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Tuesday, December 27, 2016

साधुकीर्ति रचित सत्रह भेदी पूजा का अर्थ


१६वीं सदी के विद्वान् जैन मुनि साधुकीर्ति रचित सत्रह भेदी पूजा जैन साहित्य भंडार का अनमोल रत्न है. यह भक्ति साहित्य का उत्कृष्ट उदहारण है. इसका अर्थ गहन है और इस पूजा के शब्दार्थ एवं भावार्थ को समझना एक कठिन काम है. आज के समय में यह पूजा बहुत कम जगह गाइ जाती है परंतु इसकी उत्कृष्टता के कारण इसका संरक्षण एवं पुनःप्रचालन जैन समाज के लिए लाभकारी है. यहाँ यह भी उलेख करना प्रासंगिक होगा की साधुकीर्ति भी खरतर गच्छ परंपरा के थे जिस गच्छ के श्रीमद देवचंद ने अनेकों उत्कृष्ट भक्ति एवं आध्यात्मिक साहित्य  की रचना की है.

अजीमगंज स्थित श्री नेमिनाथ स्वामी मंदिर 
मेरा बचपन बंगाल प्रान्त के मुर्शिदाबाद जिले के अजीमगंज में बीत और वहां पर यह सत्रह भेदी पूजा बहु प्रचलित है. गुजराती भाषा में इसे સત્તર ભેદી પૂજા  कहते हैं. स्वाभाविक रूप से बचपन से ही यह पूजा सुनते आये हैं. सैंकड़ों बार जिसे भक्ति से गाया हो उसके प्रति अनुराग होना सहज है. इसलिए वर्षों से इच्छा थी की इसका अर्थ किया जाए जिससे लोग इसे समझ सकें और इसका आनंद उठा सकें। परंतु जब ये काम करने लगा तो पता लगा की यह काम सरल नहीं है.

यह पूजा साढ़े चार सौ साल से भी अधिक पुराना है और इतने समय में हिंदी भाषा ने अपना स्वरुप बहुत बदल लिया है, ऐसी स्थिति में शब्दों और पदों का अर्थ करना कठिन हो जाता है. दूसरी कठिनाई ये है की यह रचना बहुभाषी है. इसमें संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश आदि प्राचीन भाषाओँ का बहुतायत से उपयोग हुआ है. साथ ही राजस्थानी, गुजराती, ब्रज, और कहीं कहीं तो मराठी भाषा का भी प्रयोग किया गया है. हो सकता है की कुछ शब्द इसके अतिरिक्त अन्य भाषाओँ में से भी लिया गया हो. जैन साधु प्रगाढ़ पांडित्य के साथ अपनी भ्रमणशीलता के कारण विभिन्न प्रदेशों की भाषा और बोलियों से परिचित होते थे और उनका काव्यों में यात्र तत्र उपयोग करने में नहीं हिचकते थे.

साधुकीर्ति शास्त्रज्ञ होने के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत के भी मर्मज्ञ विद्वान्इ थे. तत्कालीन लब्ध प्रतिष्ठ गायक एवं अकबर के नवरत्नों में से एक तानसेन से भी आपका घनिष्ठ परिचय था. सत्रह भेदी पूजा में उन्होंने अनेक राग-रागिनियों का इस्तेमाल किया है साथ ही संगीत की बारीकियां बतानेवाले कई श्लोक व पदों का भी समावेश इसमें किया है. यदि इसे पुराणी शास्त्रीय रागों में गा कर उसकी CD बना ली जाए तो ये काम बहुत उपयोगी होगा एवं जैन संस्कृति के संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

भक्ति के माध्यम से होनेवाली संवर-निर्जरा के प्रसंग और कारणों की भी पूजा में संदर्भानुसार व्याख्या की गई है. द्रव्य पूजा किस प्रकार भाव पूजा में रूपांतरित होती है उसे भी दर्शाया गया है. उपरोक्त विभिन्न कारणों से सत्रह भेदी पूजा का अर्थ करना एक दुरूह काम है. परंतु इस काम को करने की मेरी भावना मुझे लगातार इस काम को करने प्रेरणा देती रहती है.

मेरी ईस भावना में सहयोगी बनी मेरी धर्मपत्नी ममता और उसके साथ अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विधिकारक श्री यशवंत गोलेच्छा। उन दोनों ने कहा की आप मौखिक अर्थ करें और हम उसे लिख लेंगे। इस तरह इस पर काम करना चालु हुआ. मैं इन दोनों का आभारी हूँ जिन्होंने इस सुन्दर काम में मुझे निरंतर सहयोग दिया।

अभी कुछ दिनों पहले एक सुन्दर संयोग हुआ जिससे यह काम तेजी से आगे बढ़ गया. आगम मर्मज्ञा विदुषी साध्वी स्व. प्रवर्तिनी श्री सज्जन श्री जी महाराज की सुशिष्या एवं प्रवर्तिनी श्री शशिप्रभा श्री जी महाराज की अज्ञानुवर्तिनी विदुषी साध्वी श्री सौम्यगुणा श्री जी, डी. लिट्, का बाड़मेर चातुर्मास था और एक शिविर में पढ़ाने के लिए मैं वहाँ गया था. मैंने उनसे कहा की सत्रह भेदी पूजा का अर्थ किया जाए और उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दे दी. मैंने मौखिक अर्थ किया और साध्वी जी ने उसे लिखने का परिश्रम किया। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है की विदुषी साध्वी सौम्यगुणा श्री जी ने इस पूजा को अजीमगंज- कोल्कता में प्रचलित पुराणी रागों में गया है जिसे यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं. जहाँ पर सटीक अर्थ नहीं बैठ रहा था या जिन शब्दों का अर्थ समझ में नहीं आ रहा था उनकी एक सूची बना ली.

अब विभिन्न माध्यमों से उन अनजाने-अनसमझे शब्दों के अर्थों की तलाश शुरू हुई और इस कार्य में मनीषी मूर्धन्य श्री सुरेंद्र जी बोथरा का पूर्ण मार्गदर्शन मुझे प्राप्त हो रहा है. आवश्यकतानुसार अन्य विद्वानों से भी सहयोग लिया जाएगा। जिन शब्दों के अर्थ और सन्दर्भ फिर भी नहीं समझ में आएगा उन्हें इस ब्लॉग में विद्वानों के लिए पोस्ट कर दिया जाएगा जिससे किसी को भी अगर अर्थ मालूम हो तो वो मुझे बता सकें। मुझे विश्वास है की आप सभी के सहयोग से जल्दी ही ये काम पूरा हो जायेगा।

आनंदघनजी पर पुस्तक का विमोचन हंगरी दूतावास में


ज्योति कोठारी
जयपुर
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Thursday, December 15, 2016

जयपुर में खरतर गच्छीय मेरुरत्नसागर जी की दीक्षा संपन्न


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जयपुर के मानसरोवर स्थित मीरा मार्ग जैन मंदिर में खरतर गच्छीय प् पू गणिवर्य श्री मणिरत्न सागर जी महाराज एवं तपागच्छीय महत्तर साध्वी श्री सुमंगला श्री जी की शिष्या श्री कुसुमप्रभा श्री जी महाराज आदि ठाना  की निश्रा में बाड़मेर (हाल इरोड) निवासी श्री मोहनलाल जी बोथरा (पुत्र श्री आशुलाल जी एवं श्रीमती सीतादेवी) की छोटी दीक्षा संपन्न हुई. दीक्षा के पश्चात् दीक्षाप्रदाता गुरु गणिवर्य श्री मणिरत्न सागर जी ने  नवदीक्षित मुनि को श्री मेरुरत्नसागर का नाम दिया। नामकरण की बोली श्री महेश जी महमवाल ने ली. यह सभी कार्यक्रम खरतर गच्छाधिपति प् पू श्री मणिप्रभ सूरीश्वर जी महाराज की आज्ञा से संपन्न हुआ.

मेरुरत्नसागर जी को दीक्षा विधि कराते हुए गणिवर्य श्री मणिरत्न सागर जी 
मानसरोवर स्थित श्री आदिनाथ जिनमंदिर एवं निर्माणाधीन दादाबाड़ी प्रांगण में १० दिसम्बर २०१६, मौन एकादशी को प्रातः काल शुभ मुहूर्त में दीक्षा विधि प्रारम्भ हुई एवं गणिवर्य श्री ने स्वयं यह विधि सम्पूर्ण करवाई। सर्वप्रथम कार्यक्रम का शुभारम्भ करते हुए मानसरोवर संघ के मंत्री श्री महेश जी महमवाल ने आगंतुकों का स्वागत किया एवं ऐसा शुभ अवसर प्रदान करने के लिए गणिवर्य श्री  का आभार व्यक्त किया।

मेरुरत्नसागर जी प्रवचन देते हुए साथ में गणिवर्य श्री मणिरत्न सागर जी
दीक्षार्थी भाई के धर्म के माता पिता बने श्री चिमन भाई रंजनबेन मेहता। यहाँ यह उल्लेखनीय है की श्री चिमनभाई स्वयं मुमुक्षु हैं.  उपस्थित श्री संघ द्वारा प्रदत्त ओघा गणिवर्य द्वारा दीक्षार्थी मुनि के हाथ में  प्रदान किया गया; ओघा ले कर नृत्य करते हुए मुनि के जयकारे से पूरा पंडाल गूंज उठा. कार्यक्रम संचालन ओसवाल परिषद्, जयपुर के मंत्री एवं खरतरगच्छ संघ के पूर्व मंत्री ज्योति कोठारी कर रहे थे।

मेरुरत्नसागर जी दीक्षा के वेश में 
इस अवसर को श्री अविनाश जी शर्मा द्वारा टीवी प्रोग्राम के लिए सूट किया गया.  मुल्तान खरतर गच्छ संघ के मंत्री श्री नेमकुमार जी जैन, मालवीयनगर संघ के मंत्री श्री मनोज बुरड़, नित्यानंदनगर संघ के अध्यक्ष श्री हरीश जी पल्लीवाल, श्यामनगर संघ के श्री विजय जी चोरडिया,  आदि जयपुर के विभिन्न संघों के पदाधिकारियों ने सभा को संबोधित किया एवं मुनि श्री के संयम ग्रहण की अनुमोदन की. इसके अतिरिक्त गुड मॉर्निंग अखबार के संपादक श्री सुरेंद्र जी जैन, मानसरोवर संघ के पूर्वमंत्री श्री नरेंद्रराज दुगड़,  सैनिक कल्याण परिषद् के अध्यक्ष श्री प्रेम सिंह जी राजपूत, शंखेश्वर मंदिर  के श्री शालिभद्र हरखावत, धर्म पिता श्री चिमन  एवं माता श्री रंजन बेन, खरतर गच्छ युवा परिषद् के श्री पदम् चौधरी, एवं संयम की भावना रखनेवाले संयम जैन ने भी सभा को संबोधित किया।

अखिल भारतीय खरतर गच्छ प्रतिनिधि महासभा की और से काम्बली ओढाते हुए श्री ज्योति कोठारी ने नवदीक्षित मुनि के सुदीर्घ आगमोक्त मुनिजीवन के लिए शुभकामनाएं दी. उपस्थित अन्य संघों की और से भी मुनि श्री को काम्बली ओढाई गई.

मुम्बई से पधारे हुए श्री दामोदर जी पल्लीवाल, भरतपुर से श्री भूपत जी जैन, सोनीपत से श्री सुब्रत जी जैन, मंडावर से श्री महावीरजी जैन आदि बहार से पधारे हुए गणमान्य व्यक्तियों ने भी सभा को संबोधित किया।

अपने उद्बोधन में गणिवर्य श्री ने बताया की श्री मोहनलाल जी सुदीर्घ काल से धर्माराधना कर रहे हैं एवं उनकी दीक्षा के समय भी वे सारथी बने थे. आपने अपने जीवन में उपधान  आराधना भी  प्रति दिन बियासने का तप करते हैं.  नवदीक्षित मुनि श्री मेरुरत्नसागर जी ने बताया की दस महीने पहले ही उनकी दीक्षा होनेवाली थी परंतु कुछ कारणों से यह उस समय संभव नहीं हो पाया। उन्होंने यह भी बताया की जीवन की क्षणभंगुरता की याद दिला कर किस प्रकार उन्होंने परिवारजनो की स्वीकृति प्राप्त की और खरतर गच्छाधिपति श्री मणिप्रभ सूरीश्वर जी महाराज की आज्ञा एवं गणिवर्य के कर कमलों द्वारा आज यह शुभ अवसर प्राप्त हुआ।  इसके बाद तपागच्छीय महत्तरा साध्वी श्री सुमंगला श्री जी की  शिष्य कुसुमप्रभा श्री जी महाराज ने भी सभा को संबोधित किया और कहा की गणिवर्य श्री का व्यवहार ही उन्हें यहाँ तक खेंच के लाया है।

अंत में संघ की उपाध्यक्षा चंद्रकांता जी ने सभी का आभार व्यक्त किया।

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