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Monday, January 22, 2018

बंगाल के जैन मंदिर: एक शोध परियोजना



Jain Temples in Bengal- A Research Project 

Our Associates

Asiatic Society of India        L D Institute           Indian Museum
     Kolkata                     Ahmadabad                 Kolkata

बंगाल के जैन मंदिर: एक शोध परियोजना 

तीर्थंकर महावीर स्वामी 

यह एक सर्वविदित तथ्य है की भगवान महावीर ने बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में परिभ्रमण किया था. वर्धमान और वीरभूम इन दोनों जिलों का नाम इस बात के प्रमाण के रूप में आज भी विद्यमान है  भगवान महावीर के १३०० वर्ष बाद तक भी जैन धर्म बंगाल के प्रमुख धर्मों में से एक रहा लेकिन ईसा की ७वीं शताब्दी के बाद से बंगाल में इसका क्षरण प्रारम्भ हुआ तथा यहाँ पर यह लुप्तप्राय हो गया। 

वीरभूम 

वर्धमान



 बंगाल, बिहार और उत्तरप्रदेश से लुप्त होता हुआ जैन धर्म दक्षिण भारत में पनपा और ईसा की ९वीं शताब्दी से यह गुजरात और राजस्थान में फलने-फूलने लगा। 

भांडाशाह मंदिर बीकानेर , राजस्थान 


जलमंदिर, बाबू देरासर, पालीताना 
 १७वीं-१८वीं सदी से राजस्थान के जैन वणिकगण फिर से बंगाल आने लगे और यहाँ पर जैन धर्म का उदयकाल पुनः प्रारंभ हुआ। नवाब मुर्शीदकुली खां के नजदीकी जगत सेठ के कारण जैन समाज का महत्व बढ़ने लगा और यहाँ से यह पुनरोदय सशक्त होने लगा।  

 तत्कालीन बंगाल सूबे की राजधानी मुर्शीदाबाद से कुछ ही मील की दुरी पर महिमापुर में जगत  सेठ ने पार्श्वनाथ भगवान् का कसौटी के पत्थर का भव्य जिनालय बनवाया।  

कसौटी का खम्भा, महिमापुर 


काठगोला का भव्य विशाल द्वार 
इसके बाद काशिमबाज़ार, दस्तुरहाट,  अजीमगंज, जियागंज, जंगीपुर आदि स्थानों में गोलेच्छा, दुगड़, मुणोत, नाहर, कोठारी, श्रीमाल, छजलानी आदि परिवारों ने अनेकों जिनमंदिर एवं दादाबाड़ियों का निर्माण करवाया।  

पंचतीर्थी- कीरतबाग, जियागंज 
श्री सम्भवनाथ मंदिर, जियागंज 
रत्नों की प्रतिमाएं, छोटी शांतिनाथ, अजीमगंज 
चौवीसी, रामबाग, अजीमगंज 

श्री पार्श्वनाथ, जंगीपुर 
स्फटिक चरण , दादाबाड़ी, अजीमगंज 
१९वीं सदी के पूर्वार्ध से ही अंग्रेजों की राजधानी होने के कारण कोलकाता का महत्व बढ़ने लगा और उत्तर प्रदेश एवं दिल्ली से जैन समाज के लोग यहाँ आ कर बसने लगे। इसके फल स्वरूप यहाँ जौहरी-साथ के धनाढ्य परिवारों ने कई मंदिरों का निर्माण करवाया।  इनमे टांक परिवार द्वारा निर्मित श्री शांतिनाथ स्वामी का पंचायती मंदिर, राय बद्रीदास बहादुर मुकीम द्वारा निर्मित विश्वप्रसिद्ध श्री शीतलनाथ स्वामी का मंदिर,

श्री शीतलनाथ स्वामी, कोलकाता 


राय बद्रीदास बहादुर मुकीम

श्री गणेशीलाल खारड़ द्वारा निर्मित श्री चंदाप्रभु स्वामी का मंदिर 
एवं श्री सुखलाल जौहरी कृत श्री महावीर स्वामी का मंदिर   विख्यात हैं।  


श्री महावीर स्वामी मन्दिर, कोलकाता का भव्य शिखर 
इन मंदिरों के निर्माण से पहले ही यहाँ एक भव्य दादाबाड़ी का निर्माण हो चूका था. 

कालान्तर में मुर्शिदाबाद से शहरवाली समाज के लोग कोलकाता आ कर बसने लगे और नाहर एवं दुगड़ परिवार ने भी यहाँ मंदिर का निर्माण करवाया।  इसके बाद गुजराती समाज व राजस्थान से आये हुए नए बसे जैनों ने (मारवाड़ी साथ) ने भी यहाँ कई मंदिरों का निर्माण करवाया।

जिनेश्वर सूरी भवन, कोलकाता 
 साथ ही बंगाल के कई अन्य स्थानों जैसे बोलपुर, दुर्गापुर, सैंथिया आदि में भी कई जिनमंदिर बने। इन मंदिरों के निर्माण एवं प्रतिष्ठा में साधु-साध्वियों के अतिरिक्त श्री पूज्यों एवं यतियों का भी विशेष योगदान रहा है.  


श्रीपुज्य जी श्री जिन विजयेन्द्र सूरी 


स्थापत्य एवं कला के अद्भुत नमूने ये सभी मंदिर जैन समाज की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर हैं परन्तु लम्बे समय से इन पर कोई शोध नहीं हुई  है।  


श्री वासुपूज्य स्वामी, अजीमगंज 

श्री नेमिनाथ मंदिर, अजीमगंज 

श्री नेमिनाथ स्वामी, अजीमगंज 
कांच का काम, श्री शीतलनाथ मंदिर, कोलकाता 

श्री नेमिनाथ स्वामी, अजीमगंज

श्री शीतलनाथ स्वामी, कोलकाता

 हमारी इस शोध परियोजना का उद्देश्य विगत तीन सौ वर्षों में बने इन मंदिरों के सम्वन्ध में ऐतिहासिक जानकारी जुटा कर उसे आम लोगों तक पहुंचाना है। जैन साहित्य में सामाजिक इतिहास का क्षेत्र लगभग परित्यक्त ही रहा है, इस दिशा  में भी शोध कार्य को आवश्यक महत्व मिले इस उद्देश्य से इन मदिरों के निर्माण और देख-रेख के कार्यों से जुड़े परिवारों से सम्बंधित इतिहास पर शोध कार्य को भी इस योजना में शामिल किया गया है। 




प्रमुख जैन इतिहासज्ञ वाराणसी के डा. श्री शिवप्रसाद जी ने इस गुरुतर कार्यभार को सँभालने की स्वीकृति दे कर हमें अनुगृहीत किया है, साथ ही देश विदेश के अनेक जानेमाने विद्वान भी इससे जुड़ चुके हैं। कोलकाता की प्रसिद्ध  एशियाटिक सोसाइटी एवं इंडियन म्यूजियम और अहमदाबाद की एल डी इंस्टिट्यूट ने भी परियोजना से जुड़कर हमारा हौसला बढ़ाया है। इसके लिए हम इन संस्थाओं के आभारी हैं। . 

कोलकाता का श्री महावीर स्वामी मंदिर भी इसी विरासत का एक अंग है जिसने आज अपने डेढ़ सौ वर्ष पूरे किए हैं। ऐसी शोध परियोजना प्रारम्भ करने का यह एक उत्तम अवसर है और हम आज इसे आपके समक्ष ला रहे हैं. हमें विश्वास है की इस महत्वाकांक्षी परियोजना में आप सबका  उदार सहयोग हमें निरंतर प्राप्त होगा।  





परियोजना निदेशक
 डा. शिवप्रसाद, वाराणसी
स्थापत्य एवं कला निदेशक
 डा. श्रीमती चंद्रमणि सिंह, पूर्व निदेशक, सिटी पैलेस म्यूजियम, जयपुर

सम्पादन सलाहकार: 
श्री सुरेंद्र बोथरा, जैन आगम मर्मज्ञ
प्रोफ़ेसर जॉन कोर्ट, डेनिसन विश्वविद्यालय, अमरीका 
प्रोफ़ेसर पीटर फ्लुगल, लन्दन विश्वविद्यालय, यू के 

 संयोजक
ज्योति कुमार कोठारी, जयपुर
२७ जनवरी २०१८

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E-mail: info@vardhamaninfotech.com

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