Pages

Monday, December 29, 2014

Another benefit announced by the government for Jain community


Another benefit announced by the government for Jain community. We have already informed about benefits of religious minority in our earlier blogpost and now there is an addition that may be very useful for the entire Jain community.

Benefits and advantages of Religious Minority status for Jain Community


A member of Jain community has to pat lower interest rate in housing loan. There is a waiver of three percent per year in interest rate. One has to obtain a certificate for religious minority from the state government and produce before the authorities to the bank or other loan sanctioning financial institutes.

Please do not forget to get a certificate for minority status and produce it to get lower interest rate in housing loan.

Vardhaman Infotech
A leading IT company in Jaipur
Rajasthan, India
E-mail: info@vardhamaninfotech.com 
allvoices

Thursday, December 11, 2014

New Year celebration at Malpura Dadabadi


Celebrate new year with Anuradha Podwal at Malpura Dadabadi
New Year 2015 at Malpura Dadabadi

New Year 2015 will be celebrated at Sri Jin Kushal Suri Dadabadi, Malpura with great enthusiasm. Anuradha Podwal, famous singer, will sing devotional songs on the eve of New Year on 31st night to welcome New Year 2015. She will sing Bhajans of Dadagurudev in the "Bhakti Sandhya" from 7.30 PM till midnight of 31st December 2014.

There will be Badi Pooja of Dadagurudev on the next day, January 1, 2015. Renowned Bollywood singer Sanjay Vidyarthi will perform on this occasion.

Several groups of Sadhvi Ji will grace this occasion with their presence. Poojya Sadhvi Sri Chandrakala Sri Ji, Sri Mnohar Sri Ji, Sri Shashiprabha Sri Ji, Sri Sulakshana Sri Ji, Sri Punitkala Sri Ji and Sri Shraddhanjana Sri ji are expected to be there with their groups. We expect at least 31 Sadhviji Maharaj on 31st.

Sri Chandra Prakash Prakash Chand Lodha family, devotees of Dadagurudev have invited all Gurubhakt to come and join the event. Sri Jain Shwetambar Khartar Gachchh Sangh, Jaipur has permitted the family to organize the event.

Vardhaman Infotech
A leading IT company in Jaipur
Rajasthan, India
E-mail: info@vardhamaninfotech.com 
allvoices

Monday, December 1, 2014

Nirmal Nahata, a Jain is elected as Mayor of Jaipur


Nirmal Nahta declared as Mayor, Jaipur
Sri Nirmal Nahata, a Jain is elected as Mayor of Jaipur. Congratulations!

Jaipur is a city where large numbers of Jain live in. There are more than two lakh voters in Jaipur belonging to Jain community. However, the Jains in Jaipur failed so far to establish themselves politically strong enough.

Sakal Jain Samaj have been trying to establish its political credential and demanded seats in State assembly and parliamentary elections from both Congress and BJP, major political parties in Rajasthan.

The Congress party nominated Sanjay Bafna, a Jain community member as their candidate at Sanganer assembly seat. However, BJP had not nominated any Jain member as their candidate in Jaipur in Rajasthan assembly election 2013.  Neither Congress nor BJP had given a chance to a Jain candidate in Jaipur in parliamentary election.

Four of the Jain community members Nirmal Nahta, Vikas Kothari, Mahrndra Ajmera and Jaya Jain have been elected as Councillors in Jaipur corporation election 2014. Nirmal Nahta, a senior BJP leader and two time winner as Councillors has declared as Mayor of Jaipur. He was elected and took oath as Mayor on November 26, 2014.

Jain society will felicitate them on December 3, 2014 at Mohanbadi, Galta Road, Jaipur.

Jyoti Kothari,
Convener,
Sakal Jain Samaj, Jaipur

Thanks,
(Vardhaman Gems, Jaipur represents Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry)
info@vardhamangems.com
Please follow us on facebook for latest updates.
allvoices

Monday, November 17, 2014

जयपुर नगर निगम चुनाव 2014 एवं जैन प्रत्याशी


जयपुर नगर निगम चुनाव २२ नवम्बर २०१४ को होने वाला है. प्रमुख राजनैतिक दलों ने इस बार काफी कम जैन प्रत्याशियों को  टिकट दिया है. भाजपा ने तीन  जैन प्रत्याशियों वार्ड ६६ से विकास कोठारी एवं पूर्व पार्षद निर्मल नाहटा को सिविल लाइन्स क्षेत्र वार्ड २६ से टिकट मिला है वार्ड ३२ से श्रीमती जया जैन   भाजपा की उन्नीद्वार हैं. जब की कांग्रेस ने श्रीमती बीणा  काला को वार्ड १८ से, नीति जैन को वार्ड ४० से आभा जैन को ५२ से एवं अंजना जैन को वार्ड ५९ से अपना प्रत्याशी बनाया है.

ये मेरी जानकारी के मुताबिक है यदि अन्य किसी जैन प्रत्याशी को दोनों प्रमुख पार्टियों ने टिकट दिया हो तो कृपया सूचित करें।  इन प्रत्याशिओं के अलावा अनेक जैन प्रत्याशी निेदलीय के रूप में भी अपना भाग्य आजमा रहे हैं.

जयपुर में जैन समाज एक विशाल एवं शक्तिशाली समाज है परन्तु राजनैतिक दलों द्वारा इस समाज की लगातार अनदेखी की जा रही है. इसका कारण जैन समाज में राजनैतिक चेतना का आभाव एवं अपने हक़ के लिए संघर्ष नहीं करने की मनोवृत्ति है.

सम्पूर्ण जैन समाज को इस सम्वन्ध में जागरूक हो कर राजनीती में अधिक से अधिक भागीदारी निभानी होगी तभी राजनैतिक दाल इस समाज को महत्व देंगे। एक कहावत है की बिना मांगे माँ भी अपने बच्चे को दूध नहीं पिलाती तो फिर राजनैतिक दल कैसे चुनावों में टिकट देंगे। इस बार एक बात अच्छी हुई की जैनों ने टिकट मांगे। मेरी जानकारी के मुताबिक जैन समाज के लगभग ५० लोगों ने भाजपा से इस बार जयपुर नगर निगम के लिए टिकट माँगा था परन्तु सिर्फ दो को ही टिकट मिला।

मैंने गत माह अक्टूबर की शुरुआत में ही इसी ब्लॉग के माध्यम से एवं अन्य माध्यमों से जैन समाज को जागरूक करने का प्रयास किया था.  जयपुर नगरपालिका चुनाव एवं जैन समाज

मेरा यह प्रयास सतत जारी है. मेरा सभी से निवेदन है की भविष्य के लिए योजना बना कर राजनीती में सक्रीय भागीदारी निभाएं, संगठन के स्तर पर काम करते हुए अपनी पकड़ मज़बूत बनाएं. जनता के बीच जा कर काम करें जिससे टिकट वितरण के समय दावेदारी मज़बूत हो सके.

जैन समाज के कर्णधारों को इस विषय में गंभीरता से विचार करना होगा एवं दीर्घकालीन योजना बना कर काम करना होगा। यह स्थिति सिर्फ जयपुर के लिए ही नहीं अपितु भारत भर के जैन समाज पर लागु होता है.

BJP candidates for Jaipur municipal corporation election 2014 among Jain community according to the best of my knowledge are Sri Nirmal Nahta, Ward 26, Sri Vikas Kothari ward 66 and Jaya Jain  from ward 32.  INC has given tickets to Jain candidates from ward 18, Mrs Beena Kala, Neeti Jain ward 40, Abha Jain ward 52 and Mrs Anjana Jain from ward 59.

ज्योति कोठारी
संयोजक,
सकल जैन समाज, जयपुर  


Thanks,
(Vardhaman Gems, Jaipur represents Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry)
info@vardhamangems.com
Please follow us on facebook for latest updates.
allvoices

Monday, November 10, 2014

मालपुरा में नव वर्ष मेला एवं अनुराधा पोडवाल द्वारा भक्ति संध्या


श्री जिन कुशल सूरी चरण, मालपुरा दादाबाड़ी

मालपुरा मेले में भक्ति में झूमते भक्तगण 


मालपुरा में दादा गुरुदेव का नव वर्ष मेला एवं अनुराधा पोडवाल द्वारा भक्ति संध्या 

श्री जिन किशल सूरी दादाबाड़ी, मालपुरा में गत वर्ष की भांति इस वर्ष भी नव वर्ष के उपलक्ष्य में एक भव्य मेले का आयोजन किया जा रहा है. यह सर्व विदित है की मालपुरा दादा श्री जिन कुशल सूरी की प्रत्यक्ष दर्शनस्थली के रूप में विश्वविख्यात है.

इस मेले में ३१ दिसंबर, २०१४ की रात्रि को प्रसिद्द गायिका अनुराधा पोडवाल द्वारा दादागुरुदेव की भक्ति की जाएगी। रात्रि जागरण के साथ ही नववर्ष उत्सव भी मनाया जायेगा।  यह एक पवन अवसर होगा जब हम दादागुरुदेव के सान्निध्य में नव वर्ष २०१५ में प्रवेश करेंगे।

दूसरे दिन प्रातः १ जनवरी २०१५  बॉलीवुड के प्रसिद्द गायक संजय विद्यार्थी दादागुरुदेव की बड़ी पूजा पढ़ाएंगे।  दोनों ही कलाकार भारत भर में प्रसिद्धि प्राप्त हैं अतः मेले में भक्ति का रंग विशेष रूप से जमेगा।

प् पू सरलमना वयोवृद्ध साध्वी श्री चन्द्रकला श्री जी महाराज एवं सज्जन् मणि साध्वी श्री शशिप्रभा श्री जी महाराज के सान्निध्य एवं खरतर गच्छ संघ, जयपुर के तत्वावधान में इस उत्सव का आयोजन होगा।  इस मेले में खरतर गच्छ के अन्य भी अनेक प् पू साधु साध्वी वृन्दों के पधारने की सम्भावना है.

मेला लाभार्थी जयपुर निवासी परम गुरुभक्त श्री चन्द्र प्रकाश प्रकाश चंद लोढ़ा ने सभी गुरुभक्तों से इस अवसर पर पधारने की भावभरी विनंती की है.  मेले में पधारनेवाले कृपया अग्रिम सुचना हेतु शिवजीराम भवन, जयपुर में ०१४१-२५६३८८४ पर कार्यालय समय में संपर्क करने का कष्ट करें।

ज्योति कोठारी


Thanks,
(Vardhaman Gems, Jaipur represents Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry)
info@vardhamangems.com
Please follow us on facebook for latest updates.

allvoices

Saturday, October 25, 2014

जैन विधि से दिवाली (दीपावली) पूजन



जैन विधि से दिवाली पूजन, जयपुर 

जैन विधि से दिवाली (दीपावली) पूजन


जैन विधि से दिवाली (दीपावली) पूजन चढ़ावा 


दिवाली (दीपावली) के दिन प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी जैन विधि से  दिन के वक्त चरम तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी एवं गणधर श्री गौतम स्वामी का पूजन किया। दिवाली भारत भर में लक्ष्मी पूजन के लिए जाना जाता है एवं पूरा हिंदु समाज इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा करता है. कहीं कहीं पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा भी होती है.

जैन धर्म के अनुयायी भी लगभग इसी प्रकार पूजन करते हैं. परन्तु हम भूल जाते हैं की दिवाली भगवन महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी है और इस दिन उनकी पूजा विशेष रूप से होनी चाहिए। जैन विधि के अनुसार सभी प्रकार की पूजाएं दिन के समय ही होती है रात्रि में नहीं।

हम इस दिन भगवन महावीर की प्रतिमा का अभिषेक कर अष्ट प्रकारि पूजा करते हैं. इसके पहले रंगोली से समवशरण बना कर उसके ऊपर एक चौकी ले प्रभु की प्रतिमा, चित्र आदि विराजमान करते हैं. साथ ही भगवन के प्रथम गांधार अनंत लव्धिनिधान श्री इंद्रभूति गौतम स्वामी को भी विराजमान करते हैं.

ऊपरदिए गए चित्र में सिंहासन पर भगवन की प्रतिमा एवं गौतम स्वामी के चरण के दर्शन हो रहे हैं. साथ ही एक महावीर स्वामी एवं गौतम स्वामी की फोटो भी है. भवन महावीर को गोदुहिकासन में केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था और उस मुद्रा की एक मूर्ति भी चित्र में दर्शन हो रहे हैं.

अष्ट प्रकारि पूजन के बाद आरती, मंगल दीपक कर शांति कलश के जल का छिड़काव पुरे घर एवं पड़ौसियों के यहाँ भी किया गया. इसके बाद चैत्यवंदन करजैन विधि से दिवाली पूजन सम्पूर्ण किया गया.

Vardhaman Infotech
A leading IT company in Jaipur
Rajasthan, India
E-mail: info@vardhamaninfotech.com
allvoices

Friday, October 10, 2014

जयपुर नगरपालिका चुनाव एवं जैन समाज

जैन समाज का अपर जान समूह 

जयपुर शहर में नगरपालिका का चुनाव नवंबर माह में होने जा रहा है. किसी भी दिन चुनाव की घोषणा हो सकती है. नगरपालिका चुनाव में जैनो को अधिक से अधिक संख्या में भाग लेना चाहिए। जयपुर का जैन समाज व्यापार एवं सामाजिक धार्मिक कार्यों में तो अग्रणी रहता है परन्तु राजनीती में पीछे. जनसँख्या अनुपात को देखते हुए जैन समाज का राजनैतिक प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है. 

जयपुर के प्रथम सांसद श्री दौलतमल जी भंडारी जैन थे परन्तु राजस्थान उच्च्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश नियुक्त होने के कारन उन्होंने सांसद का पद छोड़ दिया था. उसके बाद यहाँ से कोई भी जैन सांसद नहीं बना. जैन समाज ने स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ चढ़ कर भाग लिया था. श्री अर्जुनलाल सेठी स्वतंत्रता संग्राम के पुरोधा थे. उनके सान्निध्य एवं प्रेरणा ने जैनो को इस ओर बहुत आकर्षित किया। श्री पूर्ण चन्द्र जैन, श्री सिद्धराज ढढ्ढ़ा, श्री जवाहरलाल जैन, श्री राजरूप टांक, श्री सरदारमल गोलेच्छा, श्री वसन्तीलाल मुकीम, कर्नल कासलीवाल आदि अनेक जैनो ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग ले कर अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मज़बूर किया। 

गत २०१३ के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने सांगानेर विधानसभा क्षेत्र से संजय बफना के रूप में एकमात्र जैन को टिकट दिया था परन्तु भारतीय जनता पार्टी ने किसी जैन को टिकट नहीं दिया। इसी प्रकार लोकसभा चुनाव २०१४ में दोनों ही पार्टियों ने जैन समाज के व्यक्ति को टिकट नहीं दिया। 

जयपुर में जैनो की बहुत बड़ी आबादी है जिसकी संख्या लगभग ढाई से तीन लाख है. इससे भी बड़ी बात है की यहाँ के शिक्षा, स्वास्थ्य आदि जनहितकर कार्यों में जैन समाज का अतुलनीय योगदान है. सुबोध, श्वेताम्बर जैन, वीर बालिका, आचार्य भिक्षु, महावीर विद्यालय जैसे जैन शिक्षा प्रतिष्ठान जयपुर की शान हैं जिनमे काम से काम पचास हज़ार विद्यार्थी अध्ययन करते हैं. अन्य किसी समुदाय के इतने शिक्षा प्रतिष्ठान नहीं हैं. ये सभी शिक्षा के मंदिर अपनी गुणवत्ता एवं जनसेवा के लिए जाने जाते हैं. 

इसी प्रकार स्वास्थ्य सेवा में भी जैन समाज अग्रणी है. महावीर विकलांग सहायता समिति जयपुर पैर के लिए विश्व प्रसिद्द है. यह अकेली संस्था जितने पैर लगाती है उतने पैर दुनिया के सभी अस्पताल एवं संस्था मिल कर भी नहीं लगा पाती। भगवान महावीर कैंसर अस्पताल एक आधुनिक एवं श्रेष्ठ अस्पताल है जिसकी गुणवत्ता  श्रेष्ठ कैंसर अस्पतालों के बराबर है. संतोकबा दुर्लभजी, अमर जैन चिकित्सालय, ज्ञान क्लीनिक जैसे अनेक जैन संस्थान जनसेवा में सक्रीय भागीदारी निभा रहे हैं. महावीर इंटरनेशनल नियमित रूप से चिकित्सा के विभिन्न क्षेत्रों में अपना अतुलनीय योगदान देता आ रहा है. 

जैनो के अन्य अनेक सामाजिक संगठन भी रक्तदान शिविर, नेत्र शल्य चिकित्सा शिविर आदि के माध्यम से जनसेवा करते हैं. इसके अलावा बाढ़ पीड़ित हों या भूकम्प पीड़ित जैन समाज हर आपदा में आगे बढ़ कर सहयोग करता है. व्यापर में भी यह समाज बहुत आगे है एवं चुनावों में राजनैतिक दाल एवं प्रत्याशी गणो को पूरी आर्थिक मदद भी जैन समाज करता आया है. ओन सबके बाबजूद जैन समाज का राजनैतिक भागीदारी कम होना आश्चर्यजनक है.

जैन समाज अब संगठित भी है और सक्रीय भी. अब समय आ गया है जब हम अपमी शक्ति को पहचाने एवं लोकतंत्र में अपनी भागीदारी सुनिस्ष्हित करें। जैन समाज के प्रत्येक वर्ग के पदाधिकारीगण भी सुनिश्चित करें की जैनो को दोनों ही प्रमुख पार्टियों कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी से पर्याप्त टिकट मिले एवं जैन समाज तन मन धन से आगे आ कर उन्हें जिताने में अपनी भूमिका निभाए। 

ध्यान रखें राजनैतिक भागीदारी के बिना समाज की पहचान अधूरी है. अतः अपना हक़ लेने के लिए कटिवद्ध हो जाएँ।

ज्योति कोठारी
संयोजक,
सकल जैन समाज, जयपुर 

Thanks,
(Vardhaman Gems, Jaipur represents Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry)
info@vardhamangems.com
Please follow us on facebook for latest updates.

allvoices

Monday, September 29, 2014

Navpad Oli (Ayambil) starts from today, September 30 in this year 2014


Navpad, Siddhachakra Yantra at Vimalnath Jain Temple, Jiaganj

Navpad oli, an auspicious festival  starts from today, September 30 in this year 2014. Jain community will observe nine days' Ayambil (Amil) on these auspicious days. The first day is dedicated to Arihant Paramatma, the Dev Tatva and the first Parameshthi.

The next four days will be for Siddh, Acharya, Upadhyay and Sadhu Parameshthi. People will bow to Samyag Darshan, Samyag Gyan, Samyag Charitra and Samyag Tap in the next four days after observing Sadhu Pad. The Navpad Oli will be concluded on Sharad Purnima, October 8, 2014.

This festival comes twice in a year in Ashwin and in Chaitra months. One has to do nine days' Ayambil dedicating above mentioned nine virtues. One has to do this for nine times to complete Navpad Oli. Large numbers of people dedicate themselves to Navpad in this time. They perform Pooja, Pratikraman, Jap and other spiritual activities to purify soul and to get rid of all Karmik bondage. Liberation is te goal of this spiritual activity.

You may read this article elaborated with multiple photos and videos to know detailed significance about Navpad and Oli.

Jain Festival of India: Navpad Oli (Ayambil) in Jainism

Vardhaman Infotech
A leading IT company in Jaipur 
Rajasthan, India E-mail: info@vardhamaninfotech.com 
allvoices

Sunday, September 28, 2014

बंगाल के जैन तीर्थ: अजीमगंज, जियागंज, मुर्शिदाबाद




मूलगम्भारा, श्री नेमिनाथ जैन मंदिर, अजीमगंज 

आदिनाथ ऋषभ देव मंदिर, काठगोला 
बंगाल एक समय जैन धर्म का गढ़ था, स्वयं भगवान महावीर ने यहाँ विचरण किया था. बंगाल का वर्द्धमान एवं वीरभूम जिला आज भी उस गरिमा की याद दिलाता है. कालक्रम से यहाँ जैन धर्म लुप्तप्राय हो गया एवं यहाँ के सराक जाती के लोग जैन  मुख्य धारा से दूर हो गए. किन्तु १८ वीं सदी से राजस्थान से जैन श्रावकों का यहाँ पुनरागमन होना शुरू हो गया. नवाब मुर्शीदकुली खां ने यहाँ आ कर मुर्शिदाबाद नगर बसाया एवं उसे अपनी राजधानी बनाया। उनके अभिन्न मित्र जगत सेठ भी यहाँ आकर बस गए, तब से यहाँ फिर से जैनो का आना प्रारम्भ हो गया. जगत सेठ ने महिमापुर को अपने निवास स्थान के रूप में चुना एवं वहां मनमोहन पारसनाथ की कसौटी पत्थर का मंदिर बनवाया। कुछ लोग राजमहल एवं काशिमबाजार में जा कर बस गए.

कालांतर में बालूचर प्रमुख जैन वस्ति के रूप में विकसित हुआ जो की बाद में अजीमगंज एवं जियागंज के रूप में प्रसिद्द हुआ. यहाँ के रहनेवाले लोग शहरवाली के रूप में पुरे विश्व में प्रसिद्द हुए. इस समाज का वैभव, संस्कृति, कला, साधर्मी वात्सल्य एवं धर्मानुराग को पूरा जैन समाज जनता है. ये दोनों शहर मुर्शिदाबाद जिले में भागीरथी (गंगा) नदी के दोनों किनारों पर बसे हुए हैं. यहाँ के धनाढ्य ज़मींदारों एवं सेठों ने अनेक कलात्मक एवं विशाल जैन मंदिरों की स्थापना करवाई जिससे इन दोनों जगह ने तीर्थ के रूप में मान्यता प्राप्त की.

रत्नो की जैन प्रतिमायें, अजीमगंज 

स्फटिक रत्न तीर्थकर मूर्ति 

अजीमगंज में ९ एवं जियागंज में ५ श्वेताम्बर व एक दिगंबर जैन मंदिर है. यहाँ पर रत्न निर्मित सम्पूर्ण चौवीसी भी थी जो कुछ वर्षों पूर्व चोरी हो गई. अथक प्रयासों के बावजूद कुछ ही मूर्तियां पुन प्राप्त हो सकी. काठगोला में १०० एकड़ जमीन पर एक विशाल मंदिर एवं दादाबाड़ी भी यहाँ की शोभा बढ़ता है.

फोटो एवं वीडियो के साथ जैन तीर्थके विस्तृत विवरण के लिए पढ़ें
Travel Bengal: Jain Temples in historic Murshidabad 
शहरवाली समाज का ब्लॉग

Vardhaman Infotech 
A leading IT company in Jaipur 
Rajasthan, India
E-mail: info@vardhamaninfotech.com
allvoices

Sunday, September 14, 2014

सकल जैन समाज, जयपुर का क्षमावाणी समारोह


सकल  जैन समाज, जयपुर द्वारा आज भव्य समारोह पूर्वक क्षमावाणी कार्यक्रम आयोजित किया गया. सुबोध पब्लिक स्कूल प्रांगण में आज सुबह से ही जन सैलाब उमड़ रहा था. सभी श्वेताम्बर - दिगंबर दोनों समुुुुदाय के जैन संतों को सुनने के लिए लालायित थे. श्वेताम्बर - दिगंबर जैन एकता का महाकुम्भ जो था ये!!

गत वर्ष दिगंबर जैन राष्ट्रसंत तरुणसागर जी महाराज एवं श्वेताम्बर जैन राष्ट्रसंत द्वय ललितप्रभ सागर एवं चन्द्रप्रभ सागर जी महाराज का ४२ दिन तक तक एक साथ सार्वजनिक कार्यक्रम करवा कर सकल  जैन समाज, जयपुर ने जैन एकता की मिसाल कायम की थी. गत वर्ष भी इसी प्रकार क्षमावणी कार्यक्रम आयोजित हुआ था. उसके बाद से तो ये लौ अनवरत जल रही है. दिगंबर समाज के मानक काला एवं खरतर गच्छ के तत्कालीन संघमन्त्री ज्योति कोठारी के अथक प्रयासों से यह एकता संभव हुई थी.

आज श्वेताम्बर समुदाय के स्थानकवासी, तेरापंथी, खरतर गच्छ एवं तपागच्छ के साधु साध्विओं के साथ दिगंबर समुदाय की ब्रह्मचारिणी जी भी इस कार्यक्रम में सम्मिलित हुई. उन्होंने कहा की उनका जन्म श्वेताम्बर सनडे में हुआ और दीक्षा दिगंबर में. राकेश मुनि ने कहा की वे दिगंबर समाज में जन्मे हैं और श्वेताम्बर समुदाय में उनकी दीक्षा हुई है. साध्वी शशिप्रभा श्री जी ने कहा की आज कारणवश दिगंबर मुनि नहीं पधार पाये यदि वो पधारते तो आज का आनंद और बढ़ जाता।

कार्यक्रममें राजस्थान के महाधिवक्ता नरपतमल लोढ़ा, कुलदीप रांका IAS, डी सी जैन IPS विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे. जयपुर के विभिन्न समुदाय के जैन संघों के पदाधिकारीगण एवं अन्य अनेक गणमान्य व्यक्ति सभा में उपस्थित थे उन सबने उपस्थित संतों एवं सतियों से क्षमा याचना की.

जन टीवी को दिए अपने साक्षात्कार में ज्योति कोठारी ने कहा की गत वर्ष जो मशाल जाली थी आज उसकी रौशनी से पूरा भारत दमक रहा है. इस वर्ष दिल्ली, मुंबई, इन्दौर आदि अनेक स्थानो पर एकता के प्रतीक स्वरुप यह क्षमावणी मनाया गया है. कार्यक्रम का संचालन सुनीश मारु ने किया एवं धन्यवाद महेंद्र सिंघवी ने ज्ञापित किया।  

"संगठन की बीणा को झनझनाने दो, गीत एकता के गुनगुनाने दो"



Vardhaman Infotech
A leading IT company in Jaipur
Rajasthan, India
E-mail: info@vardhamaninfotech.com
allvoices

Monday, September 8, 2014


Navpad Oli of Ashwin month will be commencing from September 30, 2014 this year and will continue till October 8, Sharad Poornima. People will observe Ayambil (Amil) and worship nine supreme powers and attributes in these nine days.

They will worship Panch Parameshthi (Arihant, Siddha, Acharya, Upadhyay, Sadhu) and Samyag Darshan,  Samyag Gyan, Samyag Charitra and Samyag Tap respectively during these nine days to pay tribute to the supreme God and virtues to purify body, mind and soul. Navpad is also known as Siddhachakra.

Navpad Oli comes twice in a year in Ashwin and in Chaitra (Indian lunar months). Both of the Navpad Oli start from the middle of Hindu festival Navratri.

Please click the link to know details:

Jain Festival of India: Navpad Oli (Ayambil) in Jainism

Vardhaman Infotech
A leading IT company in Jaipur
Rajasthan, India
E-mail: info@vardhamaninfotech.com 
allvoices

Sunday, September 7, 2014

वोट करे: विश्वके श्रेष्ठ धर्म कि सुची


सभी जैन भाईओ को निवेदन है कि एक मैगजीन द्वारा विश्वके श्रेष्ठ धर्म कि सुची तैयार हो रही है जिसमे दनीया के सभी लोगो को वोट करने के लीए कहा है। जैन अभीतक ४% वोट से 6ठे पायदान पर हैं। पहले पर इस्लाम और दूसरे पर हिंदू हैं। सभ लोग नीचे दी गई लिंक ओपन करके जैन को वोट करे और ये संदेश देश के सभी जैनियों को पहुचाएं। जय जिनेंद्र!
http://www.thetoptens.com/best-religions/

Thanks,
(Vardhaman Gems, Jaipur represents Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry)
info@vardhamangems.com
Please follow us on facebook for latest updates.
allvoices

Saturday, August 23, 2014

क्षमा एवं विश्व भ्रातृत्व का महत्वपूर्ण पर्व पर्युषण



तीर्थंकर भगवान, कल्पसूत्र फोटो 

 श्री गौतम स्वामी, कल्पसूत्र फोटो 

स्वप्न लक्षण पाठक, कल्पसूत्र फोटो 

पर्युषण जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है जो निरंतर क्षमा एवं विश्व भ्रातृत्व का सन्देश देता है. भाद्रपद अर्थात भादो के महीने में आने वाला यह पर्व श्वेताम्बर एवं दिगंबर दोनों समुदायों में समान रूप से लोकप्रिय है. श्वेताम्बर मूर्तिपूजक एवं स्थानकवासी समुदाय इसे भादो वदी १२ से भादो सुदी ४ तक एवं तेरापंथी इसे वदी १३ से सुदी ५ तक मानते हैं.  दिगंबर समुदाय का पर्युषण सुदी ५ से प्रारम्भ हो कर सुदी १४ तक दस दिन का होता है. इसे दस लक्षण पर्व भी कहते हैं.

इस वर्ष श्वेताम्बर मूर्तिपूजक समुदाय का पर्युषण २२ से २९ अगस्त एवं टरपंथियों का २३ से ३० अगस्त तक होगा। दिगम्बरों का दस लक्षण पर्व ३० अगस्त से प्रारम्भ हो कर ८ सितम्बर को पूरा होगा।  श्वेताम्बर समुदाय में पर्युषण के अंतिम दिन संवत्सरी के रूप में मन्या जाता है एवं दिगम्वर समुदाय इसे अनंत चौर्दशी के रूप में मनाता है.

पर्युषण मुख्यतः आत्मशुद्धि का पर्व है. इस शब्द का शाब्दिक अर्थ है आत्मा का पोषण करना अर्थात अपने आत्म गुणों में अभिवृद्धि करना। पर्युषण में प्रतिक्रमण के द्वारा हम अपने आत्मिक दोषों की शुद्धि करते हैं, सभीसे वैर भाव की क्षमा याचना करते हैं एवं विश्व मैत्री की भावना प्रतिष्ठित करते हैं.

पर्युषण के दिनों में मंदिरों में विशेष पूजा पाठ का आयोजन होता है एवम अपनी अपनी आम्नाय के अनुसार लोग पूजा भक्ति, आंगी, आरती इत्यादि करते हैं. इस अवसर पर मंदिरों में विशेष सजावट भी देखी जाती है. अनेक स्थलों पर रात्रि जागरण आदि भी होता है.

श्वेताम्बर समुदाय में प्रतिदिन प्रवचन, पूजा, भक्ति के अतिरिक्त प्रतिदिन सुबह शाम प्रतिक्रमण करने की भी प्रथा है. आत्मा शुद्धि के लिए प्रतिक्रमण को अति आवश्यक माना गया है. सभी जैन काम से काम एक दिन संवत्सरी को तो प्रतिक्रमण करते ही हैं.

पर्युषण के दिनी में श्वेताम्बर समुदाय में कल्पसूत्र एवं अंतगढ़ दशांग सूत्र वांचने की परंपरा है एवं दिगंबर समुदाय में मोक्ष शास्त्र का वांचन होता है. श्वेताम्बर मूर्तिपूजक समुदाय में कल्पसूत्र वांचन प्रारम्भ होने से पहले अष्टान्हिका वांचन की भी परंपरा है।  पर्युषण के चवें दिन भगवान महावीर का जन्म वांचन होता है और पूरा समाज इसे बड़े ही धूमधाम से मनाता है।

Paryushan Greatest Jain auspicious Parva

 Vardhaman Infotech 
A leading IT company in Jaipur
Rajasthan, India
E-mail: info@vardhamaninfotech.com 
allvoices

Saturday, August 16, 2014

जैन घर देरासर एवं चैत्यालय


जैन मनीषी एवं लेखक श्री सुरेन्द्र बोथरा चैत्यालय में दर्शन करते हुए 
कल हमारे पुराने मित्र एवं अमरीका में जैन धर्म के प्रोफेसर श्री जॉन कोर्ट (डैनीसन विश्व विद्यालय, अमरीका) से जयपुर में मुलाकात हुई और उन्होंने बताया की इस समय वे गुजरात के घर देरसरों पर शोध कर रहे हैं. उन्होंने बताया की गुजरात में घर देरासर की पुरानी एवं लम्बी परम्परा रही है. वे जयपुर के घर देरसरों के बारे में जानना चाहते है. उनकी बात से मुझे प्रेरणा मिली की इस विषय पर एक ब्लॉग लिखा जाये।

जैन समाज में शिखरवद्ध मंदिरों के साथ ही घर देरासर की परंपरा रही है. श्वेताम्बर संघ इन्हे घर देरासर एवं दिगंबर समाज चैत्यालय कहता है. सामान्यतः समाज के धनाढ्य वर्ग के लोग अपने घरों में ही एक अलग स्थान निश्चित कर वहां मंदिर बनवाया करते थे एवं उसमे मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करवा कर उसे पूजनीय बनाते थे. घर परिवार के साथ ही आसपास के जैन धर्मावलम्वी लोग भी वहां दर्शन पूजा करने आया करते थे।
जहाँ शिखरवद्ध मंदिर नहीं होता था वहां इन घर देरासर एवं चैत्यालय का महत्व और भी अधिक हो जाता था.  जयपुर में लगभग ८० दिगंबर जैन चैत्यालय अवस्थित है परन्तु श्वेताम्बर घर देरासर की संख्या बहुत कम है. महोपाध्याय श्री विनयसागर जी ने अपने शिला लेख संग्रह में दो पुराने घर देरासर का उल्लेख किया है. जिसमे से एक श्री प्रतापमल ढड्ढा घर देरासर अब मौजूद नहीं है. श्री नथमल गोलेच्छा घर देरासर को उनके परिवार जानो ने खरतर गच्छ संघ को भेट कर दिया था और अब वहां एक शिखर वद्ध मंदिर बन रहा है।

इसके अतिरिक्त कुछ वर्षों पूर्व बरडिया कॉलोनी में मुंबई के सेठ नरेश भाई के द्वारा एक घर देरासर बनवाया गया है जिसमे कॉलोनी के लोग पूजा सेवा करते हैं. पुराने समय में यातीलोग भी अपने उपाश्रय या अन्य स्थानो पर घर देरासर बनवाते थे. जयपुर में यति श्यामलाल जी का उपाश्रय, लीलाधर जी का उपाश्रय, कोतवाल जी का मंदिर आदि इसी श्रेणी के हैं. विजय गच्छ के मंदिर के पास भी ऐसा ही एक स्थान था जिसकी तीर्थंकर मूर्तियों को ३०-३६ वर्ष पूर्व विजय गच्छ के मंदिर में ला कर प्रतिष्ठित किया गया था.

यति श्यामलाल जी का उपाश्रय तोड़कर वहां एक काम्प्लेक्स का निर्माण कराया जा रहा है वहां की प्रतिमाएं कहाँ है पता नहीं। कोतवाल जी का मंदिर एवं लीलाधर जी का उपाश्रय (वर्तमान में श्वेताम्बर स्कूल) अब खरतर गच्छ संघ जयपुर की देखरेख में है.

कलकत्ता शहर में कई घर देरासर हैं जिसमे से इंडियन मिरर स्ट्रीट स्थित नाहर परिवार द्वारा निर्मित कुमार सिंह हॉल,  क्रीक रो में दुगड़ परिवार द्वारा बनाया गया एक एवं भानुमति परख परिवार द्वारा बनाया गया एक घर देरासर प्रसिद्द है. इसी प्रकार ताराबहन हरखचंद कांकरिया परिवार द्वारा कांकरिया एस्टेट, रसल स्ट्रीट में भी एक घर देरासर है.

अजीमगंज में दुगड़ परिवार का गउड़ी पार्श्वनाथ मंदिर (घर देरासर) अभी भी मौजूद है. हरखचंद गोलेच्छा परिवार द्वारा निर्मित छोटी शांतिनाथ जी के नाम से प्रसिद्द घर देरासर को श्री चिंतामणि पारसनाथ मंदिर में बहुत वर्षों पूर्व स्थानांतरित कर दिया गया था. इस मंदिर में रत्नो की चौवीसी थी जिसमे से कुछ प्रतिमाएं चोरी हो गयी एवं कुछ अभी भी है.

७ वें तीर्थंकर श्री सुपार्श्व नाथ स्वामी, ८ वें तीर्थंकर श्री चन्द्रप्रभ स्वामी, ११ वें तीर्थंकर श्री श्रेयांश नाथ स्वामी एवं २३ वें तीर्थंकर श्री पार्श्व नाथ स्वामी की कल्याणक भूमि बनारस में भी कई घर देरासर हैं जिनमे बनारस के ही धम्मावत परिवार एवं अजीमगंज के दुगड़ परिवार द्वारा निर्मित घर देरासर रामघाट में स्थित है.

Vardhaman Infotech
A leading IT company in Jaipur
Rajasthan, India E-mail:
info@vardhamaninfotech.com


allvoices

Wednesday, July 23, 2014

ACHARANGA : A framework for everyday ecology


Kathgola temple and Dadabadi, an Environment friendly zone

  
ACHARANGA : a framework for everyday ecology
(Surendra Bothara analyses this scripture and its profound contribution)

The general meaning of environment is 'external conditions or surroundings'. The more precise meaning is 'the surrounding conditions, influences or forces that influence or modify the whole complex of climatic, edaphic (soil related) and biotic factors that act upon an organism or an ecological community and ultimately determine its form and survival' (Websters's Third New International Dictionary).

It would appear that religion has hardly anything to do with such physical and technical things as the environment and ecology. This is because the artificial dividing lines originally drawn between different disciplines for convenience of management have now become barriers. We generally miss the fact that in the overall picture of things everything is directly or indirectly connected and related to every other thing.

Since the very beginning, man has been making involuntary as well as voluntary efforts to understand nature and develop a symbiotic life style. And of all the ancient schools of thought, the philosophy of the Jains has made the most progress in this direction. Indeed, Jain thinkers succeeded in designing an environment-based style of life that is both rational and scientific.

Jain sages had an acutely penetrating and sensitive insight into the world of living things. They designed the ahimsa way of life with a very wide and liberal perspective on life. The popular Jain aphorism -- "Parasparopagraho jeevanam" (mutually supportive are all living things) -- encompasses the web of interdependence existing in nature at all levels. For example, bacteria extract nutrition from the intestine and at the same time help in the digestion of food. Or a bee extracts juices from flowers and at the same time pollinates for procreation.

Tree worship and the concept of the wish-fulfilling tree (Kalpavriksha) are common to almost all Indian religions. But to believe that souls exist in plants and in invisible forms of life, to advocate abstention from destroying any life form, to give supreme importance to discipline and self-restraint at both the individual and social levels, to pursue pacification of animosity and aggression, and to nurture universal fraternity and compassion, are all inherent attributes of the Jain way of life that make it environment-friendly.

Preventing abuse of the ecosystem is an intrinsic part of the ahimsa way of life. If we look at the Jain code of conduct, both for ascetics and laity, we find that it prohibits both the individual and society from harming the natural habitat. In fact, it goes a step beyond this. By nurturing the natural functioning of the habitat through sentiments of ahimsa and universal fraternity, it helps to restore any damage or disturbance caused to the ecological balance. In other words, it is designed to eliminate the sources of disturbance to the natural world in a pragmatic way.

Indeed, an orientation toward the protection of the environment was so inherently a part of the Jain way of life that for Jains it became second nature. Unfortunately, the coherency and power of that environmental awareness appears to have been lost. Time has taken its toll. The advent of the ritualistic observance of Jainism has left us with only the skeletal remains of the true Jain philosophy of life.

Care in the disposal of waste has been included among the five cares (samitis) that form the essential part of the first and primary Jain vow of Ahimsa. We have never really tried to assess why so much importance was given to such a routine activity. Even today it has not been highlighted and elaborated beyond its ritual and traditional spiritual role. We now know that one of the prime causes of environmental degradation is careless release of polluting waste, both normal as well as industrial, into the natural environment. This should inspire us to regard the concept of the samitis with renewed appreciation.

It seems that at some point in time the system of studying the old texts with the freedom of exploring other than tradition-assigned themes and meanings broke down. Instead, most of these texts were simply branded as religious and spiritual and placed beyond the reach of innovative interpretation. This appears to be the reason for the exclusively religious, ritualistic and sectarian commentaries by the later traditional scholars and thinkers. It is time we shattered the cocoon of obscure and ritualistic traditional interpretations. We need to examine the ancient texts from different angles and to try to explore interpretations. By doing so we are bound to discover new vistas of meaning in most of our ancient scriptures.

In this context, I would like to refer to the Acharanga Sutra, the first sermon of Bhagavan Mahavir. It is the first of the eleven extant Anga Sutras (the primary canons or the main corpus of the Jain canonical texts. This consists of twelve treatises, eleven of which are extant according to the Shvetambar tradition). The traditional interpretation of Acharanga, or for that matter of any other Jain scripture, is directed at the spiritual realm. There can be no objection to that. However, when the traditionalists maintain and emphasize that this is the only valid interpretation and that there is no scope for any other viewpoint, a serious objection emerges. Is such absolutist attitude not against the Jain doctrine of Anekant-vaad (non-absolutism)?

If we look at Acharanga Sutra from the standpoint of environmental concerns, we will find that it abounds in information related to environment. In fact, it would not be exaggerating to say that Acharanga Sutra is the oldest thorough, rational and focused human effort to develop an environment-friendly way of life on the basis of an understanding of the importance of all facets of the ecology.

The Acharanga starts with a discussion of movement (gati), or the direction of movement of life. It says -- "I have heard, O long-lived one (Jambu Swami), Bhagavan (Mahavir Swami) say thus -- 'Some beings in this world are not aware of this -- that whether I have come from the eastern direction, or I have come from the southern direction, or I have come from the western direction, or I have come from the northern direction, or I have come from the direction above (zenith), or I have come from the direction below (nadir), or I have come from some other direction (cardinal points) or intermediate directions (between the cardinal points)." (Acharanga 1/1)

The traditional interpretation of the term gati is related to the concept of rebirth. But let us leave that aside for the spiritualists and the religious and look at it in the context of the physical world and day-to-day life. The direction of movement of a thing or a living being plays a vital role in the protection or destruction of the ecology of this planet. As we know, the environment is a setup of innumerable complex subsystems made up of infinite living organisms, things and forces, always in an all-pervading dynamic balance. A change in the natural direction and functioning of just one of the infinite constituents of one of the innumerable subsystems disturbs this balance. In such a situation man, endowed with the unique capacity to think, imagine and translate his thoughts into action, has an added responsibility. His conduct and direction of movement can be damaging not only to himself but also to this dynamic balance if he is ignorant of the natural functioning of the things around him.

The Acharanga then advises us to be aware of violent actions and mentions the reasons thereof-- "In the world (being sources of violence) all these sinful activities that are causes of the inflow of karmas (karma-samarambhs) are worth knowing and abandoning." (Acharanga -1/1/5)

About this Bhagavan has prescribed (preached or propagated) parijna (awareness or knowledge).

"Man indulges in violence mainly for the following reasons —

·        In order to protect his life --everyone loves life, therefore he makes use of wealth, medicine, and other things.
·        In order to gain praise and fame --he makes efforts to win competitions like wrestling.
·        In order to gain status and prestige --he accumulates wealth and power.
·        In order to gain respect and veneration --he participates in war and other such violent contests.
·        Birth --he indulges in festivities to celebrate the day of his child's or own birth.
·        Death --he indulges in various rites and rituals connected with death.
·        Inspired by the desire of liberation --he indulges in religious rituals like animal sacrifice.
·        In order to be free of sorrows --he indulges in various violent experiments to vanquish ailments, terror, and torments." (Acharanga -1/1/7)

The target of these sinful activities is the world of the living. In the Jain view, this includes a large part of what we know as matter. Jains have defined matter as ajiva (non-living). The detailed definitions and varied interpretations of living organisms constitute a vast discipline in themselves. For the theme under consideration here, it will suffice to understand that beyond the visible gross world there exists a minute and subtle world that influences us and is influenced by us. Therefore, every action that harms this world of micro and macro life and matter is a form of violence and should be curbed. In every life form there is autonomous and reactive movement. The sentient beings have an additional movement, the volitional movement. When we are careful in movement, we are essentially careful in thought.

After emphatically establishing that ignorance or awareness of directions of movement influences the actions of a being, the Acharanga talks of actions to be curbed. Classifying such actions as himsa (violence), it prohibits them. The reason for this is that the consequence of such actions tarnishes the soul by causing it to acquire karmic dust, which leads to anguish, distress, agony, sorrow and death during this or subsequent births (the present and the future).

In its elaboration of the area of violence, the Acharanga has enveloped almost all major components of ecology. The description starts with the violence towards earth-bodied (prithvikaaya) beings.

"Therefore, knowing about the unexpressed sufferings of the earth-bodied beings, one (the sagacious) should not harm earth-bodied beings himself, neither make others do so, nor approve of others doing so." – (Acharanga 1/2/17) The traditional definition of earth-bodied beings is minute organisms made of and subsisting on the earth-element. In the same manner, the Acharanga defines water-bodied, air-bodied, fire-bodied and plant-bodied beings before proceeding to the animal world.

The Acharanga also gives the first authenticating statement about soul-bearing life in plants by comparing a plant body with the human body --



"I say —
-         This human body is born, so is this plant.
-         This human body grows, so does this plant.
-         This human body is sensitive, so is this plant.
-         This human body withers when damaged, so does this plant.
-         This human body has food intake, so has this plant.
-         This human body decays, so does this plant.
-         This human body is impermanent, so is this plant.
-         This human body gets strong with nutrition and weak without it, so does this plant.
-         This human body undergoes many changes, so does this plant." -- (Acharanga 1/5/46)

The Acharanga's concept of violence is far more elaborate and wider in scope than the normal or traditional definition of violence. The reason behind prohibiting violence to any component (as defined in Acharanga) of the complex life-system on this planet is not easily appreciated. In order to comprehend it fully, we need to understand the complex, dynamic and fragile ecological balance existing in nature. We should also know how a seemingly insignificant but ignorant human action can disturb this balance and cause harm to innumerable living beings, including humans. Plenty of examples are strewn around, and we only have to open our eyes.

The Acharanga then mentions weapon (shastra) as a means of violence. To hurt or destroy something employing a weapon (or tool of violence) is certainly a form of violence (himsa). And this weapon is defined as anything, including our intent, that has attributes contradictory, conflicting or hostile to those of the object against which it is directed. To contaminate earth, water, air and fire with things having conflicting properties is violence. This is a unique definition of a weapon and appears to be based explicitly on ecological insights. It could be expressed in ecological terms by saying that anything that pollutes and harms earth, water, air, or fire is a weapon, and that the act of polluting is violence (himsa).

These four -- earth, water, air, and fire -- in the state in which they normally exist are the basic and essential components of the habitat conducive to life. Even modern scientists and thinkers, who have suffered the consequences of environmental pollution, have not been able to design environmental protection programmes based on such comprehensive definitions of weapons and violence.

Assigning the category jiva (living organism) to the life sustaining components of nature -- earth, water, fire and air -- is suggestive of the important responsibility of man towards nature. Violence does not simply mean harm to the visible life forms. The Acharanga definition of violence extends even to interfering with the evolutionary processes that produce future forms of life. If we are earnest about protection of environment, we will have to popularize such comprehensive and all-enveloping concepts. In conclusion, the Acharanga states -- "He who has properly understood the violence related to six life forms is a parijnat-karma muni (a discerning sage or an ascetic who with a discerning attitude abandons violence)." -- Acharanga 1/7/56

After proscribing violence, the Acharanga then moves to a detailed discussion of the disciplined life-style designed to avoid such violent and anti-environmental activities. When we resolve not to harm two to five sensed living beings, we will avoid cruelty towards the full range of animals that are tortured and killed, not just for food and medicine but also for producing things of comfort and beautification. When we resolve not to harm one sensed living organisms, we will avoid careless exploitation of the material resources available in nature. The life-style proposed here is intimately connected with mutually sustainable interaction with nature and the environment. This is what conservation ethics is all about. This unique way of living shows the path of spiritual as well as mundane development that avoids disturbance of the fragile dynamic balance of the ecology of this planet.

The Acharanga establishes Ahimsa as a universal and eternal truth. Ahimsa as elaborated in the Acharanga does not stop at philanthropy. The Acharanga proposes universal fraternity for all life-forms and extends that fraternity even to matter. It is a fundamental principle applicable to all facets of life and all dimensions of the physical world. It is not just about feelings, it is also about the balance in the physical universe. Anything conducive to balance is ahimsa.

These are some examples selected from the first chapter of the Acharanga. Although the book was written more than two millennia ago by Jain thinkers, if it is studied from an ecological point of view one can readily see that it could have been written by modern environmentalists. The need of the hour is that modern Jain thinkers, scholars and researchers should rise above traditional dogmas and conduct unbiased and multidimensional research on this and other scriptures. This would indeed be beneficial, not just to mankind, but to the entire world of the living.

(Article appeared in Jain Spirit, Issue 25, 2006, an international quarterly published from London. Hindi version of a part of this article was originally published in Prakrit Vidya, April-December 1991, a periodical published by Prakrit-adhyayan Prasar Samsthan, Udaipur)

******** 
Surendra Bothara
3968, Rasta M. S. B., Johari Bazar, Jaipur - 302 003. Ph. (0141) 2569712 .

email :  

Please visit
Jainism and environment 

Vardhaman Infotech 
A leading IT company in Jaipur
Rajasthan, India
E-mail: info@vardhamaninfotech.com
allvoices

Monday, July 21, 2014

चित्रांग मुर्डिया ने फिजिक्स ओलिंपियाड में जीता स्वर्णपदक

चित्रांग मुर्डिया 

उदयपुर के चित्रांग मुर्डिया ने कज़ाकिस्तान के अस्ताना में आयोजित फिजिक्स ओलिंपियाड में स्वर्णपदक जीत कर देश एवं जैन समाज का नाम रोशन किया है. मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से भारतीय विद्यार्थियों का एक दल इस विश्व स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लेने गया हुआ है. इसमें चित्रांग के अलावा भारत के एक और किशोर ने स्वर्णपदक प्राप्त किया है. यह ओलिंपियाड आज समाप्त होने वाली है. 

देश के सभी प्रमुख अख़बारों ने इस समाचार को प्रकाशित किया है. देश के प्रमुख दैनिक अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने तो अपने जयपुर संस्करण में इसे मुखपृष्ठ पर प्रमुखता से छापा है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया को अस्ताना, कज़ाकिस्तान से दूरभाष पर दिए एक साक्षात्कार में चित्रांग ने कहा की इस कठिन प्रतियोगिता में भारतीय दल ने अच्छा प्रदर्शन किया। विश्व के सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमानो से प्रतियोगिता करना एक स्मरणीय अनुभव है. इस यात्रा से मुझे ये भी अनुभव हुआ की हमारी शिक्षा प्रणाली किसी भी उन्नत देश से कमजोर नहीं है. 

चित्रांग का सम्पूर्ण विद्यार्थी जीवन गौरवशाली रहा है एवं इस वर्ष आयोजित  IIT-JEE, 2014 परीक्षा में वह पुरे भारत में अव्वल रहा है. वो भारत का एक मात्र विद्यार्थी है जिसने भौतिकी, रसायन, गणित एवं ज्योतिर्विद्या इन चारों विषयों में ओलिंपियाड सफलता पूर्वक उत्तीर्ण की है.
चित्रांग मुर्डिया के पिता श्री मनीष मुर्डिया इलेक्ट्रॉनिक सामान के व्यापारी हैं एवं जैन कला मेंविशेष रूचि रखते हैं. उसकी माँ सोनाली एक गृहिणी हैं साथ ही व्यापर भी करती हैं. उसके नाना डा श्री शमशेर भंडारी  जयपुर में नेत्र शल्य चिकित्सक हैं एवं उसके माँ के मामा श्री सुरेन्द्र बोथरा जैन धर्म के ख्याति प्राप्त विद्वान हैं जिन्होंने लगभग वीस आगमो का अंग्रेजी में अनुवाद किया है. 

हमें ऐसे होनहार विद्यार्थी पर गर्व है.  



Vardhaman Infotech
A leading IT company in Jaipur
Rajasthan, India
E-mail: info@vardhamaninfotech.com
allvoices

Monday, July 14, 2014

जयपुर में अर्थ सहित स्नात्र पूजा महोत्सव का आयोजन












कल १३ जुलाई २०१४ को परम पूज्या साध्वी श्री शशिप्रभा श्री जी महाराज की निश्रा में जवाहरनगर, जयपुर में अर्थ सहित स्नात्र पूजा महोत्सव का आयोजन किया गया. श्री श्वेताम्बर जैन संघ द्वारा महावीर साधना केंद्र में आयोजित इस पूजा में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया।

स्नात्र पूजा के सम्वन्ध में बताते हुए ज्योति कोठारी ने कहा की जैन धर्म की सभी पूजाओं में इस का अत्यंत विशिष्ट स्थान है एवं सभी पूजाओं से पहले इसे आवश्यक रूप से पढ़ाया जाता है परन्तु दुर्भाग्यवश आज लोग इसके महत्व को भूलने लगे हैं. उन्होंने आगे बताया की जब तीर्थंकर परमात्मा का जन्म होता है तब इन्द्रादिक देव मिलकर उन्हें मेरु पर्वत पर ले जाकर अभिषेक करते हैं इसी क्रिया का पुनरावर्तन ही स्नात्र पूजा है.

ज्योति कोठारी ने कहा की समवायांग सूत्र, चंदपण्णत्ति, सुरपण्णत्ति आदि आगमो में इसका वर्णन मिलता है एवं महा मनीषी पंडित देवचंद जी उपाध्याय ने तीन सौ वर्षों से भी अधिक पहले इन आगमो से इस पूजा की रचना की थी. यह भक्ति, तत्वज्ञान एवं संगीत की त्रिवेणी है. उन्होंने पूजा का भावपूर्ण अर्थ करते हुए इसके महत्त्व को समझाया जिससे उपस्थित जान समूह भाव विभोर हो उठा.

इस पूजा में छप्पन दिककुमारियों के रूप में स्थानीय पाठशाला की वालिकाओं ने मनमोहल प्रस्तुति दी. बालक गण इंद्रा के रूप में सुन्दर लग रहे थे. संघ की और से इन बालक बालिकाओं को पुरष्कृत भी किया गया.

Vardhaman Infotech
A leading IT company in Jaipur
Rajasthan, India
E-mail: info@vardhamaninfotech.com

allvoices