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Tuesday, February 5, 2019

सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 2

अनुवादक: ज्योति कुमार कोठारी 

सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग १ में पहली न्हवण पूजा का अर्थ प्रकाशित किया था, अब इसी क्रम में भाग २ के अंतर्गत दूसरी विलेपन एवं तीसरी वस्त्रयुगल पूजा के भावार्थ करने का प्रयास कर रहा हूँ.  


अथ द्वितीय विलेपन पूजा
[राग-रामगिरि]
गात्र लूहे जिन मनरंगसुं हो देवा l गाo II
सखरी सुधूपित वाससुं हांरे देवा वाससुं II
गंध कसायसुं मेलीयें, नंदन चंदन चंद मेलीयें रे देवा  II नंo II
मांहे मृगमद कुंकुम भेलीये, कर लीये रयण पिंगाणी कचोलियें I१ I
पग जानु कर खंधे सिरें रे, भाल कंठ उर उदरंतरे II
दुख हरे हांरे देवा सुख करे, तिलक नवंगि अंग कीजिये I२I
दूजी पूजा अनुसरे, हरि विरचे जिम सुरगिरे II
तिम करे जिणि परि जन मन रंजीये II३II


अर्थ: परमात्मा की अंगलुंछ्ना अर्थात स्नान के बाद शरीर को पोंछने में ही मन रंग गया है. सुगन्धित चूर्ण (वासक्षेप) को धूपित कर उसमे गंध, कषाय, चन्दन आदि मिला कर, (उसे और अधिक सुगन्धित करने हेतु) उसमे कस्तूरी एवं कुमकुम मिला कर स्वर्ण-रत्न जड़ित कटोरी में भर हाथ में लेकर (१) (जिन प्रतिमा के) चरण, जानु, हाथ, कंधे, मस्तक, ललाट, कंठ, नाभि इन नव अंगों में तिलक करना है. (यह तिलक) दुःख हरनेवाला एवं सुख करनेवाला है (२). जिस प्रकार मेरुपर्वत (सुरगिरि) पर इंद्र ने (परमात्मा के शरीर) पर विलेपन किया था उसी प्रकार दूसरी पूजा में विलेपन करते हैं. ऐसा करके जन मन हर्षित होता है.  
[राग-ललित दुहा]
करहुं विलेपन सुखसदन, श्रीजिनचंद शरीर II
तिलक नवे अंग पूजतां, लहे भवोदधि तीर II १ II
मिटे ताप तसु देहको, परम शिशिरता संग II
चित्त खेद सवी उपसमे, सुखमे समरसी रंग II २ II


अर्थ: सभी सुख के आवास रूप जिनेश्वर देव के शरीर में मैं विलेपन करता हूँ. नव अंगों में तिलक करते हुए भवसागर का किनारा मिल जाता है (१). विलेपन से देह के समस्त ताप मिट  और परम शिशिरता (ठंडक) प्राप्त होती है. मन के सभी खेद उपशांत हो जाते हैं और सुख से प्रभु स्मरण होता रहता है.  
[राग - वेलाउल]
विलेपन कीजे जिनवर अंगे II जिनवर अंग सुगंधे II विo  II
कुंकुम चंदन मृगमद यक्षकर्द्दम, अगर मिश्रित मनरंगे II विo II १ II
पग जानू कर खंध सिर, भाल कंठ उर उदरंतर संगे II
विलुपित अघ मेरो करत विलेपन, तपत बूझति जिम अंगे II विo II २ II
नव अंग नव नव तिलक करत ही, मिलती नवे निधि चंगे II
कहै साधु तनु शुचि करयउ सुललित पूजा जैसे गंगतरंगे II विo II ३ II


अर्थ: जिनवर देव के अंगों में विलेपन कीजिये. जिनवर का अंग सुगन्धित है. कुंकुम, चन्दन, कस्तूरी, यक्षकर्दम (कपूर, अगर, कस्तूरी, कंकोल आदि के योग से बननेवाला एक प्राचीन अंगराग), अगर आदि सुगन्धित द्रव्यों को मिला कर (१) चरण, जानु, हाथ, कंधे, मस्तक, ललाट, कंठ, नाभि (इन नव अंगों) में विलेपन करते हुए मेरे पाप विलोपित होते हैं जैसे (चंदनादि के विलेपन से) शरीर के अंगों का दाह (तपन) मिट जाता है(२). नव अंगों में नए नए अथवा नौ नौ तिलक करने से सुन्दर नव निधि की प्राप्ति होती है. यहाँ साधु (कीर्ति) कहते हैं की जैसे गंगा की तरंग शरीर को पवित्र करता है वैसे ही यह सुन्दर पूजा भी पवित्र करती है (३).    

अथ तृतीय वस्त्र-युगल पूजा
[दुहा]
वसन युगल उज्जवल विमल, आरोपे जिन अंग II
लाभ ज्ञान दर्शन लहे, पूजा तृतीय प्रसंग II १ II


तीसरी पूजा में उज्वल मलरहित वस्त्रयुगल (कपडे का जोड़ा) जिनवर के अंग पर आरोपित करनेवाले को ज्ञान एवं दर्शन का लाभ होता है. (जैसे वस्त्र युगल होता है उसी प्रकार ज्ञान-दर्शन का भी युगल है) 
[राग वैराडी]
कमल कोमलघनं, चन्दनं चर्चितं, सुगंध गंधे अधिवासिया ए II
कनकमंडित हये, लाल पल्लव शुचि, वसन जुग कंति अतिवासिया ए I१I
जिनप उत्तम अंगे, सुविधि शक्रो यथा, करिय पहिरावणी ढोइये ए II
पाप लुहण अंगे लुहणूं  देवने, वस्त्र युग पूज मल धोइये ए II २ II


चन्दन लगे हुए एवं सुगंध से अधिवासित कमलपत्र के समान कोमल वस्त्र (परमात्मा को पहरने के लिए) वो कैसा है? जिसमे लाल रंग का सुन्दर पल्लू है और स्वर्ण से मबंदित है अर्थात सोने का काम किया हुआ है, ऐसा अत्यंत सुगन्धित पवित्र वस्त्र(१). जिनवर के उत्तम अंगों में शक्रेन्द्र (प्रथम सौधर्म देवलोक के अधिपति इंद्र) के जैसे शुद्ध विधि पूर्वक यह वस्त्र पूजा करनी है. वस्त्र से परमात्मा के अंग का लुंच्छन करने से अपने पाप भी पूंछ जाते हैं, इसलिए वस्त्र युगल से पूजा कर अपने (पापरूपी) मल को धोना है(२).  
 [राग वैराडी]
देव दूष्य जुग पूजा बन्यो हे जगत गुरु,
देव दूष् हर अब इतनो मागूं  II
तुंहिज सबही हित तुहिंज मुगति दाता,
तिण नमि नमि प्रभु चरणे लागुं II देo II १ II
कहे साधु त्रीजी पूजा केवल दंसण  नाण,
देवदूष्य मिश देहुं उत्तम वागुं II
श्रवण अंजली पुट सुगुण अमृत पीता,
सविराडे दुख संशय धुरम भांगुं II देo II २ II


(देव दुष्य अर्थात देवताओं द्वारा प्रदत्त वस्त्र) देव दुष्य के जोड़े से जगत गुरु प्रभु की पूजा करते हैं. हे देव आप हमारे दुखों का हरण करें बस मैं इतना ही मांगता हूँ. (वैदिक संस्कृत में ष और ख एक जैसे रूप में व्यवहृत होता है. यहाँ पर उसी का सुन्दर प्रयोग करते हुए दुष और दुःख का एक जैसा प्रयोग किया गया है). आप ही सभी हित के कारण एवं आप ही मुक्ति के दाता हैं, अतः बारम्बार नमन कर के मैं आपकी चरण वंदना करता हूँ (१). साधु (कीर्ति) 'वैराडी राग" में तीसरी पूजा में देवदुष्य युगल के छल से उत्तम केवल दर्शन-ज्ञान रूपी युगल की कामना करते हैं. कानों को अंजली बना कर (परमात्मा के) सुगुणरूपी अमृत को पीते हुए सभी संशयों का नाश कर दुखों को मूल से नाश करता हूँ (२).      

सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 1


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