो मन प्राण आधार II ४ II
रे संसारी प्राणिया, चढ्यो न गढ़ गिरनार II
जैन धर्म पायो नही,गयो जमारो हार II ५ II
धन वा राणी राजीमती, धन वे नेम कुमार II
शील संयमता आदरी, पहोतां भवजल पार II ६ II
दया गुणांकी वेलडी, दया गुणांकी खान
अनंत जीव मुगते गया, दया तणे परमाण II ७ II
जगमें तीरथ दोइ बडा,  सेत्रुंजो गिरनार II
इण गिर रिषभ समोसर्या, उण गिर नेम कुमार II ८ II (प्रक्षिप्त)

सत्रह भेदी पूजा में यहाँ दोहे की जगह सोरठा है जिसका छंद दोहे से उल्टा होता है. सोरठा का सम्वन्ध सोरठ से जोड़ कर यहाँ पर बाद के काल में उपरोक्त छंद (प्रक्षिप्त) जोड़ दिए गए, यह मूल पूजा का अंश नहीं है.  
[दोहा-सोरठ]
अगर सेलारस सार, सुमति पूजा आठमी II
गंधवटी घनसार, लावो जिन तनु भावशुं II १ II

जिनेश्वर देव के शरीर को भावपूर्वक गंधवटी से पूजन करने रूप यह आठवीं पूजा सुमति प्रदान करनेवाली है. अगर, सीलारस, बरास आदि सुगन्धित द्रव्य से प्रभु की पूजा का अधिकार (शास्त्रों में वर्णित) है.  

[राग-सामेरी]
कुंद किरण शशि उजलो जी देवा,
पावन घन घन सारो जी II
आछो सुरभि शिखर मृग नाभिनो जी देवा,
चुन्न रोहण अधिकारे जी II आo II
वस्तु सुगंध जब मोरिये जी देवा,
अशुभ करम चुरीजे जी II आo II
आंगण सुरतरु मोरिये जी देवा,
तब कुमति जन खीजे जी II
तब सुमति जन रीझे जी II १ II


चन्द्रमा के किरण के सामान उज्जवल व पवित्र घनसार अर्थात बरास, सभी सुगंधियों में श्रेष्ठ कस्तूरी, चन्दन का चूर्ण, आदि से मिलकर गंधवटी (बनती है). जब परमात्मा के सुगन्धित वस्तु से विलेपन किया जाता है तब वह विलेपन करनेवाला अपने अशुभ कर्म को चूर्ण अर्थात नष्ट करता है यहाँ मोरिये का अर्थ युद्ध में मोर्चा अर्थात व्यूह रचना से है. पूजा करनेवालों के आँगन में सुरतरु अर्थात कल्पवृक्ष पुष्पित हुआ है (यहाँ मोरिये का अर्थ पुष्पित होना है), और  तब कुमति अर्थात कुबुद्धि जन को खीझ उत्पन्न होती है और सुमति जनों को हर्ष उत्पन्न होता है.    
[राग-सामेरी]
पूजो री माई, जिनवर अंग सुगंधे II जिo II पूo II
गंधवटी घनसार उदारे, गोत्र तीर्थंकर बांधे II पूo II १ II
आठमी पूज अगर सेलासर, लावे जिन तनु रागे II
धार कपूर भाव घन बरखत, सामेरी मति जागे II पूo II २ II  


जिनवर का अंग सुगन्धित है उसे सुगंध से पूजो। बरास आदि उत्तम पदार्थों से युक्त गंधवटी से पूजन करने वाला तीर्थंकर गोत्र का वंध करता है. आठवीं पूजा में अगर, शिलारस, कपूर आदि द्रव्यों को प्रशस्त राग से प्रभु के शरीर में विलेपन करते हैं. कपूर की धारा के साथ जैसे सघन भावों की वर्षा होती है. सामरी राग में गेय यह पूजा अपनी मति अर्थात बुद्धि को जगानेवाली है.  

अथ नवम ध्वज पूजा
[दुहा]
मोहन ध्वज धर मस्तकेंसुहव गीत समूल II
दीजें तीन प्रदक्षिणानवमी पूज अमूल II  II

मन मोहने वाले ध्वज को मस्तक पे धारण कर (सुहा राग) सुंदर गीत गाते हुए, तीन प्रदक्षिणा दे कर यह पूजा की जाती है और यह अमूल्य पूजा है.  


[राग-गोडी में वस्तु छंद]
सहस जोयण सहस जोयण हेममय दंड,
युत पताक पंचे वरण II
घुम घुमंत घूघरी वाजे,
मृदु समीर लहके गयणं II
जाणि कुमति दल सयल भांजे (१)
सुरपति जिम विरचे ध्वज नवमी पूज सुरंग II
तिण परि श्रावक ध्वज वहनआपे दान अभंग II २ II

एक हज़ार योजन ऊँचा सुवर्णमय दंड, पांच रंग की पताकाओं से युक्त, जिसमे घूम घूम कर घुंगरू वज रहे हैं, आकाश में हलकी हलकी कोमल हवा बह रही है, मनो सभी कुमति के समूह को  नष्ट करनेवाली हो (१), देवराज इंद्र ने जिस प्रकार इंद्र ध्वज की रचना की थी वैसे ही श्रावक भी ध्वज का वहन कर, वो ऐसा दान करता है जिसका कोई अंत नहीं. (२)


[राग नट्ट -नारायण]
जिनराज को ध्वज मोहनांध्वज मोहना रे ध्वज मोहना II जिo II
मोहन सुगुरु  अधिवासियोकरि पंच सबद त्रिप्रदक्षिणा I
सधव वधू शिर सोहणा II जिo II  II
भांति वसन पंच वरण वण्यो रीविध करि ध्वज को रोहणां II
साधु भणत नवमी पूजा नव, पाप नियाणां खोहणां II
शिव मन्दिरकुं अधिरोहणाजन मोह्यो नट्टनारायणा II जिo II  II

जिनेश्वर देव का ध्वज मन मोहनेवाला है. मोह को नष्ट करनेवाले सुगुरु के द्वारा अधिवासित (अर्थात वासक्षेप डाल कर), सधवा स्त्री के शिर पर शोभायमान ध्वज को ले कर पांच प्रकार के (वजित्रों के) शब्द करते हुए तीन प्रदक्षिणा दे कर (१) पांच रंग के कपडे से बने हुए ध्वज को  विधि पूर्वक चढ़ाना है. साधुकीर्ति कहते हैं यह नवमी पूजा नौ प्रकार के पाप निदान (नियाणा) को नष्ट करनेवाली है, मोक्ष मंदिर में चढानेवाली है. "नट्टनारायण" राग में गेय यह पूजा जन मन को मोहनेवाली है. 

अनुवादक:  ज्योति कुमार कोठारी

सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 3


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