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Saturday, January 7, 2017

जैन आगमों की रूपरेखा एवं इतिहास


जैन धर्म तीर्थंकर भगवन महावीर के उपदेशों पर आधारित है और उनकी गणधरों द्वारा सुत्रवद्ध वाणी एवं  १४/१० पूर्वधरों द्वारा रचित शास्त्र आगम के रूप में जानी जाती है. यह सभी जानते हैं की तीर्थंकर जो उपदेश देते हैं उन्हें गणधर भगवंत संकलित एवं सुत्रवद्ध करते हैं. इन्हें आगम कहा जाता है और यह द्वादशांगी अर्थात बारह (१२) भागों में विभाजित है. इन्हें ही अंग सूत्र कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है की भगवान् महावीर के पंचम गणधर श्री सुधर्मा स्वामी ११ गणधरों में सबसे अंत में मोक्ष गए. उन्होंने अपने प्रमुख शिष्य जम्बू स्वामी को इन बारह अंगों का उपदेश दिया और उन्होंने इसे शिष्य परंपरा से आगे बढ़ाया।  इन १२ अंगों में से १२ वां दृष्टिवाद विलुप्त हो चूका है जिसका एक भाग चौदह (१४) पूर्व के रूप में विख्यात है. इस समय ग्यारह अंग उपलव्ध हैं.

जैन आगमों का अवलोकन करते हुए विदेशी विद्वान् 
यह ग्यारह अंग निम्न प्रकार हैं
१. आचारांग २. सूत्रकृतांग ३. स्थानांग ४. समवायांग ५. भगवती (व्याख्या प्रज्ञप्ति) ६. ज्ञाताधर्मकथा ७. उपासक दसांग ८. अंतकृत दसांग ९. प्रश्नव्याकरण १०. अनुत्तरोपपातिक ११.  विपाक

गणधर कृत एवं वर्त्तमान में उपलव्ध ११ अंगों के अलावा चौदह एवं दस पूर्वधर आचार्यों द्वारा लिखित सूत्र भी आगम माना जाता है. चौदह एवं दस पूर्वधर आचार्यों द्वारा लिखित या संकलित बारह उपांग, छह छेद, दस प्रकीर्णक, चार मूलसूत्र, अनुयोगद्वार और नंदी सूत्र इस प्रकार चउतीस और मिला कर कुल पैतालीस आगम वर्त्तमान में पाए जाते हैं.

भगवान् महावीर स्वामी के समय ये सभी सूत्र लिखे नहीं जाते थे और गुरु परंपरा से शिष्य इन्हें श्रुत रूप में प्राप्त करते थे. इसलिए इन आगमों के ज्ञान को श्रुत ज्ञान भी कहा जाता है।  कालक्रम से स्मृति शक्ति कमजोर होने पर इन्हें याद रखना कठिन हो गया तब भगवान् महावीर के निर्वाण के ९८० वर्ष बाद देवर्धिगणी क्षमाश्रमण ने इन्हें संकलित कर लिपिवद्ध करवाया तब से आगमों को लिखने की परंपरा प्रारम्भ हुई.

इन आगमों पर परवर्ती आचार्यों एवं विद्वान् मुनियों ने निर्युक्ति, चूर्णी, भाष्य एवं टीकाएँ लिखी। इन के माध्यम से उन्होंने आगमों के अर्थ को समझाया एवं उस पर विस्तृत विवेचन किया। मूल आगम, निर्युक्ति, चूर्णी, भाष्य एवं टीका (कुल पांच) मिलकर पंचांगी बनती है और इस पंचांगों को जैनागम कहा जाता है. मूर्तिपूजक परंपरा पैतालीस आगमों की पंचांगों को स्वीकार करती है जबकि स्थानकवासी एवं तेरापंथी परंपरा इनमे से ३२ आगमों को हिमान्याता देती है. स्वाभाविक रूप से जिन आगमों में मूर्तिपूजा का उल्लेख है उन्हें यह परंपराएं (मूर्ति एवं मंदिर का निषेध करने के कारण) मान्य नहीं करती।

वर्तमान में उपलव्ध सभी जैन शास्त्रों का आधार इन्ही ४५ आगमों को माना जाता है. भगवान् महावीर के बाद २५०० वर्षों से भी अधिक समय व्यतीत हो चूका है और इस अवधि में पूर्वाचार्यों,  विद्वान् संतों, यतियों, भट्टारकों, यहाँ तक की श्रावकों ने भी विपुल मात्रा में जैन आध्यात्मिक एवं धार्मिक साहित्य का सृजन किया है. ये ग्रन्थ जन- जन का मार्गदर्शन करते हैं एवं उनके ज्ञान में अभिवृद्धि करते हैं.

सूत्रकृतांग एवं अन्य अगम ग्रंथों पर आधारित महावीर स्वामी महापूजन का आयोजन ६ फरबरी, २०१७ को कोलकाता में होने जा रहा है. जानने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें


श्री महावीर स्वामी मन्दिर, कोलकाता का सार्द्ध शताब्दी महोत्सव


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