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Tuesday, February 12, 2019

सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 4


अथ छट्ठी मालारोहण पूजा
[राग - आशावरी में दूहा]
छट्ठी पूजा ए छती, महा सुरभि पुफमाल  II
गुण गूंथी थापे गले, जेम टले दुखजाल II १ II


अत्यंत सुगन्धित पुष्पों की माला की यह छठी पूजा है. ये पुष्पमाला जैसे गुणों को माला है जिसे प्रभु के गले में डालने से दुखों का जाल टल जाता है. 
[राग -रामगिरि गुर्जरी]
हे नाग पुन्नाग मंदार नव मालिका,
हे मल्लिकासोग पारिधि कली ए I१I 
हे मरुक दमणक बकुल तिलक वासंतिका,
हे लाल गुलाल पाडल  भिलि  ए I२I
हे जासुमण मोगरा बेउला मालती,
हे पंच वरणे गुंथी मालथी ए I३I
हे माल जिन कंठ पीठे ठवी लहलहे,
हे जणि संताप सब पालती ए II४II

नाग चम्पा, सुल्तान चंपा अर्थात नागकेशर, नंदनवन के पांच पुष्पों में से एक मंदार, नवमालिका- बेली जैसा एक फूल, मल्लिका, अशोक, एवं परिध की कली, (१) मरुवा, दौना, (एक पीले रंग का फूल) वकुल, तिलक या तिलिया (एक सफ़ेद रंग का फूल), वासंतिका- नवमल्लिका, लाल फूल, गुलाब, पाडल अर्थात जवा, आदि फूलों को इकठ्ठा कर (२)  मोगरा, बेली, मालती आदि पांच रंगों के फूलों की माला गूँथ कर (प्रभु के कंठ में पहनाते) हैं  (३) यह माला जिनेश्वर प्रभु के कंठ स्थान में लहलहाती है, और सभी लोगों के संताप को दूर करती है (४) 

[राग-आशावरी]
देखी दामा कंठ जिन अधिक एधति नंदे,
चकोरकुं देखि देखि जिम चंदे II
पंचविध वरण रची कुसुमा की,
जैसी रयणावली सुहमीदें II देo II १ II
छठी रे तोडर पूजा तब डर धूजे,
सब अरिजन हुइ हुइ तिम छंदे II
कहे साधुकीरति सकल आशा सुख,
भविक भगति जे जिण वंदे II देo II २ II


जैसे चन्द्रमा को देख कर चकोर हर्षित होता है वैसे जिनवर देव के कंठ में माला (दामा) अत्यंत अधिक आनंद होता है. पांच प्रकार के वर्णों के पुष्पों की माला ऐसी शोभायमान है जैसे रत्नों की आवली अर्थात लाइन बनाई गई हो (१). यह छठी पूजा पुष्पमाला अर्थात टोडर की है, यह पूजा करनेवालों से सभी प्रकार के डर भी डर जाते हैं और सभी शत्रु भी भयभीत हो जाते हैं. आशावरी राग में गाये जाने वाली इस पूजा में साधुकीर्ति कहते हैं की जो भाविक जान भक्तिपूर्वक जिनदेव की पूजा करता है उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं और सभी सुखों की प्राप्ति होती है.(२)  

अथ  सप्तम वर्णपूजा प्रारंभ:
[दूहा]
केतकि चंपक केवडा, शोभे तेम सुगात II
चाढो जिम चढतां हुवे, सातमियें सुखशात II १ II


केतकी, चम्पा, केवड़ा, आदि पुष्पों से परमात्मा का सुन्दर शरीर शोभायमान हो रहा है. सातवीं पूजा में इन फूलों को चढ़ाते हुए (भावों की उच्च श्रेणी) चढ़ कर सुख एवं साता को प्राप्त करते हैं. 
[राग - केदार गोडी]
कुंकुम चरचित विविध पंच वरणक, कुसुमस्युं हे I
कुंद गुलाबस्युं चंपको दमणको, जासुस्युं ए II
सातमी पूजमें आंगिये अंगि, अलंकियें ए II
अंगी आलंकि मिस मानिनी मुगती आलिंगियें  ए II १ II


केशर से पूजन कर पञ्च वर्ण के चमेली, गुलाब, चम्पा, दौना जवा, आदि विविध पुष्पों से सातवीं पूजा में प्रभु के अंग में आंगी की रचना कर उसे अलंकृत करते हैं. आंगी की रचना कर मानो मुक्ति का आलिंगन करते हैं. 
[राग भैरवी]
पंच वरण अंगी रची, कुसुमनी जाती II  फूलनकी जाती II पंo II
कुंद मचकुंद गुलाब सिरोवरी (शिरोमणि), कर करणी सोवन जाती II पंo II
दमणक मरुक पाडल अरविंदो, अंश जूही वेउल वाती II पंo II १ II
पारिधि चरणि कल्हार मंदारो, वर्ण पटकुल  बनी भांति II पंo II
सुरनर किन्नर रमणि  गाती, भैरव कुगति व्रतति दाती II पंo II २ II  


विभिन्न जातियों के पांच रंगों के फूलोंसे आंगी बनाते हैं. चमेली, कनकचंपा, गुलाब के फूलों को शिर के ऊपर;  दौना, मरुवा, पाटली, कमल, आदि कंधे पर और जूही एवं बेलि सुगंध फैला रही है, पीला या सफ़ेद कमल, मंदार एवं पाटल आदि चरणों में शोभायमान हैं. देव, मनुष्य, किन्नर आदि की मनोरम स्त्रियां (प्रभु के गीत) जाती हैं और भैरव  गेय यह पूजा कुगति रूपी लताओं को काटने के लिए यह दांती (हंसिया) के समान है.   
अनुवादक:  ज्योति कुमार कोठारी

सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 3 


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