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Monday, September 21, 2009

जैन धर्म की मूल भावना भाग ३: एक गंभीर प्रश्न

आज एक बार फिर से यह प्रश्न सामने आया की क्या हम जैन धर्म की मूल भावना को समझ पा रहे हैं? जयपुर के विचक्षण भवन में पूज्या साध्वी श्री सुलोचना श्री जी का चातुर्मास है। आज वहां पढाते हुए एक बात सामने आइ। अद्यात्मा योगी श्री आनंदघन जी के नवे स्तवन का स्वाध्याय चल रहा था, जिसमे तीर्थंकर परमात्मा के दर्शन पूजन आदि की चर्चा है। स्वाध्याय के दौरान साध्वी प्रीतिसुधा जी ने पूछा की अलग अलग गाँव व शहर के नम के हिसाब से तीर्थंकर मन्दिर की स्थापना होती है।

अनेक लोग ऐसा कहते हैं की यदि राशी के हिसाब से मुलनायक भगवन की प्रतिष्ठा नहीं हो तो वस्ति को नुकसान होता है। गाँव या शहर उजड़ तक जाते हैं। वो कह रहीं थी की बड़े लोग यहाँ तक की कई आचार्य भगवंत भी ऐसा कहते हैं।

मैंने पलट कर पूछा की क्या आनंदघन जी, देवचंद जी या यशोविजय जी जैसे महँ पुरुषों ने भी ऐसा कहा है? उत्तर में उन्होंने कहा की नहीं उनलोगों ने तो ऐसा नहीं कहा।
मैंने कहा तो फिर ये बातें कैसे आई? उनने कहा की क्या ज्योतिष शास्त्र सही नही है? मैंने फिर से कहा की क्या ज्योतिष शास्त्र अरिहंत परमात्मा से बढ़ कर है?

ये एक गंभीर प्रश्न है। अरिहंत परमात्मा जगत के सर्व श्रेष्ठ कल्याणकारी तत्त्व हैं। वे सिद्धचक्र अर्थात नवपद के भी केन्द्र में हैं। अनेक भवों की साधना से ही कोई व्यक्ति जगत के इस सर्व श्रेष्ठ पड़ को प्राप्त कर सकता है। अपने पूर्व भवों में भी अरिहंत परमात्मा जगत के सभी जीवों के कल्याण की कामना करते हैं। उसी के परिणाम स्वरुप तीर्थंकर के भावः में उनके जन्म, दीक्षा आदि कल्याणक कहलाते हैं। उन कल्याणकों के समय में नारकी जीवों तक को सुख पहुँचता है। अब प्रश्न यह उठता है की जिनके रोम रोम में जगत के सभी जीवों की कल्याण की कामना वासी है ऐसे तीर्थंकर का मन्दिर किसी भी स्थिति में अमंगलकारी कैसे हो सकता है? शाश्त्राकारों का कहना है की सभी तीर्थंकर एक जैसे होते हैं उनमे कोई भेद नहीं। फिर यदि किसी शहर के लिए यदि एक तीर्थंकर कल्याण करी हों तो दुसरे तीर्थंकर कैसे अमंगलकारी हो सकते हैं? क्या तीर्थंकर परमात्मा इतने क्रूर हैं की मात्र राशी के अनुसार विराजमान नही करने मात्र से शहर उजड़ जाए? नहीं ऐसा नहीं हो सकता। तीर्थंकर परमात्मा अपने सभी रूपों में, सभी अवस्थाओं में कल्याणकारी ही होते हैं। किसी भी स्थिति में वे अमंगलकारी या अकल्याणकारी नही हो सकते।
इस प्रकार अरिहंत परमात्मा के संवंध में कहना की अमुक स्थान पर अमुक तीर्थंकर की प्रतिमा राशी के अनुसार नहीं होने से वसति उजड़ गई क्या तीर्थंकर परमात्मा के प्रति अश्रद्धा का द्योतक नहीं है? क्या यह तीर्थंकर परमात्मा का अवर्ण वाद नहीं है? क्या हम तीर्थंकर परमात्मा, उनके गुन, उनकी शक्ति, उनकी कल्याण करने की क्षमता को समझ पाए हैं?
क्या आज के तथा कथित आचार्य गण व अन्य मुनि गण इस बात की और ध्यान देंगे? सुविहित गीतार्थ आचार्य भगवंतों से प्रार्थना है की जैन धर्म व समाज में फैली इस भ्रान्ति को दूर करने की कृपा करें।

साथ ही सुज्ञान श्रावकों से भी गुजारिश है की हर किसी की बातों में आ कर जिनेश्वर देव अरिहंत परमात्मा (तीर्थंकर भगवन) की आशातना कर घोर पाप के भागी न बनें। ध्यान रखने योग्य बात ये है की अरिहंत परमात्मा के वचनों के अनुसार नही चलना ही सभी पापों के मूल में है। उनकी आशातन से बढ़ कर और क्या बड़ा पाप हो सकता है?

मुझे विश्वाश है की मेरी इस बात पर ध्यान दे कर योग्य निर्णय किया जाएगा एवं हम जैन धर्म की मूल भावना के अनुसार चल सकेंगे।

जैन धर्म की मूल भावना भाग 1
जैन धर्म की मूल भावना भाग 2
जैन धर्म की मूल भावना भाग 3
जिन मंदिर एवं वास्तु
प्रस्तुति:
ज्योति कोठारी

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4 comments:

  1. This is really an important question. So called Jain Acharyas must not propagate this short of things in the name of Jainism. Tirthankar is supreme in Jainism and nothing should be talked that insults him.

    We, the Jain community become sensitive when a person from some other community says something against Arihant or his doctrine. Why then this Acharyas propagating such baseless matters in the society?

    Brave article.

    Thanks and best wishes.

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  2. Nice article and nice comment. Why we do not read our own texts (Shastra) and follow other texts such as astrology?

    Why do we believe on those instead of worshiping Tirthankar paramatma?

    Thanks to Jyoti Ji. I request all readers to mail these articles to as many Jain people as possible.

    Thanks,

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  3. Excelent post. We shoud know and act acoording to real essence of Jainism
    Thanks for thought provoking posts in three parts.
    Sunil Jargad

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  4. Jyoti bhai,
    Orthodox persons from Jain society may be annoyed with your posts. So called religious people are not so religious.
    Even the so called Acharya and Sadhu Sadhwi are not going with spirit of true Jainism.
    many times they preach what they like and noy Arihant paramatma told.
    Thanks for a master stroke.

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