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Sunday, August 23, 2015

संथारे के अधिकार के लिए जैन समाज का भारतव्यापी विरोध कल

Sallekhna Santhara Protest by Jain community against Court order
Protest in favor of Santhara (Sallekhna)

सभी जैन बंधू कृपया ध्यान रखें - संथारे (संलेखना) के अधिकार के लिए जैन समाज का भारतव्यापी विरोध कल २४ अगस्त, सोमवार को है. अपने अपने स्थान पर हो रहे विरोध प्रदर्शन के कार्यक्रम में जरूर भाग लें एवं अधिक से अधिक लोगों को इसके लिए प्रेरित करें यही प्रार्थना है.  दिगंबर, श्वेताम्बर, मन्दिरमार्गी, तेरापंथी, बीसपन्थी, स्थानकवासी सभी समुदाय ने एक हो कर राजस्थान उच्च न्यायालय के फैसले का विरोध किया है. पुरे भारत में स्थान स्थान पर विरोध प्रदर्शन हो रहा है एवं जैन समाज का प्रतिनिधि मंडल देश के कानून मंत्री श्री सदानंद गौड़ा से भी मिल चूका है.

अब कल मुख्य दिन है और भारत भर के जैन संगठनो एवं पूज्य साधु संतो ने मिल कर सामूहिक शांतिपूर्ण विरोध करने का निर्णय लिया है. कल जैन समाज के लोग अपने प्रतिष्ठानो को बंद रखेंगे, शांतिपूर्ण मौन जुलुश निकालेंगे, सरकारी अधिकारीयों को ज्ञापन देंगे, सभाएं कर अपना विरोध प्रदर्शन करेंगे।

गौरतलब है की राजस्थान उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायाधीशों ने जैन धर्म एवं आगमो के तर्क एवं उनकी भावनाओं को समझे बगैर ही संथारे को आत्म-हत्या घोषित कर इसे कानूनन अपराध ठहरा दिया। इससे पूरा जैन समाज उद्वेलित हो उठा है एवं इसका विरोध किया जा रहा है।

संलेखना जैन धर्म साधना की एक आवश्यक प्रक्रिया है एवं सभी साधक के मन में यह भावना रहती है की वह संलेखना पूर्वक ही देह-त्याग करे. प्रतिदिन रात्रि में संथारे का पाठ करते हुए वह यह भावना करता है.

संथारे के अतिचारों (दोषों) को आगम में इस प्रकार बताया गया है:
"इहलोगा संसप्पओगे, परलोगा संसप्पओगे, जीविया संसप्पओगे, मरणा संसप्पओगे, कामभोगा संसप्पओगे," अर्थात इसलोक, परलोक से सम्बंधित किसी इच्छा से, जीने की इच्छा से अथवा मरने की इच्छा से या किसी भोग प्राप्ति की इच्छा से संलेखना (संथारा) करना दोषपूर्ण है. जीने एवं मरने की इच्छा से रहित हो कर किया गया संथारा आत्महत्या कैसे हो सकता है? वस्तुतः संथारा आत्मसाधना एवं समता, निस्पृहता की उत्कृष्ट अवस्था है जहाँ साधक जीवन और मृत्यु के पार चला जाता है. यही योगदर्शन की समाधी एवं गीता का अनासक्त योग (स्थितप्रज्ञता) है.

जैन धर्म की मूल भावना को समझे बगैर राजस्थान उच्च न्यायालय ने जो फैसला दिया है आशा की जा सकती है माननीय उच्चतम न्यायालय उसे अवश्य बदल देगा और जैन समाज अपनी धार्मिक भावना को अक्षुण्ण रख सकेगा।  तब तक हमें जागते रहना होगा और ये भी प्रयास करना होगा की भारत की संसद जैनो की भावना को समझते हुए धरा ३०९ में बदलाव करे एवं संथारे के अधिकार को बनाये रखे.

जयपुर में भी कल यह विरोध प्रदर्शन व्यापक रूप से होगा एवं प्रातः १० बजे रामलीला मैदान से मौन जुलुश निकाला जायेगा जो की चौड़ा रास्ता, त्रिपोलिया, बड़ी चौपड़, जोहरी बाजार होते हुए महावीर स्कूल, सी-स्कीम पहुंचेगा जहाँ एक बड़ी सभा को उपश्थित साधु संत एवं वक्तागण सम्बोधित करेंगे।

ज्योति कोठारी,
सकल जैन समाज, जयपुर

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संथारा के अधिकार के लिए इतिहास दोहराने की जरुरत

Jain communities unite to protest the Judgement against Santhara

दैनिक भास्कर में संथारा पर परिचर्चा
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