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Thursday, January 5, 2017

श्रीपूज्य श्री जिन विजयेंद्र सूरी जन्म शताब्दी


श्रीपूज्य श्री जिन विजयेंद्र सूरी जी बीकानेर गद्दी के श्रीपूज्यों की परंपरा के महान संत थे. उनका सरल स्वभाव, उज्वल चरित्र एवं सर्वोपरि जिन धर्म के प्रति उनकी निष्ठां अतुलनीय थी. खरतर गच्छ में श्रीपूज्यों की कई गद्दियां थी जिनमे से बीकानेर, जयपुर एवं लखनऊ की गद्दिया विशेष रूप से प्रसिद्द थी. इन सबमे भी बीकानेर की गद्दी का सबसे महत्वपूर स्थान था एवं इनके अनुयायी भारत में दूर दूर तक फैले हुए थे.


Bada Upashray Bikaner Rangdi chowk vijayendra suri
बीकानेर बड़ा उपाश्रय में पूजा का एक दृश्य १ 
sripujya jin vijayendra suri bada upashray bikaner
बीकानेर बड़ा उपाश्रय में पूजा का एक दृश्य २ 


बीकानेर के रांगड़ी चौक स्थित बड़ा उपाश्रय इसका मुख्य स्थल था जहाँ पर श्रीपूज्य जी के अतिरिक्त अनेक यतिगण निवास करते थे. उस समय के यतिगण जैन शास्त्रों के अतिरिक्त विधि-विधान, ज्योतिष, मन्त्र, चिकित्सा आदि के भी ज्ञाता होते थे. समाज में इनकी काफी उपयोगिता थी और ये जान साधारण के संकट मोचक के रूप में माने जाते थे. इन लोगों ने विभिन्न विषयों पर बड़े पैमाने पर साहित्य की भी रचना की है. इन सभी यतियों के सिरमौर श्रीपुज्य जी हुआ करते थे और श्रीपूज्य श्री जिन विजयेन्द्र सूरी उन्ही में से एक महत्वपूर्ण श्रीपूज्य जी थे.

Jain Sripujya Sri Jin Vijayendra Suri of Bikaner
श्रीपूज्य जी श्री जिन विजयेंद्र सूरी जी महाराज १ 
 तत्कालीन श्री पूज्य श्री जिन चारित्र सूरी के के देवलोकगमन के पश्चात् जयपुर के विद्वान् यति श्री श्यामलाल जी के आबाल ब्रह्मचारी शिष्य यति श्री विजयलाल जी सुयोग्य जान कर उन्हें बीकानेर की बड़ी गद्दी का श्रीपुज्य बनाने का निश्चय हुआ. श्रीपूज्य बनने के बाद अपनी योग्यता, विद्वत्ता, साधना एवं सरल व परोपकारी स्वभाव से जिन शासन की जबरदस्त सेवा की.

Jain Sripujya Sri Jin Vijayendra Suri of Bikaner
श्रीपूज्य जी श्री जिन विजयेंद्र सूरी जी महाराज २ 
 आपका जन्म आज से सौ वर्ष पूर्व हुआ था और यह उनका जन्म शताब्दी वर्ष है. उल्लेखनीय है की आपकी दीक्षा दादा श्री जिन कुशल सूरी की प्रत्यक्ष दर्शन स्थली मालपुरा में ही हुआ था. वे अत्यंत दयालु प्रवृत्ति के होने के कारण भक्तों के कष्ट हरण में भी तत्पर रहते थे और उनकी विशिष्ट साधना चमत्कार का पर्याय बन गई थी। यहाँ तक की उनके आशीर्वाद से उनके छड़ीदार गोपाल ने दादागुरु के लिए जो लिखा वह गुरु इकतीसा के नाम से जगत प्रसिद्द हो गया. आज भी श्री जिन विजयेंद्र सूरी के छड़ीदार गोपाल की रचना गुरु इकतीसा भक्तों के कंठ में बसी है और भक्त गन उसे मनोवांछित पूरक और संकटमोचक मानते हैं.
Jain Sripujya Sri Jin Vijayendra Suri at Azimganj Kothari family
श्रीपूज्य जी श्री जिन विजयेंद्र सूरी जी महाराज अजीमगंज में  
बीकानेर के बाद अजीमगंज की गद्दी दूसरे स्थान में मानी जाती थी और वो भी उनकी कर्मभूमि रही. वहां पर भी उन्होंने कई चौमासे किये और उसे भी अपनी तपोभूमि बनाई। अजीमगंज के बड़ी पौषाल में होनेवाले उनके प्रवचन में केवल जैन ही नहीं अपितु बड़ी संख्या में अजैन भी उपस्थित होते थे.  उस समय यद्यपि मेरा जन्म नहीं हुआ था परंतु हमारा परिवार भी आपके घनिष्ठ संपर्क में रहता था.

खरतर गच्छ की अपनी परंपरा से बंधे होने एवं इस गुरुतर दायित्व का निर्वहन करते हुए भी वे किसी मत-पंथ के आग्रही नहीं थे. उनका उदार चरित्र तो केवल जिन शासन की सेवा में ही रत था. अजीमगंज के प्रख्यात चित्रकार श्री इंद्र दुगड़ ने श्री जिन विजयेंद्र सूरी का जो रेखाचित्र बनाया है उसके नीचे लिखी दो पंक्तियाँ इस भाव को सुन्दर रूप से दरसाती है.

"समकित व्रत को निर्मल कर लो, मारने से मत घबराओ.
व्यर्थ पंथ, मत, वाद आदि में अपना मन मत भरमाओ".

सं १९६३ में मात्र ४७ वर्ष की अल्पायु में देवलोकगमन से पूर्व ही आपने जिन शासन की सेवा के इतने काम किये की उसका वर्णन करना मुश्किल है. जैन शासन के इस जाज्वल्यमान नक्षत्र को वंदन करते हुए हम भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.
श्री महावीर स्वामी मन्दिर, कोलकाता का सार्द्ध शताब्दी महोत्सव

Thanks,
Jyoti Kothari
(Jyoti Kothari, Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur represents Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is adviser, Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also ISO 9000 professional)

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