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Monday, October 19, 2015

ऋषिमण्डल स्तोत्र व मन्त्र का अंतरंग गूढ़ रहस्य


ह्रीं- ऋषिमण्डल वीजमन्त्र 
श्री ऋषिमण्डल स्तोत्र एक महाप्रभाविक स्तोत्र है एवं इसकी महिमा अपरम्पार है. इस स्तोत्र के विधिपूर्वक पाठ करने से आठ महीने के अंदर ही महा तेजस्वी अर्हत बिम्ब के दर्शन होते हैं एवं उस बिम्ब के दर्शन करनेवाला साधक आठ भव के अंदर ही मोक्ष प्राप्त करता है. इसके साथ ही वह साधक सभी प्रकार के इहलोक / परलोक सम्वन्धी भय से भी मुक्त होता है और सभी सांसारिक सुख-समृद्धि भी प्राप्त करता है.

ऐसा क्यों होता है और इस स्तोत्र व मन्त्र में ऐसी क्या चीज है इसे जानने के लिए इस के अंतरंग गूढ़ रहस्य को जानना जरूरी है. स्वयं स्त्रोत्रकर्ता ने ऋषिमण्डल स्तोत्र की पहली दो गाथा में इसका उत्तर दे दिया है.

आद्यन्ताक्षर संलक्ष्यमक्षरम्, व्याप्य यत्स्थितम्
अग्निज्वाला समं नादम्, विंदू रेखा समन्वितम्।।

अग्निज्वाला समाक्रान्तम्, मनोमल विशोधकम्
देदिप्यमानम् हृत्पद्मे, तत्पदं नौमि निर्मलम।

गाथा रहस्य: संस्कृत भाषा एवं देवनागरी लिपि का आदि अर्थात प्रथम अक्षर "अ" एवं अंतीम अक्षर "ह" है तथा इन दोनों अक्षरों को जोड़ने से बनता है "अह". अ और ह के बीच में वर्णमाला के सभी अक्षर आ जाते हैं. और सम्पूर्ण शब्दावली इन्ही अक्षरों से बनती है. अर्थात जगत के समस्त पदार्थों को इन अक्षरों के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता है.

जैसे अंग्रेजी भाषा में "A to Z" का अर्थ होता है सब कुछ उसी प्रकार इन दोनों अक्षरों के बीच में रहे हुए अक्षरों के विन्यास से जो बन सकता है उसका अर्थ होता है सब कुछ. अंग्रेजी भाषा का "A to Z" हिंदी/संस्कृत के "अह" का पर्यायवाची है.

संस्कृत वर्णमाला में प वर्ग अर्थात प,फ, ब, भ, एवं  म, (व्यंजन) आकाश तत्व का द्योतक है एवं म विशुद्ध आकाश तत्व है. प वर्ग के उच्चारण करते समय मुह बंद हो जाता है. अह के साथ म जुड़ने से अहम् शब्द बनता है और यह बहुत ही महत्वपूर्ण शब्द है. यह अर्थात सम्पूर्ण जगत एवं म (आकाश तत्व), जैसे आकाश सभी को अपने में समां लेता है; और जैसे मुह बंद होने पर अंदर गई हुई चीज अंदर ही रह जाती है वैसे ही "अहम्" में व्यक्ति सब कुछ को अपने में समाते हुए महसूस करता है.

इसका गंभीर रहस्य ये है की अहं के विकार से ग्रस्त व्यक्ति ऐसा मानता एवं चाहता है की सम्पूर्ण जगत वही है और सारा जगत उसी के इर्दगिर्द घूमता रहे. ऐसी मानसिकता वाले जीव को अहंकारी या घमंडी भी कहा जाता है.  यही अहम जीव को संसार में परिभ्रमण करवाता है और मुक्ति का द्वार बंद कर देता है.

संस्कृत भाषा में र को अग्नीवीज माना गया है, जब इस अहं शब्द में रेफ की मात्रा जुड़ जाती है तो "अर्हम" शब्द बन जाता है और जैसे अग्नि सब कुछ भस्म कर देती है उसी प्रकार अहम् में रेफ लगने का अर्थ होता है अहंकार का भष्म होना। अहंकार नष्ट होने पर ही जीव अर्हम बन जाता है अर्थात जगत पूज्य वीतराग अरिहंत हो जाता है. उसके सभी दुःख समाप्त हो जाते हैं.

ऋषिमण्डल स्तोत्र में यही दुर्लभ रहस्य छुपा हुआ है और जो व्यक्ति इसे हृदयंगम कर अपने अहम को नष्ट करता हुआ चलता है उसे किसी भी वस्तु की आकांक्षा नहीं रहती, आकांक्षा से रहित वह व्यक्ति सर्वत्र निर्भय हो कर विचरण करता है, पापबंध से रहित वह पुण्यात्मा जगत में सुख व समृद्धि प्राप्त करता है और अंत में मोक्ष रूप शास्वत सुख का वरण करता है. सम्पूर्ण कर्म का क्षय कर, समस्त दुखों से निवृत्त वह जीव परम शांति को प्राप्त होता है.

ऋषिमण्डल मन्त्र भी अरहंत के आश्रय से बना हुआ है एवं सिद्धचक्र का वीज उसमे समाहित है अतः उसके निरंतर जप, मनन, ध्यान, एवं निदिध्यासन से जीव सर्वकर्म रहित हो कर सिद्धि गति का वरण करता है. ऋषिमण्डल स्तोत्र व मन्त्र के रहस्य को इस प्रकार जान कर निरंतर इसके अभ्यास में दत्त चित्त होना इसलोक एवं परलोक के लिए श्रेयष्कर है.

जैन साधू साध्विओं के चातुर्मास की शास्त्रीय (आगमिक) विधि


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Friday, October 9, 2015

यांत्रिक कत्लखानों- मांस निर्यात के विरोध में आंदोलन ६ दिसंबर से

श्री श्री रविशंकर, जगतगुरु शंकराचार्य एवं मुनि श्री मैत्रीप्रभसागर 
प पू  जीवदया प्रेमी मुनि श्री मैत्रीप्रभ सागर जी महाराज यांत्रिक कत्लखानों एवं मांस निर्यात के विरोध में ६ दिसंबर से आंदोलन करेंगे. यह घोषणा उन्होंने कल ८ अक्टूबर को जयपुर के सवाई मनसिंह इन्वेस्टमेंट ग्राउंड से "हिन्दू आध्यात्मिक एवं सेवा मेला" के उदघाटन अवसर पर किया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा आयोजित इस मेले के उद्घाटन के अवसर पर संघ के सह सर कार्यवाहक डा कृष्णगोपाल, प्रमुख चिंतक एस गुरुमूर्ति, सेवा भारती के प्रमुख श्री गुणवंत जी कोठारी सहित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनेक पदाधिकारी मौजूद थे।  इस के अतिरिक्त देशभर से आये हुए सनातन हिन्दू धर्म के पूज्य शंकराचार्य एवं अनेक अन्य संत व बौद्ध, सिख आदि धर्मो के अनेक धर्मगुरुओं के साथ आर्ट ऑफ़ लिविंग के प्रणेता श्री श्री रविशंकर भी मंच पर आसीन थे.

ऐसे विशिष्ट अवसर एवं गणमान्य लोगों व ५० हज़ार से अधिक जनता के बीच मुनि श्री मैत्रीप्रभ सागर जी ने यह घोषणा की. उन्होंने यांत्रिक कत्लखानो से होनेवाले नुक्सान से लोगों को अवगत कराया और कहा की भारत से मांस निर्यात पर पूर्ण प्रतिवंध होना चाहिए। इसे अंजाम देने के लिए उन्होंने भगवन महावीर के दीक्षा दिवस (६ दिसम्बर, २०१५) से जयपुर से अान्दोलन प्रारम्भ करने की घोषणा की. जीवदया प्रेमी मुनि श्री मैत्रीप्रभ सागर जी के आह्वान का उपस्थित मंचासीन संतों एवं विशाल जनसमूह ने करतल ध्वनि से स्वागत किया।

उल्लेखनीय है की  मुनि श्री मैत्रीप्रभ सागर जी ने यांत्रिक कत्लखानों के विरोध में अनेक बार अनशन किया है एवं उनके सद-प्रयासों से उत्तरप्रदेश में आठ एवं राजस्थान के दूदू में एक कत्लखाने को निरस्त किया गया. आप का जीवन अत्यंत त्याग तपस्यामय है एवं जीवन का मुख्य उद्देश्य जीवदया है. भगवान महावीर के "अहिंसा परमो धर्मः" के सिद्धांत के आधार पर चलनेवाले यह मुनि खरतर गच्छीय गणाधीश श्री मणिप्रभ सागर जी के शिष्य हैं एवं आपकी तीन सांसारिक बहाने व एक भतीजी ने भी भगवती दीक्षा अंगीकार कर साध्वियों के रूप में विचरण कर रही हैं.

हम मुनि श्री के इस प्रयास की पुनः पुनः अनुमोदना करते हैं एवं सभी जीवदया प्रेमी महानुभावों से निवेदन करते हैं की इस आंदोलन को सफल बनाने में तन मन धन से योगदान करें।

Ravishankar inaugurated Hindu Spiritual and Service Fair in Jaipur


ज्योति कोठारी,
संयोजक,
सकल जैन समाज, जयपुर

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