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Sunday, February 24, 2019

सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 7

अथ द्वादस पुष्पवर्षा पूजा
[दूहा-मल्हार]
वरषै  बारमी पूज मेंकुसुम बादलिया फूल II
हरण ताप सवि लोक कोजानु समा बहु मूल II  II

यह बारहवीं पुष्पवर्षा पूजा है. जगत के सभी ताप को दूर करने के लिए फूल बादल बन कर इतने बरसे की धरती घुटने तक फूलों से भर गई. 

[राग-भीम मल्हार गुंड़मिश्र-देशी कड़खानी]
मेघ बरसै भरीपुप्फ वादल करी,
जानु परिणाम करि कुसुम पगरं II
पंच वरणें बन्योविकच अनुक्रम चन्यो,
अधोवृंतें नहु=नहीं पी पसरं II मेo II  II
वास महके मिलैभमर भमरी भिले,
सरस रसरंग तिणि दुख निवारी I
जिनप आगे करैसुरप जिम सुख वरै,
बारमी पूज तिण पर अगारी II मेo II  II

फूलों का बादल बना है ऐसा मेघ बरस रहा है और घुटने तक फूल भर गया है. पांच रंगों के फूल  इस प्रकार से स्थित हैं की जिनमे उनकी डंडियां नीचे की तरफ हैं (और पंखुड़ियां ऊपर की ओर) और (जिनेश्वर देव के अतिशय से) उन्हें कोई पीड़ा भी नहीं होती है (१). (उन फूलों की) खुशबू से, महक से भौंरे -भौंरी आ कर (उनका  रसपान कर रहे हैं). यह सरस रसरंग दुःख निवारण करनेवाला है. सुरपति इंद्र ने जिनपति के आगे इस प्रकार पुष्पवर्षा की उसी प्रकार बारहवीं पूजा में श्रावक भी करते हैं (२). 
[राग-भीम मल्हार]
पुप्फ वादलिया वरसे सुसमां II अहो पुo II 
योजन अशुचिहर  वरसे गंधोदकमनोहर जानु  समा II अहो पुo II  II
गमन आगमन कुं पीर नहीं तसु, इ जिनको अतिशय गुनें II
गुंजत गुंजत मधुकर इम पभणेमधुर वचन जिन गुण थुणे II  II
कुसुमसु परिसेवा जो करैतसु पीर नहीं सुमिणे II
समवसरण पंचवरण अधोवृन्तविबुध रचे सुमनां सुसमां II पुo II  II
बारमी पूज भविक तिम करेकुसुम विकसी हसी उच्चरे II
तसु भीम बंधन अधरा हुवे,  जे करै जै जिन नमा II पुo II  II
सुखकारक पुष्प के बादल बरस रहे हैं. योजन प्रमाण भूमि के अशुचि को हरण करनेवाला गंधोदक भी बरस रहा है. घुटने तक मनोहर फूल बरस गया है (१). इन पुष्पों के ऊपर आने-जाने वालों से इन्हे किसी प्रकार की पीड़ा नहीं होती यह जिनेश्वर देव का अतिशय है. इन फूलों पर भौंरे गुंजराव कर रहे हैं मानो मधुर वचन से जिनेश्वर देव के गन गा रहे हों (२). फूलों से जो (तीर्थंकर परमात्मा की) सेवा अर्थात पूजा करता है उसका मन प्रसन्न रहता है और उसे किसी भी प्रकार की पीड़ा नहीं होती. समवशरण में देवगण पांच रंगों के सुखदायक अधोवृन्त फूलों की यह रचना करते हैं अर्थात यह देवकृत अतिशय है (३). (जिस प्रकार देवों ने किया) उस प्रकार जो भव्य जीव बारहवीं पूजा में पुष्पवर्षा करता है और विकसित पुष्प के समान आनंदित हो कर (प्रभगुण) का उच्चारण करता है और जिनेश्वर देव का जय जयकार करते हुए उन्हें नमन करता है उसके (कर्मों के) दृढ एवं भयानक वंधन ढीले हो जाते हैं (४). 


अथ त्रयोदश अष्ट मंगल पूजा
[दूहा-कल्याण राग]
तेरमि पूजा अवसरेमंगल अष्ट विधान Ii
युगति रचे सुमंतें सहीपरमानंद निधान II  II

तेरहवीं पूजा में अष्टमंगल का विधान है. कुशलता पूर्वक शुभमति से (यह पूजा करने पर) परमानन्द रूप निधान की प्राप्ति होती है. 
{राग-वसंत]
अतुल विमल मिल्याअखंड गुणे भिल्यासालि रजत तणा तंदुला  II
श्लषण समाजकंविचि पंच (पञ्चविध) वरणकंचन्द्रकिरण जैसा ऊजला  II
मेलि मंगल लिखैसयल मंगल अखेजिनप आगें सुथानक धरे  II
तेरमि पूजविधि ते रमि मन मेरेअष्ट मंगल अष्ट सिद्धि करे  II o II  II

अतुलनीय, निर्मल, अखण्ड आदि गुणों से परिपूर्ण एवं चन्द्रकिरण के सामान उज्जवल शालि धान्य, चावल, चांदी के चावल आदि पांच रंगों के धान से अष्ट मंगल लिख (आलेखन कर) जिनपति के आगे अच्छे स्थान में रखनेवाले के सभी मंगल अक्षय होते हैं. यह तेरहवीं पूजा मेरे मन में रम गई है. अष्ट मंगल अष्ट सिद्धि प्रदान करनेवाली है. 
 [राग-कल्याण]
हां हो तेरी पूजा बणी है रसमें II
अष्ट मंगल लिखैकुशल निधानंतेज तरणि के रसमें II हांo II  II
दप्पण भद्रासण नंद्यावर्त्त पूर्ण कुंभमच्छयुग श्रीवच्छ तसु मे II
वर्द्धमान स्वस्तिक पूज मंगलकीआनंद कल्याण सुखरसमें II हांo II  II


हे प्रभु तुम्हारी पूजा बड़ी रसीली है. अष्टमंगल का आलेखन करने से कुशल मंगल रूप संपत्ति और सूर्य के समान तेज प्राप्त होता है।  कल्याण राग में गेय इस पूजा में दर्पण, भद्रासन, नंद्यावर्त, पूर्णकलश, मत्स्य युगल, श्रीवत्स, वर्द्धमान एवं स्वस्तिक  इन अष्ट मंगलों से पूजा करने से आनंद, कल्याण एवं सुखरस की प्राप्ति होती है. 



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सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 6

अथ दशमी आभरण पूजा
[राग-केदार में दूहा]
शिर सोहे जिनवर तणेरयण मुकुट झलकंत II
तिलक भाल अंगद भुजाश्रवण कुंडल अतिकंत II  II 
दशमी पूजा आभरणरचना यथा अनेक II
सुरपति प्रभु अंगे रचेतिम श्रावक सुविवेक II  II

रत्नों से बना हुआ देदीप्यमान मुकुट जिनवर के मस्तक में शोभायमान है, ललाट में तिलक, बांहों में अंगद (बाजूबंद), और कानों में कुण्डल बहुत ही प्रिय और मनोरम है (१). यह दसवीं पूजा आभूषण की है, जिसमे अनेक प्रकार से प्रभु की (अंग) रचना की जाती है. जिसप्रकार सुरपति अर्थात देवराज इंद्र ने प्रभु के अंगों को (सजाया था)  उसी प्रकार श्रावक भी विवेक पूर्वक यह कार्य करे (२). 

[राग -गुंड मल्हार]
पांच पीरोजा नीलू लसणीयामोती  माणकने लाल रसणीया,
हीरा सोहे रेमन मोहे रे,
धूनी चूनी पुलक करकेतनांजातरूप सुभग अंक अंजना,
मन मोहे रे II  II
मौलि मुकुट रयणें जडयोकाने कुंडल जुगते जुड़यो II
उरहारु रे मनवारु रे II  II
भाल तिलक बांहे अंगदाआभरण दशमी पूजा मुदा II
सुखकारु रेदुखहारू रे II  II

पांच प्रकार के रत्न, अथवा सभी रत्न पांच पांच की संख्या में फ़िरोज़ा, नीला, लसनिया, मोती, मानक, हीरा, आदि सभी शोभते हैं और मन को मोह रहे हैं. चुन्नी (मानक का एक रूप), तामड़ा, कर्केतक, सोना, अंजन रत्न, आदि मनोहारी एवं सौभाग्यसूचक रत्न मन को मोह रहे हैं (१). मस्तक में मुकुट रत्नों से जड़ा हुआ है, कानों में कुण्डल बहुत ही सुन्दर बनाया गया है, (इनकी शोभा) ह्रदय का हरण करनेवाली है, और मन इनपे न्यौछावर हो जाता है (२). ललाट पे तिलक, और बाँहों में बाजूबंद, (ये सभी) आभरण (आभूषण) यह दशमी पूजा प्रमुदित करनेवाली है. सुख करनेवाली एवं दुःख हरनेवाली है (३). 

[राग-केदार]
प्रभु शिर सोहेमुकुट मणि रयणे जड्यो II
अंगद बांह तिलक भालस्थलयेहु देखउ कोन घडयो II प्रo II  II
श्रवण कुंडल शशि तरणि मंडल जीपेसुरतरु सम अलंकरयो II
दुख केदार चम सिंहासण,छत्र शिर उवरि धरयो,
अलंकृति उचित वरयो II  II

प्रभु के मस्तक पर मणि रत्नों से जड़ित मुकुट शोभायमान है. बाँहों में बाज़ू बंद, ललाट में तिलक (की शोभा) देख कर कवि आश्चर्य से चकित पूछते हैं की इन्हे किसने बनाया? (१) कानों में कुण्डल चन्द्रमा और सूर्य की भी काँटी को जीतने वाली अर्थात उस से भी अधिक है, और प्रभु कल्पवृक्ष के सामान (अलंकारों से) अलंकृत हैं.  दुखों को नष्ट करने वाले केदार राग में गेय (केदार शब्द का द्विअर्थी प्रयोग) यह पूजा है. प्रभ चामर, सिंहासन अदि (प्रातिहार्यों से) सुशोभित हैं और शिर के ऊपर छत्र धरा हुआ है, इस प्रकार प्रभु श्रेष्ठ आभूषणों से उचित प्रकार से अलंकृत हैं (२). 

अथ एकादश फूलधर पूजा
[दूहा]
फूलधरो अति शोभतो, फुन्दे  लहके फूल II
महके परिमल महमहेग्यारमी पूज अमूल II  II

फूलों से शोभित घर (फूलघर) अत्यंत शोभायमान है जिसमें फूंदों में फूल खिल रहा है. यहाँ पर "महके परिमल महमहे" तीनों लगभग समानार्थक हैं और खुशबू की आत्यंतिक अवस्था का वोध कराने के लिए  शब्दों का एक साथ प्रयोग किया गया है. भावार्थ ये है की फूलघर के फूलों की विशिष्ट सुवास चारों दिशाओं में तेजी से फ़ैल रही है. यह ग्यारहवीं पूजा अनमोल है. 


{राग-रामगिरि कौतिकीया]
कोज अंकोल रायबेली नव मालिका,
कुंद मचकुंद वर विचकूल  हांरे अइयो विचकूल  II
तिलक दमण दलं मोगरा परिमलं,
कोमल पारिधि पाडलु हांरे अइयो  चोरणूं   II  II

कोज, अंकोल अर्थात ढेरा या थेल नामक फूल(एलैजियम सैल्बीफोलियम या एलैजियम लामार्की), रायबेली, नवमल्लिका, चमेली, नागचम्पा,  और श्रेष्ठ विचकूल फूल, तिलिया, दौना, मोगरा आदि की खुशबु से महकता हुआ, और कोमल परिध एवं पाडल का फुल चित्त को चुरानेवाला है. 

[राग-कौतिकिया रामगिरि]
मेरो मन मोह्योफूलघरे आणंद झिले II
असत उसत दाम वघरी मनोहर,
देखत सबही दुरित खीले II फूo II  II
कुसुम मंडप थंभ गुच्छ चंद्रोदय,
कोरणि चारु विमाणि सझे II
इग्यारमी पूज भणी हे रामगिरि,
विबुध विमाण जिको तिपुरी भजे II फूo II  II


फूलघर ने मेरे मन को मोह लिया है और आनंद से तृप्त कर दिया है. दाम अर्थात फूलों की माला, बघरी अर्थात फूलों की बंगड़ी बना कर (फूलघर सजाया गया है जिसे) देख कर सभी पाप खीर गए अर्थात झर गए या नष्ट हो गए. फूलघर में पुष्प का मंडप बनाया गया है,  खम्भों को पुष्प गुच्छ से सुसज्जित किया गया है और उसमे चँदवा भी लगाया गया है. सुन्दर मनमोहक कोरनी से इसे (देव) विमान सदृश सजाया गया है. यह ग्यारहवीं पूजा रामगिरि राग में गाई गई है और यह पूजा ऐसी है जैसे देव विमान में इंद्र प्रभु की स्तवन करते हैं. 


सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 3

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Saturday, February 23, 2019

सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 5


अथ अष्ठम गंधवटी पूजा
 (प्रक्षिप्त) [दूहा राग-सोरठ]
सोरठ राग सुहामणी, मुखें न मेली जाय II
ज्युं ज्युं रात गलंतियां, त्यूं त्यूं मीठी थाय II १ II
सोरठ थारां देश में, गढ़ां बड़ो गिरनार II
नित उठ यादव वांदस्यां, स्वामी नेम कुमार II २ II
जो हूंती  चंपो बिरख, वा गिरनार पहार II
फूलन हार गुंथावती, चढ़ती नेम कुमार II ३ II
राजीमती गिरवर चढ़ी, उभी करे पुकार II
स्वामी अजहु न बाहुडे, मो मन प्राण आधार II ४ II
रे संसारी प्राणिया, चढ्यो न गढ़ गिरनार II
जैन धर्म पायो नही,गयो जमारो हार II ५ II
धन वा राणी राजीमती, धन वे नेम कुमार II
शील संयमता आदरी, पहोतां भवजल पार II ६ II
दया गुणांकी वेलडी, दया गुणांकी खान
अनंत जीव मुगते गया, दया तणे परमाण II ७ II
जगमें तीरथ दोइ बडा,  सेत्रुंजो गिरनार II
इण गिर रिषभ समोसर्या, उण गिर नेम कुमार II ८ II (प्रक्षिप्त)

सत्रह भेदी पूजा में यहाँ दोहे की जगह सोरठा है जिसका छंद दोहे से उल्टा होता है. सोरठा का सम्वन्ध सोरठ से जोड़ कर यहाँ पर बाद के काल में उपरोक्त छंद (प्रक्षिप्त) जोड़ दिए गए, यह मूल पूजा का अंश नहीं है.  
[दोहा-सोरठ]
अगर सेलारस सार, सुमति पूजा आठमी II
गंधवटी घनसार, लावो जिन तनु भावशुं II १ II

जिनेश्वर देव के शरीर को भावपूर्वक गंधवटी से पूजन करने रूप यह आठवीं पूजा सुमति प्रदान करनेवाली है. अगर, सीलारस, बरास आदि सुगन्धित द्रव्य से प्रभु की पूजा का अधिकार (शास्त्रों में वर्णित) है.  

[राग-सामेरी]
कुंद किरण शशि उजलो जी देवा,
पावन घन घन सारो जी II
आछो सुरभि शिखर मृग नाभिनो जी देवा,
चुन्न रोहण अधिकारे जी II आo II
वस्तु सुगंध जब मोरिये जी देवा,
अशुभ करम चुरीजे जी II आo II
आंगण सुरतरु मोरिये जी देवा,
तब कुमति जन खीजे जी II
तब सुमति जन रीझे जी II १ II


चन्द्रमा के किरण के सामान उज्जवल व पवित्र घनसार अर्थात बरास, सभी सुगंधियों में श्रेष्ठ कस्तूरी, चन्दन का चूर्ण, आदि से मिलकर गंधवटी (बनती है). जब परमात्मा के सुगन्धित वस्तु से विलेपन किया जाता है तब वह विलेपन करनेवाला अपने अशुभ कर्म को चूर्ण अर्थात नष्ट करता है यहाँ मोरिये का अर्थ युद्ध में मोर्चा अर्थात व्यूह रचना से है. पूजा करनेवालों के आँगन में सुरतरु अर्थात कल्पवृक्ष पुष्पित हुआ है (यहाँ मोरिये का अर्थ पुष्पित होना है), और  तब कुमति अर्थात कुबुद्धि जन को खीझ उत्पन्न होती है और सुमति जनों को हर्ष उत्पन्न होता है.    
[राग-सामेरी]
पूजो री माई, जिनवर अंग सुगंधे II जिo II पूo II
गंधवटी घनसार उदारे, गोत्र तीर्थंकर बांधे II पूo II १ II
आठमी पूज अगर सेलासर, लावे जिन तनु रागे II
धार कपूर भाव घन बरखत, सामेरी मति जागे II पूo II २ II  


जिनवर का अंग सुगन्धित है उसे सुगंध से पूजो। बरास आदि उत्तम पदार्थों से युक्त गंधवटी से पूजन करने वाला तीर्थंकर गोत्र का वंध करता है. आठवीं पूजा में अगर, शिलारस, कपूर आदि द्रव्यों को प्रशस्त राग से प्रभु के शरीर में विलेपन करते हैं. कपूर की धारा के साथ जैसे सघन भावों की वर्षा होती है. सामरी राग में गेय यह पूजा अपनी मति अर्थात बुद्धि को जगानेवाली है.  

अथ नवम ध्वज पूजा
[दुहा]
मोहन ध्वज धर मस्तकेंसुहव गीत समूल II
दीजें तीन प्रदक्षिणानवमी पूज अमूल II  II

मन मोहने वाले ध्वज को मस्तक पे धारण कर (सुहा राग) सुंदर गीत गाते हुए, तीन प्रदक्षिणा दे कर यह पूजा की जाती है और यह अमूल्य पूजा है.  


[राग-गोडी में वस्तु छंद]
सहस जोयण सहस जोयण हेममय दंड,
युत पताक पंचे वरण II
घुम घुमंत घूघरी वाजे,
मृदु समीर लहके गयणं II
जाणि कुमति दल सयल भांजे (१)
सुरपति जिम विरचे ध्वज नवमी पूज सुरंग II
तिण परि श्रावक ध्वज वहनआपे दान अभंग II २ II

एक हज़ार योजन ऊँचा सुवर्णमय दंड, पांच रंग की पताकाओं से युक्त, जिसमे घूम घूम कर घुंगरू वज रहे हैं, आकाश में हलकी हलकी कोमल हवा बह रही है, मनो सभी कुमति के समूह को  नष्ट करनेवाली हो (१), देवराज इंद्र ने जिस प्रकार इंद्र ध्वज की रचना की थी वैसे ही श्रावक भी ध्वज का वहन कर, वो ऐसा दान करता है जिसका कोई अंत नहीं. (२)


[राग नट्ट -नारायण]
जिनराज को ध्वज मोहनांध्वज मोहना रे ध्वज मोहना II जिo II
मोहन सुगुरु  अधिवासियोकरि पंच सबद त्रिप्रदक्षिणा I
सधव वधू शिर सोहणा II जिo II  II
भांति वसन पंच वरण वण्यो रीविध करि ध्वज को रोहणां II
साधु भणत नवमी पूजा नव, पाप नियाणां खोहणां II
शिव मन्दिरकुं अधिरोहणाजन मोह्यो नट्टनारायणा II जिo II  II

जिनेश्वर देव का ध्वज मन मोहनेवाला है. मोह को नष्ट करनेवाले सुगुरु के द्वारा अधिवासित (अर्थात वासक्षेप डाल कर), सधवा स्त्री के शिर पर शोभायमान ध्वज को ले कर पांच प्रकार के (वजित्रों के) शब्द करते हुए तीन प्रदक्षिणा दे कर (१) पांच रंग के कपडे से बने हुए ध्वज को  विधि पूर्वक चढ़ाना है. साधुकीर्ति कहते हैं यह नवमी पूजा नौ प्रकार के पाप निदान (नियाणा) को नष्ट करनेवाली है, मोक्ष मंदिर में चढानेवाली है. "नट्टनारायण" राग में गेय यह पूजा जन मन को मोहनेवाली है. 

अनुवादक:  ज्योति कुमार कोठारी

सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 3


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Tuesday, February 12, 2019

सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 4


अथ छट्ठी मालारोहण पूजा
[राग - आशावरी में दूहा]
छट्ठी पूजा ए छती, महा सुरभि पुफमाल  II
गुण गूंथी थापे गले, जेम टले दुखजाल II १ II


अत्यंत सुगन्धित पुष्पों की माला की यह छठी पूजा है. ये पुष्पमाला जैसे गुणों को माला है जिसे प्रभु के गले में डालने से दुखों का जाल टल जाता है. 
[राग -रामगिरि गुर्जरी]
हे नाग पुन्नाग मंदार नव मालिका,
हे मल्लिकासोग पारिधि कली ए I१I 
हे मरुक दमणक बकुल तिलक वासंतिका,
हे लाल गुलाल पाडल  भिलि  ए I२I
हे जासुमण मोगरा बेउला मालती,
हे पंच वरणे गुंथी मालथी ए I३I
हे माल जिन कंठ पीठे ठवी लहलहे,
हे जणि संताप सब पालती ए II४II

नाग चम्पा, सुल्तान चंपा अर्थात नागकेशर, नंदनवन के पांच पुष्पों में से एक मंदार, नवमालिका- बेली जैसा एक फूल, मल्लिका, अशोक, एवं परिध की कली, (१) मरुवा, दौना, (एक पीले रंग का फूल) वकुल, तिलक या तिलिया (एक सफ़ेद रंग का फूल), वासंतिका- नवमल्लिका, लाल फूल, गुलाब, पाडल अर्थात जवा, आदि फूलों को इकठ्ठा कर (२)  मोगरा, बेली, मालती आदि पांच रंगों के फूलों की माला गूँथ कर (प्रभु के कंठ में पहनाते) हैं  (३) यह माला जिनेश्वर प्रभु के कंठ स्थान में लहलहाती है, और सभी लोगों के संताप को दूर करती है (४) 

[राग-आशावरी]
देखी दामा कंठ जिन अधिक एधति नंदे,
चकोरकुं देखि देखि जिम चंदे II
पंचविध वरण रची कुसुमा की,
जैसी रयणावली सुहमीदें II देo II १ II
छठी रे तोडर पूजा तब डर धूजे,
सब अरिजन हुइ हुइ तिम छंदे II
कहे साधुकीरति सकल आशा सुख,
भविक भगति जे जिण वंदे II देo II २ II


जैसे चन्द्रमा को देख कर चकोर हर्षित होता है वैसे जिनवर देव के कंठ में माला (दामा) अत्यंत अधिक आनंद होता है. पांच प्रकार के वर्णों के पुष्पों की माला ऐसी शोभायमान है जैसे रत्नों की आवली अर्थात लाइन बनाई गई हो (१). यह छठी पूजा पुष्पमाला अर्थात टोडर की है, यह पूजा करनेवालों से सभी प्रकार के डर भी डर जाते हैं और सभी शत्रु भी भयभीत हो जाते हैं. आशावरी राग में गाये जाने वाली इस पूजा में साधुकीर्ति कहते हैं की जो भाविक जान भक्तिपूर्वक जिनदेव की पूजा करता है उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं और सभी सुखों की प्राप्ति होती है.(२)  

अथ  सप्तम वर्णपूजा प्रारंभ:
[दूहा]
केतकि चंपक केवडा, शोभे तेम सुगात II
चाढो जिम चढतां हुवे, सातमियें सुखशात II १ II


केतकी, चम्पा, केवड़ा, आदि पुष्पों से परमात्मा का सुन्दर शरीर शोभायमान हो रहा है. सातवीं पूजा में इन फूलों को चढ़ाते हुए (भावों की उच्च श्रेणी) चढ़ कर सुख एवं साता को प्राप्त करते हैं. 
[राग - केदार गोडी]
कुंकुम चरचित विविध पंच वरणक, कुसुमस्युं हे I
कुंद गुलाबस्युं चंपको दमणको, जासुस्युं ए II
सातमी पूजमें आंगिये अंगि, अलंकियें ए II
अंगी आलंकि मिस मानिनी मुगती आलिंगियें  ए II १ II


केशर से पूजन कर पञ्च वर्ण के चमेली, गुलाब, चम्पा, दौना जवा, आदि विविध पुष्पों से सातवीं पूजा में प्रभु के अंग में आंगी की रचना कर उसे अलंकृत करते हैं. आंगी की रचना कर मानो मुक्ति का आलिंगन करते हैं. 
[राग भैरवी]
पंच वरण अंगी रची, कुसुमनी जाती II  फूलनकी जाती II पंo II
कुंद मचकुंद गुलाब सिरोवरी (शिरोमणि), कर करणी सोवन जाती II पंo II
दमणक मरुक पाडल अरविंदो, अंश जूही वेउल वाती II पंo II १ II
पारिधि चरणि कल्हार मंदारो, वर्ण पटकुल  बनी भांति II पंo II
सुरनर किन्नर रमणि  गाती, भैरव कुगति व्रतति दाती II पंo II २ II  


विभिन्न जातियों के पांच रंगों के फूलोंसे आंगी बनाते हैं. चमेली, कनकचंपा, गुलाब के फूलों को शिर के ऊपर;  दौना, मरुवा, पाटली, कमल, आदि कंधे पर और जूही एवं बेलि सुगंध फैला रही है, पीला या सफ़ेद कमल, मंदार एवं पाटल आदि चरणों में शोभायमान हैं. देव, मनुष्य, किन्नर आदि की मनोरम स्त्रियां (प्रभु के गीत) जाती हैं और भैरव  गेय यह पूजा कुगति रूपी लताओं को काटने के लिए यह दांती (हंसिया) के समान है.   
अनुवादक:  ज्योति कुमार कोठारी

सतरह भेदी पूजा का अर्थ (महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत) भाग 3 


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