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Sunday, October 16, 2016

नेत्रदान के लिए जैन समाज आगे आये


नेत्रदान के लिए जैन समाज आगे आये और कोर्निया अंधत्व से भारत को मुक्ति दिलाये। भारत में नेत्रहीन व्यक्तियों की संख्या लगभग १.५  करोड़ है औरउसमें से लगभग ४० लाख लोग कोर्निया अंधत्व से पीड़ित हैं जिन्हें केवल मृत व्यक्तियों द्वारा दिए गए आँखों का ही सहारा है. आधुनिक तकनीक के कारण मृत व्यक्ति के शरीर से लिए गए एक आँख से तीन व्यक्तियों को रौशनी मिल सकती है अर्थात एक व्यक्ति की दो आँखें ६ व्यक्तियों का जीवन रोशन कर सकती है.
मानव नेत्र एवं कोर्निया 

जैन धर्म कर्मवाद में विश्वास रखता है और उसके अनुसार जो दिया जाता है वही मिलता है. इसलिए इस जीवन में नेत्रदान अगले भव में अच्छे नेत्र दिला सकता है फिर इस पुनीत काम में पीछे क्यों रहना? पूरी दुनिया को सबसे ज्यादा नेत्र श्री लंका से प्राप्त होता है. श्री लंका में बौद्धों की संख्या अधिक है और बौद्ध भी जैनो की तरह कर्मफल में विश्वास रखते हैं. इसलिए वहां नेत्रदान की बहुत अच्छी परंपरा है और यह छोटा सा देश  जरूरतों को पूरा करने के बाद दुनिया भर में आँखें भेजता है - बिना किसी प्रतिदान के!!

जैन समाज भी इस काम में काफी आगे है परंतु इस भावना को और बढ़ने की आवश्यकता है. श्रीलंका की कुल जनसँख्या २ करोड़ है जो की भारत में जैनो की आवादी के बराबर है, यदि जैन लोग भी वहां के निवासियों की तरह समर्पण भाव के साथ आगे आएं तो भारत कोर्निया अन्धत्व से मुक्त हो सकता है. इसके लिए सामाजिक संगठनों  परम पूज्य आचार्य भगवंतों, साधु-साध्वी वृंदों को भी आगे आना होगा।

मुस्लिम समाज अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण नेत्रदान नहीं करता जबकि वृहत्तर हिन्दू  सनातनी समाज भी इस काम में ज्यादा आगे नहीं है. ऐसी स्थिति में जैन समाज इस काम में आगे आ कर एक मिसाल पेश कर सकता है.

इस वर्ष से कोर्निया अंधत्व मुक्त भारत अभियान (CAMBA)  प्रारम्भ किया गया है और इसमें २०१८ तक भारत को इस अभिशाप से मुक्त करने का लक्ष्य रखा गया है. जैन समाज से प्रार्थना है की इस काम में पूरी शक्ति के साथ आगे आये, अपने धर्म का पालन करे और देश को नै रोशनी दे.


कोर्निया अंधत्व मुक्त भारत पर गोष्ठी


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