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Monday, October 19, 2015

ऋषिमण्डल स्तोत्र व मन्त्र का अंतरंग गूढ़ रहस्य


ह्रीं- ऋषिमण्डल वीजमन्त्र 
श्री ऋषिमण्डल स्तोत्र एक महाप्रभाविक स्तोत्र है एवं इसकी महिमा अपरम्पार है. इस स्तोत्र के विधिपूर्वक पाठ करने से आठ महीने के अंदर ही महा तेजस्वी अर्हत बिम्ब के दर्शन होते हैं एवं उस बिम्ब के दर्शन करनेवाला साधक आठ भव के अंदर ही मोक्ष प्राप्त करता है. इसके साथ ही वह साधक सभी प्रकार के इहलोक / परलोक सम्वन्धी भय से भी मुक्त होता है और सभी सांसारिक सुख-समृद्धि भी प्राप्त करता है.

ऐसा क्यों होता है और इस स्तोत्र व मन्त्र में ऐसी क्या चीज है इसे जानने के लिए इस के अंतरंग गूढ़ रहस्य को जानना जरूरी है. स्वयं स्त्रोत्रकर्ता ने ऋषिमण्डल स्तोत्र की पहली दो गाथा में इसका उत्तर दे दिया है.

आद्यन्ताक्षर संलक्ष्यमक्षरम्, व्याप्य यत्स्थितम्
अग्निज्वाला समं नादम्, विंदू रेखा समन्वितम्।।

अग्निज्वाला समाक्रान्तम्, मनोमल विशोधकम्
देदिप्यमानम् हृत्पद्मे, तत्पदं नौमि निर्मलम।

गाथा रहस्य: संस्कृत भाषा एवं देवनागरी लिपि का आदि अर्थात प्रथम अक्षर "अ" एवं अंतीम अक्षर "ह" है तथा इन दोनों अक्षरों को जोड़ने से बनता है "अह". अ और ह के बीच में वर्णमाला के सभी अक्षर आ जाते हैं. और सम्पूर्ण शब्दावली इन्ही अक्षरों से बनती है. अर्थात जगत के समस्त पदार्थों को इन अक्षरों के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता है.

जैसे अंग्रेजी भाषा में "A to Z" का अर्थ होता है सब कुछ उसी प्रकार इन दोनों अक्षरों के बीच में रहे हुए अक्षरों के विन्यास से जो बन सकता है उसका अर्थ होता है सब कुछ. अंग्रेजी भाषा का "A to Z" हिंदी/संस्कृत के "अह" का पर्यायवाची है.

संस्कृत वर्णमाला में प वर्ग अर्थात प,फ, ब, भ, एवं  म, (व्यंजन) आकाश तत्व का द्योतक है एवं म विशुद्ध आकाश तत्व है. प वर्ग के उच्चारण करते समय मुह बंद हो जाता है. अह के साथ म जुड़ने से अहम् शब्द बनता है और यह बहुत ही महत्वपूर्ण शब्द है. यह अर्थात सम्पूर्ण जगत एवं म (आकाश तत्व), जैसे आकाश सभी को अपने में समां लेता है; और जैसे मुह बंद होने पर अंदर गई हुई चीज अंदर ही रह जाती है वैसे ही "अहम्" में व्यक्ति सब कुछ को अपने में समाते हुए महसूस करता है.

इसका गंभीर रहस्य ये है की अहं के विकार से ग्रस्त व्यक्ति ऐसा मानता एवं चाहता है की सम्पूर्ण जगत वही है और सारा जगत उसी के इर्दगिर्द घूमता रहे. ऐसी मानसिकता वाले जीव को अहंकारी या घमंडी भी कहा जाता है.  यही अहम जीव को संसार में परिभ्रमण करवाता है और मुक्ति का द्वार बंद कर देता है.

संस्कृत भाषा में र को अग्नीवीज माना गया है, जब इस अहं शब्द में रेफ की मात्रा जुड़ जाती है तो "अर्हम" शब्द बन जाता है और जैसे अग्नि सब कुछ भस्म कर देती है उसी प्रकार अहम् में रेफ लगने का अर्थ होता है अहंकार का भष्म होना। अहंकार नष्ट होने पर ही जीव अर्हम बन जाता है अर्थात जगत पूज्य वीतराग अरिहंत हो जाता है. उसके सभी दुःख समाप्त हो जाते हैं.

ऋषिमण्डल स्तोत्र में यही दुर्लभ रहस्य छुपा हुआ है और जो व्यक्ति इसे हृदयंगम कर अपने अहम को नष्ट करता हुआ चलता है उसे किसी भी वस्तु की आकांक्षा नहीं रहती, आकांक्षा से रहित वह व्यक्ति सर्वत्र निर्भय हो कर विचरण करता है, पापबंध से रहित वह पुण्यात्मा जगत में सुख व समृद्धि प्राप्त करता है और अंत में मोक्ष रूप शास्वत सुख का वरण करता है. सम्पूर्ण कर्म का क्षय कर, समस्त दुखों से निवृत्त वह जीव परम शांति को प्राप्त होता है.

ऋषिमण्डल मन्त्र भी अरहंत के आश्रय से बना हुआ है एवं सिद्धचक्र का वीज उसमे समाहित है अतः उसके निरंतर जप, मनन, ध्यान, एवं निदिध्यासन से जीव सर्वकर्म रहित हो कर सिद्धि गति का वरण करता है. ऋषिमण्डल स्तोत्र व मन्त्र के रहस्य को इस प्रकार जान कर निरंतर इसके अभ्यास में दत्त चित्त होना इसलोक एवं परलोक के लिए श्रेयष्कर है.

जैन साधू साध्विओं के चातुर्मास की शास्त्रीय (आगमिक) विधि


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Friday, October 9, 2015

यांत्रिक कत्लखानों- मांस निर्यात के विरोध में आंदोलन ६ दिसंबर से

श्री श्री रविशंकर, जगतगुरु शंकराचार्य एवं मुनि श्री मैत्रीप्रभसागर 
प पू  जीवदया प्रेमी मुनि श्री मैत्रीप्रभ सागर जी महाराज यांत्रिक कत्लखानों एवं मांस निर्यात के विरोध में ६ दिसंबर से आंदोलन करेंगे. यह घोषणा उन्होंने कल ८ अक्टूबर को जयपुर के सवाई मनसिंह इन्वेस्टमेंट ग्राउंड से "हिन्दू आध्यात्मिक एवं सेवा मेला" के उदघाटन अवसर पर किया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा आयोजित इस मेले के उद्घाटन के अवसर पर संघ के सह सर कार्यवाहक डा कृष्णगोपाल, प्रमुख चिंतक एस गुरुमूर्ति, सेवा भारती के प्रमुख श्री गुणवंत जी कोठारी सहित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनेक पदाधिकारी मौजूद थे।  इस के अतिरिक्त देशभर से आये हुए सनातन हिन्दू धर्म के पूज्य शंकराचार्य एवं अनेक अन्य संत व बौद्ध, सिख आदि धर्मो के अनेक धर्मगुरुओं के साथ आर्ट ऑफ़ लिविंग के प्रणेता श्री श्री रविशंकर भी मंच पर आसीन थे.

ऐसे विशिष्ट अवसर एवं गणमान्य लोगों व ५० हज़ार से अधिक जनता के बीच मुनि श्री मैत्रीप्रभ सागर जी ने यह घोषणा की. उन्होंने यांत्रिक कत्लखानो से होनेवाले नुक्सान से लोगों को अवगत कराया और कहा की भारत से मांस निर्यात पर पूर्ण प्रतिवंध होना चाहिए। इसे अंजाम देने के लिए उन्होंने भगवन महावीर के दीक्षा दिवस (६ दिसम्बर, २०१५) से जयपुर से अान्दोलन प्रारम्भ करने की घोषणा की. जीवदया प्रेमी मुनि श्री मैत्रीप्रभ सागर जी के आह्वान का उपस्थित मंचासीन संतों एवं विशाल जनसमूह ने करतल ध्वनि से स्वागत किया।

उल्लेखनीय है की  मुनि श्री मैत्रीप्रभ सागर जी ने यांत्रिक कत्लखानों के विरोध में अनेक बार अनशन किया है एवं उनके सद-प्रयासों से उत्तरप्रदेश में आठ एवं राजस्थान के दूदू में एक कत्लखाने को निरस्त किया गया. आप का जीवन अत्यंत त्याग तपस्यामय है एवं जीवन का मुख्य उद्देश्य जीवदया है. भगवान महावीर के "अहिंसा परमो धर्मः" के सिद्धांत के आधार पर चलनेवाले यह मुनि खरतर गच्छीय गणाधीश श्री मणिप्रभ सागर जी के शिष्य हैं एवं आपकी तीन सांसारिक बहाने व एक भतीजी ने भी भगवती दीक्षा अंगीकार कर साध्वियों के रूप में विचरण कर रही हैं.

हम मुनि श्री के इस प्रयास की पुनः पुनः अनुमोदना करते हैं एवं सभी जीवदया प्रेमी महानुभावों से निवेदन करते हैं की इस आंदोलन को सफल बनाने में तन मन धन से योगदान करें।

Ravishankar inaugurated Hindu Spiritual and Service Fair in Jaipur


ज्योति कोठारी,
संयोजक,
सकल जैन समाज, जयपुर

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Monday, August 24, 2015

संथारे के समर्थन में मौन जुलुश में उमड़ी जैन समाज की जबरदस्त भीड़




आज संथारे (सल्लेखना) के समर्थन में जैन समाज की जबरदस्त भीड़ मौन जुलुश में उमड़ पड़ी. राजस्थान की राजधानी जयपुर में रामलीला मैदान से प्रारम्भ हो कर जोहरी बाजार,  चौपड़ होते हुए महावीर स्कूल प्रांगण पहुंची ये शांतिपूर्ण जुलुश। एक समय स्थिति ये थी की जुलुश का अगला सिरा जब महावीर स्कूल में था तब स्का पिछला हिस्सा ३ की मि दूर जोहरी बाजार में. १ लाख से अधिक स्त्री-पुरुषों की भीड़ को दिगंबर-श्वेताम्बर समाज के प्रमुख संतो ने सम्बोधित किया।

संथारा से संवंधित मुकद्दमे के मुख्य पक्षकार एवं आयोजन समिति के सदस्य श्री विमल डागा ने सर्वप्रथम मुकद्दमे से संवंधित जानकारी दी एवं कार्यक्रम संयोजक राजेन्द्र गोधा ने कार्यक्रम को सफल बनाने में मुनियों की प्रेरणा एवं जैन समाज के सभी समुदायों को कारन बताया।  दिगंबर जैन मुनि प्रसिद्द वक्ता पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा की समाज की यह जान मेदिनी बताती है की संथारा जैन धर्म का प्राण है और न्यायाधीशों को भी ऐसे विषय पर निर्णय देने के पूर्व विचार विमर्श करना चाहिए। उन्होंने कहा की यह संघर्ष की शुरुआत है और अभी लम्बा रास्ता चलना है.

इसके बाद श्वेताम्बर समाज की और से खरतर गच्छीय गणिवर्य पूज्य श्री पूर्णानंदसागर जी ने अपने प्रवचन में कहा की जैन समाज भले ही भिन्न भिन्न उपासना पद्धति को अपनाता है परन्तु जब संघ पर संकट  आता है या धर्म पर आंच आती है तब सब एकजुट हो जाते हैं. और आजकी सभा इसका प्रमाण है जहाँ दिगंबर-श्वेताम्बर- स्थानकवासी-तेरापंथी-मंदिर मार्गी सब एक साथ हैं. उन्होंने कहा की कायर आत्महत्या करते हैं और धर्मवीर संथारा। क्या सीमा पर लड़ने जानेवाले वीर सैनिकों को भी न्यायालय आत्महत्या करनेवालों की श्रेणी में रखेगा?

सभा को आचार्य श्री विशुद्धसागर जी एवं आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज के साथ जीवदया प्रेमी मुनि श्री मैत्रीप्रभ सागर जी का भी आशीर्वाद प्राप्त हुआ. इस सभा में संतों के अलावा आयोजन समिति के सदस्यों, विभिन्न संघों के प्रतिनिधियों, युवावर्ग के साथ राजनेता गण भी उपस्थित थे.

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी, जयपुर के संसद रामचरण बोहरा, जयपुर के महापौर निर्मल नाहटा, जनता दाल के पूर्व राष्ट्रिय महासचिव चंद्रराज सिंघवी आदि प्रमुख राजनेता थे.

जयपुर के अलावा राजस्थान के लगभग सभी छोटे बड़े शहरों जैसे जोधपुर, उदैपुर, कोटा, भीलवाड़ा, बांसवाड़ा, बाड़मेर आदि में जैन समाज ने मौन जुलुश निकल कर संथारा (सल्लेखना) के प्रति समर्थन व्यक्त किया। इसी तरह भारत के अन्य शहरों जैसे दिल्ली, इंदौर, सूरत, नागपुर, भोपाल, ग्वालियर आदि में भी संथारे के समर्थन में इसी प्रकार कार्यक्रम आयोजित हुए. ललितपुर में ५००० से ज्यादा लोगों ने अपने सर मुंडवा कर न्यायालय के फैसले पर अपना विरोध दर्ज़ किया।

सभी जगह भारी भीड़ होने के बाबजूद जुलुश एवं सभाएं पूरी तरह शांत एवं अनुशासित थी. आज जैन समाज ने अपनी एकजुटता की मिशाल पेश करते हुए ये बता दिया की धर्म पर आह आने पर कैसे वे सभी प्रकार के भेद भाव भुला देते हैं. पुरे भारत में एक साथ एक समय में इतना बड़ा विरोध प्रदर्शन कर जैन समाज ने जो अपनी अद्भुत संगठन शक्ति का परिचय दिया वह किसी बड़े राजनैतिक दल के लिए भी ईर्ष्या का विषय हो सकता है. सबसे बड़ी बात ये है की यह पूरा आंदोलन शांतिप्रिय नागरिकों द्वारा किया गया अहिंसक एवं स्वतःस्फूर्त था. बिना किसी जोर जबरदस्ती, भय या प्रलोभन के था. कहीं से भी किसी अप्रिय घटना का समाचार नहीं मिला न ही कहीं प्रशासन को शांतिभंग के लिए पुलिस आदि लगाना पड़ा.

मुझे विश्वास है की भारत की केंद्रीय एवं प्रादेशिक सरकारें इस बात को समझ कर जकैनो के धार्मिक अधिकार उन्हें लौटा कर देगी।

ज्योति कोठारी,
संयोजक, सकल जैन समाज, जयपुर

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संथारे के अधिकार के लिए जैन समाज का भारतव्यापी विरोध कल

दैनिक भास्कर में संथारा पर परिचर्चा

संथारा के अधिकार के लिए इतिहास दोहराने की जरुरत

Jain communities unite to protest the Judgement against Santhara

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Sunday, August 23, 2015

संथारे के अधिकार के लिए जैन समाज का भारतव्यापी विरोध कल

Sallekhna Santhara Protest by Jain community against Court order
Protest in favor of Santhara (Sallekhna)

सभी जैन बंधू कृपया ध्यान रखें - संथारे (संलेखना) के अधिकार के लिए जैन समाज का भारतव्यापी विरोध कल २४ अगस्त, सोमवार को है. अपने अपने स्थान पर हो रहे विरोध प्रदर्शन के कार्यक्रम में जरूर भाग लें एवं अधिक से अधिक लोगों को इसके लिए प्रेरित करें यही प्रार्थना है.  दिगंबर, श्वेताम्बर, मन्दिरमार्गी, तेरापंथी, बीसपन्थी, स्थानकवासी सभी समुदाय ने एक हो कर राजस्थान उच्च न्यायालय के फैसले का विरोध किया है. पुरे भारत में स्थान स्थान पर विरोध प्रदर्शन हो रहा है एवं जैन समाज का प्रतिनिधि मंडल देश के कानून मंत्री श्री सदानंद गौड़ा से भी मिल चूका है.

अब कल मुख्य दिन है और भारत भर के जैन संगठनो एवं पूज्य साधु संतो ने मिल कर सामूहिक शांतिपूर्ण विरोध करने का निर्णय लिया है. कल जैन समाज के लोग अपने प्रतिष्ठानो को बंद रखेंगे, शांतिपूर्ण मौन जुलुश निकालेंगे, सरकारी अधिकारीयों को ज्ञापन देंगे, सभाएं कर अपना विरोध प्रदर्शन करेंगे।

गौरतलब है की राजस्थान उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायाधीशों ने जैन धर्म एवं आगमो के तर्क एवं उनकी भावनाओं को समझे बगैर ही संथारे को आत्म-हत्या घोषित कर इसे कानूनन अपराध ठहरा दिया। इससे पूरा जैन समाज उद्वेलित हो उठा है एवं इसका विरोध किया जा रहा है।

संलेखना जैन धर्म साधना की एक आवश्यक प्रक्रिया है एवं सभी साधक के मन में यह भावना रहती है की वह संलेखना पूर्वक ही देह-त्याग करे. प्रतिदिन रात्रि में संथारे का पाठ करते हुए वह यह भावना करता है.

संथारे के अतिचारों (दोषों) को आगम में इस प्रकार बताया गया है:
"इहलोगा संसप्पओगे, परलोगा संसप्पओगे, जीविया संसप्पओगे, मरणा संसप्पओगे, कामभोगा संसप्पओगे," अर्थात इसलोक, परलोक से सम्बंधित किसी इच्छा से, जीने की इच्छा से अथवा मरने की इच्छा से या किसी भोग प्राप्ति की इच्छा से संलेखना (संथारा) करना दोषपूर्ण है. जीने एवं मरने की इच्छा से रहित हो कर किया गया संथारा आत्महत्या कैसे हो सकता है? वस्तुतः संथारा आत्मसाधना एवं समता, निस्पृहता की उत्कृष्ट अवस्था है जहाँ साधक जीवन और मृत्यु के पार चला जाता है. यही योगदर्शन की समाधी एवं गीता का अनासक्त योग (स्थितप्रज्ञता) है.

जैन धर्म की मूल भावना को समझे बगैर राजस्थान उच्च न्यायालय ने जो फैसला दिया है आशा की जा सकती है माननीय उच्चतम न्यायालय उसे अवश्य बदल देगा और जैन समाज अपनी धार्मिक भावना को अक्षुण्ण रख सकेगा।  तब तक हमें जागते रहना होगा और ये भी प्रयास करना होगा की भारत की संसद जैनो की भावना को समझते हुए धरा ३०९ में बदलाव करे एवं संथारे के अधिकार को बनाये रखे.

जयपुर में भी कल यह विरोध प्रदर्शन व्यापक रूप से होगा एवं प्रातः १० बजे रामलीला मैदान से मौन जुलुश निकाला जायेगा जो की चौड़ा रास्ता, त्रिपोलिया, बड़ी चौपड़, जोहरी बाजार होते हुए महावीर स्कूल, सी-स्कीम पहुंचेगा जहाँ एक बड़ी सभा को उपश्थित साधु संत एवं वक्तागण सम्बोधित करेंगे।

ज्योति कोठारी,
सकल जैन समाज, जयपुर

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संथारा के अधिकार के लिए इतिहास दोहराने की जरुरत

Jain communities unite to protest the Judgement against Santhara

दैनिक भास्कर में संथारा पर परिचर्चा
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Thursday, August 20, 2015

दैनिक भास्कर में संथारा पर परिचर्चा





Santhara Samlekhna debate at Dainik Bhaskar jyoti kothari Jaipur
Debate on Santhara at Dainik Bhaskar
दैनिक भास्कर समाचार पत्र के जयपुर कार्यालय में आज संथारा पर परिचर्चा आयोजित की गई. इस परिचर्चा में जयपुर जैन समाज के गणमान्य लोगों ने भाग ले कर इस सामयिक एवं ज्वलंत विषय पर अपने मत प्रगट किये। सभा में सर्व श्री पद्मविभूषण डी आर मेहता, डा कुसुम जैन, माननीय न्यायमूर्ति (से. नि.) जसराज चोपड़ा, ज्योति कोठारी, विमल डागा, राजेन्द्र बरडिया, अधिवक्ता हेमंत नाहटा एवं हेमंत सोगानी, मानचंद खंडेला, डा विमल जैन आदि जैन समाज के विशिष्ट व्यक्तियों ने भाग लिया एवं अपने विचार प्रस्तुत किये. इसके अतिरिक्त समाज के कई अन्य विशिष्ट व्यक्ति भी संमिलित थे.

सभा में उपस्थित लगभग सभी ने संथारा (सल्लेखना) को जैन धर्म का आवश्यक अंग बताते हुए माननीय उच्च न्यायालय के फैसले को दुर्भाग्य पूर्ण बताया। पद्मविभूषण डी आर मेहता ने संथारे की व्याख्या कर कहा की जैनो की इस धार्मिक परंपरा का निर्वाह विनोबा भावे जैसे राष्ट्रपुरुष ने भी किया एवं तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के आग्रह पर भी संथारा नहीं तोडा। उन्होंने कहा की ऋषि अरविन्द ने भी अपने अंतिम तीन दिन संथारे में गुजारे  थे एवं प्रसिद्द बौद्ध विद्वान एवं हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर धर्मानंद कोसाम्बी ने भी संथारे पूर्वक देहत्याग किया था. अधिवक्ता हेमंत नाहटा ने कहा की एक व्यक्ति जिसकी जैन धर्म में कोई आस्था न हो एवं जिसे जैन धर्म एवं परंपरा का कोई ज्ञान न हो ऐसा व्यक्ति कैसे जैन धर्म की एक प्राचीन परंपरा एवं सिद्धांत के खिलाफ याचिका दायर कर सकता है एवं कैसे न्यायाकय उसका संज्ञान ले सकता है?

डा कुसुम जैन ने अपने विद्वत्तापूर्ण वक्तव्य में संतरे के स्वरुप पर विस्तृत प्रकाश डाला एवं कहा की आत्महत्या आवेश में लिया गया निर्णय होता है, यह एक पलायनवादी मानसिकता का द्योतक है जबकि संथारा स्वस्थ एवं स्थिर  विवेक पूर्वक लिया गौए निर्णय है. आत्महत्या प्रायः छुप कर एवं छिपाकर किया जाता है क्योंकि यह एक निंदनीय कृत्य है जबकि संथारा सबके सामने, संवंधित व्यक्तियों की रज़ामंदी से आत्मा साधना के लिए लिया जाता है/ इसमें न जीने की न मरने की इच्छा होती है वल्कि समता पूर्वक अनिवार्य मृत्यु का सामना किया जाता है.

अधिवक्ता हेमंत सोगानी ने संथारे के धार्मिक एवं कानूनी पक्षों की व्याख्या करते हुए माननीय उच्च न्यायालय के फैसले से अपनी घोर असहमति जताई। डा विमल जैन ने पुरुषार्थ सिध्युपाय ग्रन्थ से उद्धरण दे कर संतरे की प्रासंगिकता को सिद्ध किया एवं कहा की सभी जैन साधकों के मन में यह मनोरथ रहता है की उसकी मृत्यु सल्लेखना व समाधी के बगैर न हो.

ज्योति कोठारी ने कहा की जैन शाश्त्रों में इंगीनी मरण जैसे आत्महत्या के कुछ उपायों की चर्चा है एवं उन्हें पाप एवं दुर्गति का कारन बताते हुए उसकी भर्तस्ना की गई है, फिर वह आगम आत्महत्या को कैसे अच्छा बता सकता है? अतः संथारा (संलेखना) आत्महत्या नहीं है. उन्हों कहा की कोई वीर क्रन्तिकारी अपनी मातृभूमि के लिए बलिदान देता है तो क्या वो आत्महत्या है? संथारा वीरों का कार्य है जबकि आत्महत्या पलायनवादी मानसिकता के साथ किया गया कायरों का कार्य है।  साधक मुनि गण एवं विशेष योग्यता युक्त गृहस्थ साधक पहले पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत, एवं चार शिक्षा व्रतों का लम्बे समय तक पालन करते हैं, ग्यारह प्रतिमाओं का अभ्यास करते हैं उसके बाद संथारा जैसे कठिन व्रत की और अग्रसर होते हैं।  उन्होंने यह भी बताया की कुछ पाश्चात्य विद्वानो ने भी इस विषय पर शोध किया है जिनमे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेम्स लैडला ने जयपुर में रहकर यह शोध किया था (देखें: रिचेस एंड रिनान्सिएसन).

माननीय न्यायमूर्ति (से. नि.) जसराज चोपड़ा ने कहा की जैनो पर यह संकट की घडी है एवं जैन समाज इसका सामना करने के लिए तैयार है. उन्होने प्रश्न किया की क्या मीडिया इस कार्य में जैनो के साथ है? उन्होंने आगे कहा की न्यायालय की लड़ाई वहीँ लड़ी जाएगी एवं इसके लिए जैन समाज को संगठित हो कर काम करना होगा एवं अच्छे से अच्छे वकीलों के द्वारा इस मामले की पैरवी करवानी होगी। इसके साथ ही सरकार पर दवाव बना कर धरा ३०९ में संशोधन करवाया जा सकता है एवं संथारे को इस कणों के दायरे से बाहर रखवाया जा सकता है. इसके लिए आंदोलन का रास्ता अपनाया जा सकता हो।

कार्यक्रम का संयोजन दैनिक भास्कर, जयपुर के पत्रकार चंद्रशेखर कौशिक ने किया।

ज्योति कोठारी,
सकल जैन समाज, जयपुर 

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संथारा के अधिकार के लिए इतिहास दोहराने की जरुरत

Jain communities unite to protest the Judgement against Santhara







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Wednesday, August 19, 2015

संथारा के अधिकार के लिए इतिहास दोहराने की जरुरत


jain unity in protest for right of santhara
संथारे के अधिकार के लिए संघर्ष में जैन एकता

 संथारा (सल्लेखना) के अधिकार के लिए जैन समाज को इतिहास दोहराने की जरुरत है. दो वर्ष पूर्व सं २०१३ में जयपुर में राष्ट्रसन्त मुनि श्री ललितप्रभसागर जी, राष्ट्रसन्त मुनि श्री चन्द्रप्रभसागर जी, एवं राष्ट्रसन्त मुनि श्री तरुणसागर जी का ऐतिहासिक सामूहिक चातुर्मास दिगम्बर - श्वेताम्बर जैन एकता के लिए मील का पत्थर का सावित हुआ था. अब जैन समाज को अपने आस्था और उपासना के अधिकार को पुनः प्राप्त करने के लिए उसी इतिहास को दोहराना होगा और जैन एकता की मिसाल फिर से कायम करनी होगी। विशेष कर २४ अगस्त, २०१५ को पुरे भारत में होनेवाले सभी कार्यक्रमों में संमिलित होकर  हमारी संस्कृति को बचाने का प्रयास करना होगा।

अभी कुछ ही दिनों पूर्व, राजस्थान उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में प्राचीन काल से चले आ रहे संलेखना (संथारा) धर्म की आराधना पर रोक लगा दी थी एवं इसे आत्महत्या माना था।  जबकि सभी जैन आगमो एवं शास्त्रों में इसे आत्म-अवलोकन एवं आत्मलीनता माना गया है जहाँ उत्कृष्ट साधक राग-द्वेष एवं जीवन-मृत्यु की भावना से पर जा कर अपनी आध्यात्मिक विशुद्धि करता है. जैन आगमो में यह स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है की संलेखना (संथारा) में मृत्यु की कोई इच्छा नहीं होनी चाहिए, ऐसे में इसे आत्महत्या तो क्या इच्छा मृत्यु भी नहीं कहा जा सकता। 

यह निर्णय जैनो की आस्था एवं एवं धर्म की आत्मा पर प्रहार है और जैन समाज अपनी आस्था के लिए संगठित एवं सक्रीय है. इस निर्णय का विरोध पुरे भारत भर में हो रहा है एवं न्यायालयीन प्रक्रिया के अनुसार  एक पुनर्विचार याचिका भी राजस्थान उच्च न्यायालय में १८ अगस्त को दाखिल कर दी गई है.

जयपुर में श्वेताम्बर-दिगंबर समुदाय की संयुक्त सभा में एक समिति भी गठित की गई है जिसमे सभी जैन समुदायों के प्रतिनिधियों को संमिलित किया गया है जिससे जैन एकता की भावना और भी पुष्ट हुई है. इस समिति में सर्वश्री पद्मबिभूषण डी आर मेहता, विमल चन्द सुराणा, अशोक पाटनी, नवरतनमल कोठारी, नरेश सेठी, विवेक काला, हीराभाई चौधरी, राजेंद्र गोधा, विमल डागा,  एवं राजेन्द्र बरडिया जैसे गणमान्य व्यक्ति संमिलित हैं. इस पवित्र कार्य में जैन समाज के सभी समुदायों के पूज्य साधु-साध्विओं का पूर्ण समर्थन प्राप्त है.

इस संदर्भ में उल्लेखनीय तथ्य ये है की राजस्थान सरकार में गृह एवं कानून मंत्री श्री गुलाबचन्द कटारिया ने जैन समुदाय को सरकार का समर्थन देने की घोषणा की है एवं कहा है की सरकार न्यायालय में जैनो के पक्ष में लड़ेगी।

आप सभी से भी निवेदन है की इस पुनीत कार्य में तन-मन-धन से सहयोग कर जैन एकता की मिशाल कायम करें एवं धर्म के प्रति अपनी आस्था का परिचय दें.

ज्योति कुमार कोठारी,
सकल जैन समाज, जयपुर

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Jain communities unite to protest the Judgement against Santhara







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Thursday, August 13, 2015

Jain communities unite to protest the Judgement against Santhara


Jain communities have been uniting to protest the Rajasthan High Court's Judgement against Santhara (Samlekhana). Samlekhana is a process of ultimate purification of Atma, the soul. Ascetics of the highest order practice this to accept death as a reality of life without fear. This can be told as death in equanimity.

Samlekhana is neither suicide nor a glorification of death. Ascetics, accept Samlekhana willingly and knowingly with any craving for life and death. He tries (practices) to remain equanimous to all pain, sorrow, craving, aversion and even to life and death. The laymen (Shravak-Shravika) also follow Santhara who is willing to purify his or her soul to a high level.

However, it seems from the judgement that this very aspect of Jainism is not addressed in the judgement. All sects of Jain community, Digambar, Shwetambar (Sthanakvasi, Terapanth, Mandir Margi) practice this as a religious (Spiritual) belief. The Jain community has been practicing this penance since time immemorial. It would be better if the court did not enter into the area of belief and faith.

Jain communities in different parts of India are uniting to protest this judgement. Jain is a peaceful and non-violent community and will take the legal way to save their religious right. The shwetambar community in Jaipur met yesterday (12 August 2015) to decide an action plan followed by a meeting of Digambar community today (August 13). A joint meeting will be organized tomorrow to decide further action plan.

Similar steps are taken  in different parts of India. Jain monks and nuns, observing their Chaturmas are also supporting the movement.  In the meantime, Gulab Chand Kataria, Home Minister, Rajasthan has come forward to support Jain community declaring that the State government will fight the case in favor of Jain community.

It is obvious that the community has to move to the Hon'ble Supreme Court to protect their religious right. And, the Jain have faith in Indian constitution that guarantees the right to religious freedom. A Supreme court judgement (1954) also supports that. Moreover, Jain is a religious minority and enjoys special rights for their religion in the constitution of India.

We urge all Jai members to act unitedly forming a joint community comprises of community leaders, scholars and legal and other professionals.

Research by Western scholars about Sallekhana

Jyoti Kothari,
Convener, Sakal Jain Samaj, Jaipur

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Sunday, July 26, 2015

युगप्रधान दादा श्री जिन दत्त सूरी



 दादा श्री जिन दत्त सूरी द्वारा स्थापित गोत्र

युगप्रधान दादा श्री जिन दत्त सूरी जैन आचार्यो की महान परंपरा के ज्वाज्वल्यमान नक्षत्र हैं. जिनशासन की एक महान परंपरा खरतरगच्छ के आप युगपुरुष हैं. जिनेश्वर सूरी से प्रारम्भ हुई इस परंपरा में नवांगी टीकाकार आचार्य अभय देव सूरी के पटटधर शिष्य वल्लभ सूरी आपके गुरु थे.

संवत ११३२ में आपका जन्म हुआ एवं ९ वर्ष की अल्प आयु में ही आपने देीक्षा ग्रहण कर वैराग्य का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया। आप चमत्कारिक बुद्धि के धनी थे एवं अपनी प्रतिभा से सबको चमत्कृत करते हुए   अल्प समय में ही समस्त शास्त्रों में पारंगत बने. आपकी प्रतिभा, शास्त्र अभ्यास,  ,प्रवचन कला एवं सर्वोपरि वैराग्य व जिन शासन निष्ठां को देखते हुए अनेक वरिष्ठ साधुओं के रहते हुए भी आपको आचार्य पद प्रदान कर श्री जिन वल्लभ सूरी का पट्टधर नियुक्त किया गया.

आपने शासन प्रभावना के अनगिनत कार्य किये एवं अपनी तपसाधना से जिन शासन का विस्तार किया। १३०,००० (एक लाख तीस हज़ार) लोगों को प्रतिवुद्ध कर उन्हें जिन धर्म का अनुयायी बनाया एवं अनेक नवीन गोत्रों की स्थापना की. । श्री नेमिनाथ स्वामी की अधिष्ठायीका  अम्बिका देवी ने आपको युगप्रधान पद से अलंकृत किया। आप अपभ्रंश भाषा के महान कवि थे एवं चर्चरी प्रकरण, चैत्यवंदन कुलक आदि अनेक विशिष्ट ग्रंथों की रचना की. जिन शासन को आपके महान योगदान के कारण आप प्रथम दादा गुरुदेव के नाम से विस्वा विख्यात हैं एवं हज़ारों दादावाडीयां आपके यशोगाथा का गान आज भी गा रही है.

संवत १२११, आषाढ़ सुदी इग्यारस को अजमेर में आपका स्वर्गवास हुआ, मणिधारी जिन चन्द्र सूरी को आपने अपना पटटधर नियुक्य लिया जो की कालान्तर में द्वितीय दादागुरु के नाम से प्रसिद्द हुए. कल आपकी पुण्य तिथि है एवं अजमेर दादाबाड़ी में यह बड़े धूमधाम से मनाया जा .रहा है.

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Thursday, July 9, 2015

Paryushan Stories:Mahavira Swami and Krishna

There are few resemblence in Jain and Hindu stories and events. An event and two stories are posted here for comparison.

Event: Janmastami comes on  Bhadrapad Krishna 8 when birthday of Shri Krishna is celebrated with great enthusiasm.This is a Hindu festival.
Mahavira Swami Janma Vachan is celebrated in similar way just after seven days i.e. on Bhadrapad Shukla 1. It is worth noted that this is not birth day of Mahavira Swami. However, Kalpasutra describes his Birth on that day.

Story 1: There is a story about Krishna that he lifted Govardhan hill in Gokul to resist divtetorship of Indra. Similarly Mahavira Swami shaked Meru Parvat on the event of his Janma Kalyanaka (Birth celebration). He had done it to eliminate confusion from the mind of Indra. It is worth noted that Indra is present in both places.

Story 2: There is a story of Krishna that he defeated Kaliya Naga at river Yamuna. He compelled Kaliya Naga to leave the river.
There is a similar story of Mahavira Swami with Chandakaushika Naga. He preached the Naga and he it became ascetic.


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Wednesday, February 18, 2015

New Railway line in Shikhar ji: Madhuban to Parasnath


Sammet Shikhar Parasnath hills

Parasnath Tonk at Sammet Shikhar Ji hill top

(Photo by AGRIM.AJ (Own work) [CC BY-SA 3.0 (http://creativecommons.org/licenses/by-sa/3.0)], via Wikimedia Commons)

Jal Mandir at Shikhar Ji hill
(Photo by vsvinaykumar (http://www.panoramio.com/user/vsvinaykumar) [Attribution], via Wikimedia Commons)

I have got message from Sri Kamal Vinayakya who has been putting his whole hearted efforts for a railway line in Sammet Shikhar Ji and posted this in this popular Jain blog for awareness of all members of Jain community.  Pl don't esxape to read this and take necessary action.


REQUEST MESSAGE FOR ALL JAIN LIVING INDIA/ABROAD.

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After continues pressure from whole country since 1994 ,The government has Sent this proposal to planning commission for approval during Rail BUDGET 2012.The survey has been completed.

This year Rail BUDGET will be presented on 26/2/2015 therefore, we request all our JAIN COMMUNITY to send Maximum number of emails request directly to:-

a) Mr. Narendra Modi - P.M b) Mr. Suresh.Prabhu - Rail Minister (froa@rb.railnet.gov.in) c) Mr. Jayant Sinha - Minster of Finance for state (jayantsinhabjp@gmail.com)

Other address from sit
e.

Please pass on this message to all known Jain people/Org living abroad or in India.

Please do this noble work so that our HOLIEST HOLY PLACE MADHUBAN can be connected with RAIL LINE (Just 14 K.M. only) without further delay. Awaiting your all possible effort in this regard .

Thanks,
Yours ,
Kamal Jain
Convener Rail Jodo Samiti

Note : A copy of this email may please be send to me also for record. 

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Sunday, January 18, 2015

Sakal Jain Samaj, Jaipur will celebrate Mahavira Jayanti on April 2, 2015




Mahavira Swami,  Mahavira Swami temple, Kolkata
Sakal Jain Samaj, Jaipur will celebrate Mahavira Jayanti on April 2, 2015 as usual. Sakal Jain Samaj, an united forum of all Jain communities in Jaipur celebrated two major events i.e Mahavira Jayanti and Khamavani every year with great enthusiasm.

Jain ascetics of all Shwetanbar and Dogambar Jain sects participate in these events. They benefit community members with their auspicious presence and discourses. The event used to follow with Sadharmi Vatsalya (Lunch) where thousands of Jain community members get together.

Sakal Jain Samaj, Jaipur re ready to celebrate Mahavira Jayanti falling on April 2 this year 2015, birth date of Lord Mahavira, the last Tirthankara with full enthusiasm. All community members fron Swetambar and Digambar Jain sects are cordially invited in this event to show Jain unity. This is an advance invitation and complete program will be published afterwards.


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