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Friday, February 8, 2019

सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 3



  अथ चतुर्थ वासक्षेप पूजा
[राग - गोडी में दोहा]
पूज चतुर्थी इणि परें, सुमति वधारे वास II
कुमति कुगति दूरे हरे, दहे मोह दल पास II १ II


अर्थ: वासक्षेप अर्थात सुगन्धित द्रव्य की यह चौथी पूजा सुमति अर्थात सुबुद्धि को बढ़ानेवाली है. यह पूजा मोह के समूह रूप वंधन का दहन करनेवाली एवं कुमति व कुगति को दूर करनेवाली है. 
[राग सारंग]
हांहो रे देवा बावन चंदन घसि कुंकुमा,
चूरण विधि विरचि वासु ए II हांo I१I
कुसुम चूरण चंदन मृगमदा,
कंकोल तणो अधिवासु ए II हांo I२I
वास  दशो दिशि वासतें,
पूजे जिन अंग उवंगु ए II हांo I३I
लाछी भुवन अधिवासिया ए,
अनुगामिक सरस अभंगु ए II४II  


अर्थ: हे देव! जिस प्रकार इंद्र (वासव-वासु) ने चूर्ण बना कर (प्रभु की पूजा की थी वैसे) बाबना चन्दन कुंकुम (केशर) के साथ घसकर (१) पुष्पों का चूर्ण, कंकोल, कस्तूरी, एवं पुनः चन्दन मिलकर अधिक सुगन्धित कर (२)देशों दिशाओं को सुगन्धित करते हुए जिनवर के अंग उपांग की पूजा करते हैं (३). यह पूजा जगत के जीवों के लिए सरस एवं अभंग ऐसे मोक्ष पद का अनुगमन करानेवाली है.     
[राग -गोडी तथा पूर्वी]
मेरे प्रभुजी की पूजा आणंद मिले, मेरे प्रभुजी की II मेo II
वास भुवन मोह्यो सब लोए, संपदा भेलें की II पूजाo II १ II
सतर प्रकारे पूजे विजय, देवा तत्ता थेई II
अप्रमित गुण तोरा चरण सेवा की II पूजाo II २ II
कुंकुम चंदनवासें पूजीयें, जिनवर तत्ता थेई II
चतुर्गति दुख गौरी चतुर्थी धनकी II पूजाo ३ II


अर्थ: मेरे प्रभु की पूजा से आनंद मिलता है. (वासक्षेप के) सुगंध ने सम्पूर्ण जगत का मन मोह लिया है, (और प्रभु की पूजा से) सम्पदाएँ भी मिलती है (१). तत्ता थेई नृत्य करते हुए विजय देव ने सत्रह प्रकार से प्रभु की पूजा की थी. प्रभु आपके चरणों की सेवा करने से अपरिमित गुणों की प्राप्ति होती है (२). "गौरी राग: में गेय इस चौथी पूजा में केशर- चन्दन आदि सुगन्धित द्रव्यों से प्रभु की पूजा करने से चतुर्गति रूप दुःख का नाश होता है और (मोक्ष रूपी) धन की प्राप्ति होती है. 

अथ पंचम पुष्पारोहण पूजा
[दूहा]
मन विकसे तिम विकसतां, पुष्प अनेक प्रकार II
प्रभु पूजा ए पंचमी, पंचमी गति दातार II १ II


जिस प्रकार पुष्प विकसित होता है उसी प्रकार (अनेक प्रकार पुष्पों से प्रभु पूजा करने से) मन भी विकसित होता है. प्रभु की ये पंचमी पूजा है और यह पञ्चमी अर्थात मोक्ष गति प्रदान करनेवाली है. 
[राग -कामोद]
चंपक केतकी मालती ए, कुंद किरण मचकुंद II
सोवन जाइ जूहीका, बिउलसिरी अरविंद II १ II
जिनवर चरण उवरि धरे ए, मुकुलित कुसुम अनेक II
शिव - रमणी सें वर वरे, विधि जिन पूज विवेक II २ II


चम्पक, केतकी, मालती, चंद्र के सामान उज्जवल श्वेत किरणवाली मचकुन्द, जाई, जूही, बेली, श्री, कमल आदि अनेक प्रकार के खिले हुए पुष्प (१) जिनवर के चरणों में चढाने से एवं विधि व विवेक पूर्वक जिनपूजा करने से (वह श्रावक) श्रेष्ठ शिव रमणी को वरन करता है (२).    
[राग कानड़ो]
सोहेरी माई वरणे मन मोहरी माई वरणे II
विविध कुसुम जिन चरणे II सोo II
विकसी हसि जंपें साहिबकुं, राखि प्रभु हम सरणें II सोo II १ II
पंचमी पूज कुसुम मुकुलित की, पंच विषय दुख हरणे II सोo II
कहे साधुकीरति भगति भगवंत की, भविक नरा सुख करणे II सोo II २ II

मेरे प्रभु (विभिन्न) वर्णों से शोभायमान हो रहे हैं, इन वर्णों की छटा से मेरा मन मोह रहा है. विविध प्रकार के (पंचवर्णी) पुष्प प्रभु के चरणों में (शोभायमान हो रहे हैं). यह विकसित फूल मानो हंस कर यह कह रहे हैं की हे प्रभु आप हमें अपने शरण में रखिये(१). खिले हुए फूलों की यह पांचवीं पूजा पांच इन्द्रिय विषयों के दुःख का हरण करनेवाली है. यहाँ साधुकीर्ति कह रहे हैं की परमात्मा की भक्ति भाविक जीवों के सुख का कारण है (२). 
                                                              अनुवादक: ज्योति कुमार कोठारी 



सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 2



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