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Tuesday, October 18, 2016

जैन समाज का अपना ऑनलाइन बाजार जैन मार्केट



जैन मार्केट जैन समाज का अपना ऑनलाइन बाजार है. आज ऑनलाइन शॉपिंग की होड़ है और हज़ारों की तादाद में वेबसाइट इस काम के लिए उपलव्ध है, परंतु जैन समाज के लिए एक ऐसे ऑनलाइन पोर्टल की जरुरत थी जहाँ वे अपना सामान बेच सकें.



जैन समाज मूलतः एक व्यापारिक समाज है और इस समाज के लाखों लोग अपने व्यापर में संलग्न हैं. जैन व्यापारियों में परष्पर सहयोग आजकी प्रतियोगी दुनिया में बहुत आवश्यक है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए जैन मार्केट की शुरुआत की गई है. इसमें कोई भी जैन व्यापारी अथवा उत्पादक अपना सामान बेच सकते हैं. जैन व्यापारियों की साख को देखते हुए ऐसा लगता है की अन्य समाज के लोग यहाँ खरीददारी करने जरूर आएंगे.

जैन समाज में अनेक महिलाएं घरेलु उत्पाद जैसे खाद्य सामग्री, हस्तकला की वस्तुएं आदि बना कर छोटे स्टार पर व्यापर करतीं हैं. उनके लिए भी अपना सामान बेचने के लिए जैन मार्केट बड़ा उपयोगी सावित हो रहा है. इससे वे अपना सामान पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत कर सकती हैं.

जैन समाज अपने धार्मिक, सामाजिक कार्यों के लिए बखूबी जाना जाता है. इस कार्य से सामाजिक उत्तरदायित्वों की भी पूर्ति होती है. इस वेबसाइट में पंजीकृत होना एवं अपने सामान को जोड़ना भी बहुत सरल है. अतः आपसे निवेदन है की यदि आप उत्पादक या व्यापारी हैं तो अपने आपको या अपने प्रतिष्ठान को इसमें रजिस्टर करें और यदि आप सामान्य उपभोक्ता हैं तो इस साइट से सामान की खरीद करने के लिए पंजीकृत हों. आप सभी से यह भी निवेदन है की अपने आसपास के लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करें. इस साइट में पंजीकरण निःशुल्क है.

जैन महिलाओं के लिए उपयोगी वेबसाईट जैन मार्केट


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Sunday, October 16, 2016

नेत्रदान के लिए जैन समाज आगे आये


नेत्रदान के लिए जैन समाज आगे आये और कोर्निया अंधत्व से भारत को मुक्ति दिलाये। भारत में नेत्रहीन व्यक्तियों की संख्या लगभग १.५  करोड़ है औरउसमें से लगभग ४० लाख लोग कोर्निया अंधत्व से पीड़ित हैं जिन्हें केवल मृत व्यक्तियों द्वारा दिए गए आँखों का ही सहारा है. आधुनिक तकनीक के कारण मृत व्यक्ति के शरीर से लिए गए एक आँख से तीन व्यक्तियों को रौशनी मिल सकती है अर्थात एक व्यक्ति की दो आँखें ६ व्यक्तियों का जीवन रोशन कर सकती है.
मानव नेत्र एवं कोर्निया 

जैन धर्म कर्मवाद में विश्वास रखता है और उसके अनुसार जो दिया जाता है वही मिलता है. इसलिए इस जीवन में नेत्रदान अगले भव में अच्छे नेत्र दिला सकता है फिर इस पुनीत काम में पीछे क्यों रहना? पूरी दुनिया को सबसे ज्यादा नेत्र श्री लंका से प्राप्त होता है. श्री लंका में बौद्धों की संख्या अधिक है और बौद्ध भी जैनो की तरह कर्मफल में विश्वास रखते हैं. इसलिए वहां नेत्रदान की बहुत अच्छी परंपरा है और यह छोटा सा देश  जरूरतों को पूरा करने के बाद दुनिया भर में आँखें भेजता है - बिना किसी प्रतिदान के!!

जैन समाज भी इस काम में काफी आगे है परंतु इस भावना को और बढ़ने की आवश्यकता है. श्रीलंका की कुल जनसँख्या २ करोड़ है जो की भारत में जैनो की आवादी के बराबर है, यदि जैन लोग भी वहां के निवासियों की तरह समर्पण भाव के साथ आगे आएं तो भारत कोर्निया अन्धत्व से मुक्त हो सकता है. इसके लिए सामाजिक संगठनों  परम पूज्य आचार्य भगवंतों, साधु-साध्वी वृंदों को भी आगे आना होगा।

मुस्लिम समाज अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण नेत्रदान नहीं करता जबकि वृहत्तर हिन्दू  सनातनी समाज भी इस काम में ज्यादा आगे नहीं है. ऐसी स्थिति में जैन समाज इस काम में आगे आ कर एक मिसाल पेश कर सकता है.

इस वर्ष से कोर्निया अंधत्व मुक्त भारत अभियान (CAMBA)  प्रारम्भ किया गया है और इसमें २०१८ तक भारत को इस अभिशाप से मुक्त करने का लक्ष्य रखा गया है. जैन समाज से प्रार्थना है की इस काम में पूरी शक्ति के साथ आगे आये, अपने धर्म का पालन करे और देश को नै रोशनी दे.


कोर्निया अंधत्व मुक्त भारत पर गोष्ठी


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Saturday, October 8, 2016

आज से नवपद ओली का प्रारम्भ



आज ८ अक्टूबर २०१६ से नवपद ओली (आश्विन) का प्रारम्भ हुआ और आज प्रथम पद देवाधिदेव श्री अरिहंत परमात्मा की आराधना की गई. पुरे भारत में ही नहीं विश्व के कोने कोने में जहाँ भी जैन लोग रहते हैं वहां पर पुरे उत्साह के साथ नवपद ओली की आराधना की जाती है. प्रतिवर्ष आश्विन एवं चैत्र मॉस की शुक्ल सप्तमी से पूर्णिमा तक ९ दिन ९ पदों की आराधना की जाती है.

नवपद, श्री नेमिनाथ स्वामी मंदिर, अजीमगंज 
जैन शास्त्रों के अनुसार श्रीपाल का कोढ़ रोग दूर करने के लिए मयनसुंदरी ने गुरुमुख से नवपद की महिमा सुन कर नवपद ओली की आराधना की थी. श्रीपाल-मैनासुन्दरी द्वारा सिद्धचक्र तंप करने से यह जगत में प्रसिद्द हुआ और तब से बड़ी संख्या में लोग नवपद ओली की आराधना ९ दिन आयंबिल कर करते आ रहे हैं.

इन ९ दिनों में अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु, सम्यग दर्शन, ज्ञान, चारित्र एवं टप पद की आराधना की जाती है एवं इनके वर्णानुसार क्रमशः चावल, गेहूं, चना, मुंग, उडद एवं अंत के ४ दिन फिर से चावल की आयंबिल की जाती है एवं विधि पूर्वक नवपदों (सिद्धचक्र) की उपासना कर मोक्ष मार्ग को प्रशस्त किया जाता है.

अधिक जानने के लिए पढ़ें
The Navpad Oli (Ayambil) Festival of India's Jain Community 


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