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Thursday, August 20, 2015

दैनिक भास्कर में संथारा पर परिचर्चा





Santhara Samlekhna debate at Dainik Bhaskar jyoti kothari Jaipur
Debate on Santhara at Dainik Bhaskar
दैनिक भास्कर समाचार पत्र के जयपुर कार्यालय में आज संथारा पर परिचर्चा आयोजित की गई. इस परिचर्चा में जयपुर जैन समाज के गणमान्य लोगों ने भाग ले कर इस सामयिक एवं ज्वलंत विषय पर अपने मत प्रगट किये। सभा में सर्व श्री पद्मविभूषण डी आर मेहता, डा कुसुम जैन, माननीय न्यायमूर्ति (से. नि.) जसराज चोपड़ा, ज्योति कोठारी, विमल डागा, राजेन्द्र बरडिया, अधिवक्ता हेमंत नाहटा एवं हेमंत सोगानी, मानचंद खंडेला, डा विमल जैन आदि जैन समाज के विशिष्ट व्यक्तियों ने भाग लिया एवं अपने विचार प्रस्तुत किये. इसके अतिरिक्त समाज के कई अन्य विशिष्ट व्यक्ति भी संमिलित थे.

सभा में उपस्थित लगभग सभी ने संथारा (सल्लेखना) को जैन धर्म का आवश्यक अंग बताते हुए माननीय उच्च न्यायालय के फैसले को दुर्भाग्य पूर्ण बताया। पद्मविभूषण डी आर मेहता ने संथारे की व्याख्या कर कहा की जैनो की इस धार्मिक परंपरा का निर्वाह विनोबा भावे जैसे राष्ट्रपुरुष ने भी किया एवं तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के आग्रह पर भी संथारा नहीं तोडा। उन्होंने कहा की ऋषि अरविन्द ने भी अपने अंतिम तीन दिन संथारे में गुजारे  थे एवं प्रसिद्द बौद्ध विद्वान एवं हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर धर्मानंद कोसाम्बी ने भी संथारे पूर्वक देहत्याग किया था. अधिवक्ता हेमंत नाहटा ने कहा की एक व्यक्ति जिसकी जैन धर्म में कोई आस्था न हो एवं जिसे जैन धर्म एवं परंपरा का कोई ज्ञान न हो ऐसा व्यक्ति कैसे जैन धर्म की एक प्राचीन परंपरा एवं सिद्धांत के खिलाफ याचिका दायर कर सकता है एवं कैसे न्यायाकय उसका संज्ञान ले सकता है?

डा कुसुम जैन ने अपने विद्वत्तापूर्ण वक्तव्य में संतरे के स्वरुप पर विस्तृत प्रकाश डाला एवं कहा की आत्महत्या आवेश में लिया गया निर्णय होता है, यह एक पलायनवादी मानसिकता का द्योतक है जबकि संथारा स्वस्थ एवं स्थिर  विवेक पूर्वक लिया गौए निर्णय है. आत्महत्या प्रायः छुप कर एवं छिपाकर किया जाता है क्योंकि यह एक निंदनीय कृत्य है जबकि संथारा सबके सामने, संवंधित व्यक्तियों की रज़ामंदी से आत्मा साधना के लिए लिया जाता है/ इसमें न जीने की न मरने की इच्छा होती है वल्कि समता पूर्वक अनिवार्य मृत्यु का सामना किया जाता है.

अधिवक्ता हेमंत सोगानी ने संथारे के धार्मिक एवं कानूनी पक्षों की व्याख्या करते हुए माननीय उच्च न्यायालय के फैसले से अपनी घोर असहमति जताई। डा विमल जैन ने पुरुषार्थ सिध्युपाय ग्रन्थ से उद्धरण दे कर संतरे की प्रासंगिकता को सिद्ध किया एवं कहा की सभी जैन साधकों के मन में यह मनोरथ रहता है की उसकी मृत्यु सल्लेखना व समाधी के बगैर न हो.

ज्योति कोठारी ने कहा की जैन शाश्त्रों में इंगीनी मरण जैसे आत्महत्या के कुछ उपायों की चर्चा है एवं उन्हें पाप एवं दुर्गति का कारन बताते हुए उसकी भर्तस्ना की गई है, फिर वह आगम आत्महत्या को कैसे अच्छा बता सकता है? अतः संथारा (संलेखना) आत्महत्या नहीं है. उन्हों कहा की कोई वीर क्रन्तिकारी अपनी मातृभूमि के लिए बलिदान देता है तो क्या वो आत्महत्या है? संथारा वीरों का कार्य है जबकि आत्महत्या पलायनवादी मानसिकता के साथ किया गया कायरों का कार्य है।  साधक मुनि गण एवं विशेष योग्यता युक्त गृहस्थ साधक पहले पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत, एवं चार शिक्षा व्रतों का लम्बे समय तक पालन करते हैं, ग्यारह प्रतिमाओं का अभ्यास करते हैं उसके बाद संथारा जैसे कठिन व्रत की और अग्रसर होते हैं।  उन्होंने यह भी बताया की कुछ पाश्चात्य विद्वानो ने भी इस विषय पर शोध किया है जिनमे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेम्स लैडला ने जयपुर में रहकर यह शोध किया था (देखें: रिचेस एंड रिनान्सिएसन).

माननीय न्यायमूर्ति (से. नि.) जसराज चोपड़ा ने कहा की जैनो पर यह संकट की घडी है एवं जैन समाज इसका सामना करने के लिए तैयार है. उन्होने प्रश्न किया की क्या मीडिया इस कार्य में जैनो के साथ है? उन्होंने आगे कहा की न्यायालय की लड़ाई वहीँ लड़ी जाएगी एवं इसके लिए जैन समाज को संगठित हो कर काम करना होगा एवं अच्छे से अच्छे वकीलों के द्वारा इस मामले की पैरवी करवानी होगी। इसके साथ ही सरकार पर दवाव बना कर धरा ३०९ में संशोधन करवाया जा सकता है एवं संथारे को इस कणों के दायरे से बाहर रखवाया जा सकता है. इसके लिए आंदोलन का रास्ता अपनाया जा सकता हो।

कार्यक्रम का संयोजन दैनिक भास्कर, जयपुर के पत्रकार चंद्रशेखर कौशिक ने किया।

ज्योति कोठारी,
सकल जैन समाज, जयपुर 

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संथारा के अधिकार के लिए इतिहास दोहराने की जरुरत

Jain communities unite to protest the Judgement against Santhara







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