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Monday, September 21, 2009

जैन धर्म की मूल भावना भाग ३: एक गंभीर प्रश्न

आज एक बार फिर से यह प्रश्न सामने आया की क्या हम जैन धर्म की मूल भावना को समझ पा रहे हैं? जयपुर के विचक्षण भवन में पूज्या साध्वी श्री सुलोचना श्री जी का चातुर्मास है। आज वहां पढाते हुए एक बात सामने आइ। अद्यात्मा योगी श्री आनंदघन जी के नवे स्तवन का स्वाध्याय चल रहा था, जिसमे तीर्थंकर परमात्मा के दर्शन पूजन आदि की चर्चा है। स्वाध्याय के दौरान साध्वी प्रीतिसुधा जी ने पूछा की अलग अलग गाँव व शहर के नम के हिसाब से तीर्थंकर मन्दिर की स्थापना होती है।

अनेक लोग ऐसा कहते हैं की यदि राशी के हिसाब से मुलनायक भगवन की प्रतिष्ठा नहीं हो तो वस्ति को नुकसान होता है। गाँव या शहर उजड़ तक जाते हैं। वो कह रहीं थी की बड़े लोग यहाँ तक की कई आचार्य भगवंत भी ऐसा कहते हैं।

मैंने पलट कर पूछा की क्या आनंदघन जी, देवचंद जी या यशोविजय जी जैसे महँ पुरुषों ने भी ऐसा कहा है? उत्तर में उन्होंने कहा की नहीं उनलोगों ने तो ऐसा नहीं कहा।
मैंने कहा तो फिर ये बातें कैसे आई? उनने कहा की क्या ज्योतिष शास्त्र सही नही है? मैंने फिर से कहा की क्या ज्योतिष शास्त्र अरिहंत परमात्मा से बढ़ कर है?

ये एक गंभीर प्रश्न है। अरिहंत परमात्मा जगत के सर्व श्रेष्ठ कल्याणकारी तत्त्व हैं। वे सिद्धचक्र अर्थात नवपद के भी केन्द्र में हैं। अनेक भवों की साधना से ही कोई व्यक्ति जगत के इस सर्व श्रेष्ठ पड़ को प्राप्त कर सकता है। अपने पूर्व भवों में भी अरिहंत परमात्मा जगत के सभी जीवों के कल्याण की कामना करते हैं। उसी के परिणाम स्वरुप तीर्थंकर के भावः में उनके जन्म, दीक्षा आदि कल्याणक कहलाते हैं। उन कल्याणकों के समय में नारकी जीवों तक को सुख पहुँचता है। अब प्रश्न यह उठता है की जिनके रोम रोम में जगत के सभी जीवों की कल्याण की कामना वासी है ऐसे तीर्थंकर का मन्दिर किसी भी स्थिति में अमंगलकारी कैसे हो सकता है? शाश्त्राकारों का कहना है की सभी तीर्थंकर एक जैसे होते हैं उनमे कोई भेद नहीं। फिर यदि किसी शहर के लिए यदि एक तीर्थंकर कल्याण करी हों तो दुसरे तीर्थंकर कैसे अमंगलकारी हो सकते हैं? क्या तीर्थंकर परमात्मा इतने क्रूर हैं की मात्र राशी के अनुसार विराजमान नही करने मात्र से शहर उजड़ जाए? नहीं ऐसा नहीं हो सकता। तीर्थंकर परमात्मा अपने सभी रूपों में, सभी अवस्थाओं में कल्याणकारी ही होते हैं। किसी भी स्थिति में वे अमंगलकारी या अकल्याणकारी नही हो सकते।
इस प्रकार अरिहंत परमात्मा के संवंध में कहना की अमुक स्थान पर अमुक तीर्थंकर की प्रतिमा राशी के अनुसार नहीं होने से वसति उजड़ गई क्या तीर्थंकर परमात्मा के प्रति अश्रद्धा का द्योतक नहीं है? क्या यह तीर्थंकर परमात्मा का अवर्ण वाद नहीं है? क्या हम तीर्थंकर परमात्मा, उनके गुन, उनकी शक्ति, उनकी कल्याण करने की क्षमता को समझ पाए हैं?
क्या आज के तथा कथित आचार्य गण व अन्य मुनि गण इस बात की और ध्यान देंगे? सुविहित गीतार्थ आचार्य भगवंतों से प्रार्थना है की जैन धर्म व समाज में फैली इस भ्रान्ति को दूर करने की कृपा करें।

साथ ही सुज्ञान श्रावकों से भी गुजारिश है की हर किसी की बातों में आ कर जिनेश्वर देव अरिहंत परमात्मा (तीर्थंकर भगवन) की आशातना कर घोर पाप के भागी न बनें। ध्यान रखने योग्य बात ये है की अरिहंत परमात्मा के वचनों के अनुसार नही चलना ही सभी पापों के मूल में है। उनकी आशातन से बढ़ कर और क्या बड़ा पाप हो सकता है?

मुझे विश्वाश है की मेरी इस बात पर ध्यान दे कर योग्य निर्णय किया जाएगा एवं हम जैन धर्म की मूल भावना के अनुसार चल सकेंगे।

जैन धर्म की मूल भावना भाग 1
जैन धर्म की मूल भावना भाग 2
जैन धर्म की मूल भावना भाग 3
जिन मंदिर एवं वास्तु
प्रस्तुति:
ज्योति कोठारी

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Friday, September 18, 2009

नवपद पूजा के कुछ दोहों का अर्थ

पर्युषण हेतु मेरे कलकत्ता प्रवास के दौरान श्री दिनेश जी धूपिया ने मेरे से इन गाथाओं एवं दोहों का अर्थ लिखने के लिए कहा था। श्री दिनेश जी के पिता श्री केशरी चाँद जी धूपिया अत्यन्त धार्मिक व्यक्ति एवं जैन धर्म के विद्वान थे। उन्होंने नवपद जी की पूजा का अर्थ लिखा था। उसकी पाण्डुलिपि दिनेश जी के पास है। उस पाण्डुलिपि में कुछ प्राकृत की गाथाओं एवं गुजराती दोहों का अर्थ नही था। इस कारण उस पुस्तक का प्रकाशन नहीं हो रहा था। दिनेश जी की तीव्र इच्छा है की उस पुस्तक का प्रकाशन हो जाए जिससे लोगों को इस पूजा का अर्थ जानने में मदद मिल सके। मुझे आशा है की यह पुस्तक जल्दी ही लोगों के हाथ में आ जायेगी।

कलकत्ता प्रवास के दौरान व्यस्तता के कारण मैं यह काम नही कर पाया। अब नवपद जी की ओली प्रारम्भ होने वाली है एवं उसमें मात्र एक सप्ताह का समय वचा है। इस लिए मैंने इस कम को अभी करने का निर्णय लिया। कल मैंने नवपद ओली के संवंध में एक विस्तृत लेख भी लिखा है। मैं दिनेश जी का शुक्र गुजार हूँ की उन्होंने मुझे ऐसा सु अवसर प्रदान किया। दोनों ही कृतियाँ लोगों के काम आ सके इस लिए प्रकाशित किया जा रहा है। इसमें कोई त्रुटी हो तो सुज्ञ जन सुधार करने की कृपा करें।

(सिद्ध पद पूजा)
जाणे पिण सके कही पुर गुण,
प्राकृत तिम गुण जास
ओपमा विण नाणी भवमाहें,
ते सिद्ध दियो उल्लास

अरिहंत परमात्मा सिद्ध भगवान के सभी गुणों को अपने केवल ज्ञान से जानते हैं परन्तु जगत में उस लायक कोई उपमा नही होने के कारण कह नही सकते। जैसे कोई आदिवासी व्यक्ति जो सदा जंगल में ही रहता हो और एक वर किसी नगर में आ जाए तो नगर के वैभव को देख लेता है। वह नगर की समृद्धि को जनता तो है परन्तु अन्य वनवासियों को वहां वता नही सकता क्योंकि जंगल में नगर की शोभा की उपमा देने लायक कोई वस्तु नही होती।

(आचार्य पद पूजा)
नमूं सुरिराजा सदा तत्त्व ताजा ,
जिनेंद्रागमें प्रौढ़ साम्राज्य भाजा
षट वर्ग वर्गित गुणे शोभमाना
पंचाचारने पालवे सावधाना

मैं सूरी अर्थात आचार्य भगवंत को नमस्कार करता हूँ जो की जिन शासन में राजा के समान हैं। सदा स्वाध्याय करने के कारण तत्वों से ताज़ा हैं। जिनेन्द्र भगवान के आगमों के प्रौढ़ व निष्णात हैं एवं शासन साम्राज्य को भली भांति संभालते हैं। छः का वर्ग अर्थात छत्तीस गुणों से शोभायमाण हैं एवं पाँच आचारों को सावधानी पूर्वक पालन करते हैं।

ध्याता आचारज भला,
महामंत्र शुभ ध्यानी रे
पञ्च प्रस्थाने आतमा
आचारज होए प्राणी रे

आचार्य भगवंत महामंत्र अर्थात सूरी मंत्र के ध्यानी होते हैं। श्रावकों के लिए नवकार, मुनिओं के लिए वर्धमान विद्या, एवं आचार्यों के लिए सूरी मंत्र महामंत्र होता है। एवं अपनी अपनी भूमिका के अनुसार वो उसकी साधना करते हैं। सूरी मंत्र में पञ्च प्रस्थान होते हैं जो की पञ्च परमेष्ठी के ही द्योतक हैं। ऐसे पञ्च प्रस्थान में रहने वाली आत्मा ही आचार्य होती है।
(उपाध्याय पद पूजा)
सुत्तत्थ वित्थारण तप्पराणं
णमो णमो वायग कुंजराणं
गणस्स संधारण सायराणं
सव्वप्प्णा वज्जिय मच्छराणं

सूत्र व अर्थ के विस्तार में तत्पर रहने वाले वाचक अर्थात उपाध्याय रूपी कुंजर अर्थात हाथी को वारंवार नमस्कार
हो। गणों को धारण करने में सागर के समान एवं सभी प्रकार की मत्सरता अर्थात इर्ष्या से दूर ऐसे उपाध्याय भगवंत हैं।

(साधू पद पूजा)
साहूण संसाहिय संजमाणम
नमो नमो शुद्ध दया दमाणं
तिगुत्ति गुत्ताण समाहियाणं
मुणिण माणंद पयट्ठियाणं

जिन्होंने संयम को अच्छी तरह से साध लिया है, जो शुद्ध दया एवं दमन से युक्त हैं उन साधुओं को वारंवार नमस्कार हो। जो तीनों गुप्तियों से गुप्त व समाधिस्थ हैं ऐसे मुनि आनंद में प्रतिष्ठित हैं।

(सम्यग दर्शन पद पूजा)
जिनुत्त तत्ते रुई लक्खणस्स
नमो नमो निम्मल दंसणस्स
मिच्छत्त नासाई समुग्गमस्स
मुलस्स सद्धम्म महा दुमस्स

जिनेश्वर देव कथित तत्व में रूचि जिसका लक्षण है ऐसे निर्मल संयाग दर्शन को वारंवार नमस्कार हो। मिथ्यात्व के नाश से जिसका उद्गम होता है ऐसा सम्यग दर्शन सत धर्म रूप महा वृक्ष का मूल है।

(सम्यग ज्ञान पद पूजा)
अण्णाण सम्मोह तमो हरस्स
णमो णमो णाण दिवायरस्स
पंच्प्पयारस्सुवगारगस्स
सत्ताण सव्वत्थ पयासगस्स

अज्ञान एवं सम्मोह रूप अन्धकार को हरण करने वाले ज्ञान रुपी दिवाकर अर्थात सूर्य को वारंवार नमस्कार हो। यहाँ ज्ञान पञ्च प्रकार का है एवं उपकार करने वाला है एवं सभी पदार्थ की सत्ता को प्रकाशित करनेवाला है।

(सम्यग चरित्र पद पूजा)

आराहियाखंडीय सक्कियस्स
णमो णमो संजम विरियस्स
सब्भावणा संग विवट्टियस्स
निव्वाण द्नाणाइ समुज्जयस्स

सत्क्रियायों के द्वारा जिसकी अखंडित आराधना की गई है ऐसे संयम में वीर्य अर्थात पुरुषार्थ को वारंवार नमस्कार हो। यह सद्भावनाओं के साथ विवर्तित होता है एवं निर्वाण देने में समुद्यत है।

लेख पढने के लिए इस पर क्लिक करें:

Festival of India: Navpad Oli in Jainism


ज्योति कोठारी


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Thursday, September 17, 2009

Jain festival Navpad Oli starts from September 26

Navpad Oli, a Jain festival will be starting from September 26 this year 2009. The Navapad is also referred as Siddhachakra. Jain community worship Navapad by performing nine Ayambil in nine days between Shukla Saptami and Purnima of lunar month Ashwina. The Navpad Oli is also observed in Chaitra.

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Festival of India: Navpad Oli in Jainism

नवपद पूजा के कुछ दोहों का अर्थ

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Monday, September 14, 2009

Architecture of Jain temples: Some relevant issues


Jain temples are built from time immemorial. However, there was no fix architecture or Vaastu for the same. It had been changing according to time and place. It was also changed according to wish and capabilities of the builders. 

Most of the Jain temples we see today are built within 1000 years. Jain temples older than that period are not  generally visible. Different types of Jain temples were built at the time of Lord Mahavira. Some of them were cave temples. A cave temple yet exists at Rajgir and perhaps this is the oldest existing Jain temple. Unfortunately, this is not being  treated and worshiped as Jain temple. It is in the Swarna Bhandar of Rajgir and an inscription in Brahmi script clearly depict it as Jain temple. The inscription also mentions the name of the inscriber Acharya Bhagwant. The cave temple is almost contemporary to Lord Mahavira.

Emperor  Samprati, Grandson of  Ashoka the Great, (2200 years back) built a huge number of Jain temples and Jain idols. A Large number of Jain idols are even found in these days but no temple.

Paramarhat Maharaja Kumarpal, King of Gujrat, built a large number of Jain temples (Before 1000 years) after Emperor Samprati. Rashtrakut Pratihar school of architecture for building temples had been developed by that time. Famous Somnath temple is an explicit example of that school. Maharaja Kumarpal built Jain temples with the architecture of his time. Actually, he built Jain temples in such a large number that the school of architecture became a symbol of Jain temple art in Gujrat.

 Most of the Jain temples built with the same architecture after Kumarpal. Some parts of present days Rajasthan was in Gujrat at that time. The same architecture was also famous in those areas. Renowned personalities like Vastupal and Tejpal also built Jain temples of Mt. Abu with the same architecture.

However, it does not mean that all the Jain temples at every place were built with the same architecture at that time. Jain temples in Malwa were built in different style at that time. Famous Suparswanath Temple of Mandavgadh, that was converted into a mosque forcefully by the Muslims, was the best example of different architecture.

Jain temples in other parts of Rajasthan such as Bikaner and Jaipur were built in different style and architecture. Jain temples of Delhi, Madhya Pradesh, Uttar Pradesh, Bihar, Bengal, and Orissa were also built in different style. Old Jain temples of pilgrims like Sammet Shikhar, Pawapuri, Kshatriyakund Parasnath Glass temple of Kolkata are examples of the same. Temples in Chandni Chowk, Delhi; Temples of Varanasi and Lucknow, Azimganj and Jiaganj, Mahimapur (Kasauti temple), and Kolkata also represents the Eastern India style. and world famous

Some people with ignorance or vested interested had been campaigning wrongly against these types of temples. This is going on since last 30 - 40 years. It is being told that temples other than Rashtrakut Pratihar school architecture are improper (Avidhi) and not according to Jain Vastu. But the campaign is completely baseless. It is clearly with vested interested and malafied intention. Frankly speaking, there is no fix architecture of Jain temples since ancient times.

Sompuras (Present days architects of Jain temples) are dominant nowadays. They are not Jains. They design Jain temples according to the architecture of Somnath (Shiva temple) temple in Gujrat. The astonishing fact is that many of the Jain Acharyas, monks and nuns are supporting them.  They are wrongly speaking that the Jain temples built by the Sompuras are only with the right architecture.

It is regrettable that many old Jain temples are destroyed intentionally in the name of Vidhi and reconstructed with the advice of Sompuras. Sometimes it is done to satisfy egos of those so called Jain Acharyas, monks, and nuns. 

Are they doing Dharma by destroying and dismantling  unnecessarily and reconstructing old Jain temples just to  inscribe their names on those temples? Renowned Jain temple of Jeerawala Parshwanath, the famous pilgrim in Rajasthan, is detrimental  and is being reconstructed with expenses of crores of rupees. There are many other examples.

Gujrat and Gujaratis are dominant in Jain society since past few decades.  most of the monks and nuns are also from there. Hence, it is natural for them to think Gujrat architecture the right one. It is also one of the reasons of destroying and dismantling old Jain temples.

Raga-Dwesha of Gachchha is also involved in the matter. Most of the Acharyas, monks and nuns from Gujrat are of Tapagachchh.  Whereas, Khartar Gachchh and some other gachchhas were dominant in other parts of the country. Most of the temples in those places are pratisthit by ancient Acharyas of Khartar Gachchha, Vijay Gachchha, Paychanna Gachchha, Lonka gachchha etc. Hence, those temples are being dismantled and new temples are built. Pratishtha of most of those new temples is done by Acharyas of Tapagachchha. Historical evidence of other Gachchhas is destroyed in this way.

Doing such things has become a fashion nowadays. Even monks and nuns of Khartargachchha have qued before them. They are becoming instrumental in destroying temples and Dadabadis installed by their own ancestor Acharyas. A Jain temple is dismantled in Mundra, Cutch, by a Khartargachchha Jain monk. It is being told that the temple had ben shaken in earthquake to justify the work.

So called Vidhikarak and Sompura also support these for their own interests. Jain Shravakas and Shravikas also join them either because of their ignorance or devotion to monks and nuns. Sometimes rich Shravakas also join hands to satisfy their own ego.

We should think logically and judiciously before becoming part of it. It is advisable to be cautious. Otherwise, we will not only misuse public funds (Devadravya) of billions but also involved in the sinful act of destroying our own old culture.

जैन धर्म की मूल भावना भाग 1
जैन धर्म की मूल भावना भाग 2
जैन धर्म की मूल भावना भाग 3
जिन मंदिर एवं वास्तु

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Wednesday, September 9, 2009

जिन मन्दिर एवं वास्तु

प्राचीन काल से जिन मन्दिर का कोई निर्दिष्ट वास्तु नही होता था युग के अनुसार उसमे परिवर्तन होता रहता था। साथ ही अलग अलग क्षेत्र में अलग अलग प्रकार से मंदिरों का निर्माण होता था। मन्दिर निर्माण कराने वाले की भावना एवं सामर्थ्य के अनुसार भी उसमे परिवर्तन होता था।

आज जो भी जिन मन्दिर देखने में आता है उनमे से अधिकांश १००० वर्ष के अन्दर बने हुए हैं। उससे प्राचीन जिन मन्दिर प्रायः देखने में नही आता है। भागवान महावीर के समय विभिन्न प्रकार के जिन मन्दिर बनते थे। जिनमे कुछ गुफा मन्दिर भी थे। ऐसा ही एक गुफा मन्दिर राजगीर के स्वर्ण भंडार में भी है एवं संभवतः यह सबसे प्राचीन जिन मन्दिर हैपरन्तु आज इसे जिन मन्दिर नही मन जा रहा है, यह दुर्भाग्य का विषय है स्वर्ण भंडार के जिन मन्दिर होने का प्रमाण उसमे प्राचीन ब्राह्मी लिपि में लिखे गए शिलालेख से स्पष्ट रूप से मिलता है। उस लेख में प्रतिष्ठाता आचार्य का नाम भी है। यह मन्दिर लगभग भगवान महावीर के समय का है।

महाराजा सम्प्रति (लगभग २२०० वर्ष पूर्व) ने बहुत बड़ी संख्या में जिन मन्दिर बनवाई थी एवं जिन बिम्बों की प्रतिष्ठा भी करवाई थी परन्तु उनके समय के मन्दिर आज नही मिलते यद्यपि बड़ी संख्या में प्रतिमाएँ आज भी मौजूद है।

महाराजा सम्प्रति के वाद गुजरात के महाराजा परम आर्हत कुमारपाल ने अनेकों जिन मन्दिर की प्रतिस्थाएं करवाई। उस समय गुजरात में मन्दिर निर्माण की  राष्ट्रकूट प्रतिहार शैली विकसित हो चुकी थी। प्रसिद्द सोमनाथ का मन्दिर उसी शैली में बना हुआ है। महाराजा कुमारपाल ने अपने समय की प्रसिद्द शैली में ही जिन मंदिरों का निर्माण करवाया। उन्होंने इतनी अधिक संख्या में मंदिरों का निर्माण करवाया की कालक्रम से गुजरात में वही शैली रुढ़ हो गई। बाद में जिन लोगों ने भी गुजरात में जिन मंदिरों का निर्माण करवाया अधिकांशतः उसी शैली में करवाया। वर्त्तमान राजस्थान का कुछ हिस्सा भी उस समय गुजरात राज्य में ही था। उन अंचलों में भी वही शैली प्रसिद्द रही एवं वस्तुपाल तेजपाल जैसे युगपुरुषों ने आबू एवं अन्य स्थानों पर उसी शैली में मंदिरों का निर्माण करवाया। परन्तु इसका अर्थ ये नही था की उन दिनों सभी स्थानों पर वैसे ही मन्दिर बनते थे उस युग में भी मालव प्रदेश के अन्दर अन्य शैली में जिन मन्दिर बनते थे। मांडव गढ़ का प्रसिद्द मन्दिर, जिसे बाद में मुस्लिम आक्रान्ताओं ने तोड़ कर मस्जिद में बदल दिया, इस बात का श्रेष्ठ उदहारण है।

राजस्थान के अन्य हिस्सों के साथ दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि में भिन्न प्रकार के मन्दिर बनते थे। सम्मेत शिखर, पावापुरी, क्षत्रियाकुंद अदि तीर्थ स्थानों के प्राचीन मन्दिर, कलकत्ता का विश्व प्रसिद्द पारसनाथ मन्दिर व अन्य प्राचीन मन्दिर, दिल्ली चांदनी चौक के मन्दिर, लखनऊ के मन्दिर, अजीमगंज जियागंज के मन्दिर माहिमापुर का कसौटी मन्दिर इस श्रेणी के उत्कृष्ट उदहारण हैराजस्थान के बीकानेर एवं जयपुर के अनेकों मन्दिर भी इसी श्रेणी में आते है।

इन दिनों  राष्ट्रकूट प्रतिहार शैली (गुजरात में प्रसिद्द) से भिन्न मंदिरों को नकारे जाने का प्रचलन हुआ है ऐसा कह कर भ्रान्ति फैलाई जा रही है की ये मन्दिर विधि पूर्वक बने हुए नही है तथा ये जैन वास्तु के अनुरूप नही हैपरन्तु यह बात पुरी तरह से ग़लत है वस्तुतः जैन मंदिरों का कोई एक ही प्रकार का स्वरुप नही होता था न होता है।
आज मन्दिर निर्माण में सोमपुराओं का वर्चस्व है। ये सोमपुरा जैन नही हैये लोग सोमनाथ मन्दिर (शिव मन्दिर) के शिल्प के अनुसार जिन मंदिरों का निर्माण करवाते हैआश्चर्य का विषय है की पूज्य आचार्य भगवन्तो एवं साधू साध्वी गण भी इन्हिके द्वारा बनाये गए मंदिरों को सही ठहराने लगे हैं।

दुःख तो तब होता है जब विधि से बनवाने के नाम पर अनेकों प्राचीन मंदिरों को मिटटी में मिला दिया जाता है एवं उसके स्थान पर  राष्ट्रकूट प्रतिहार शैली के मन्दिर बनवा दिए जाते हैं। कई बार यह काम तथाकथित आचार्यों के अहम् को संतुष्ट करने के लिए भी किया जाता है। प्राचीन मंदिरों को अनावश्यक रूप से तुड़वा कर उसके स्थान पर नया मन्दिर बनवा कर उस में अपने नाम का लेख लिखवा कर क्या ये लोग धर्म का काम कर रहे हैं


बिगत कुछ दसकों से जैन धर्म में गुजरतीओं का वर्चस्व बढ़ा है। अधिकांश आचार्य, साधू, साध्वी भी वहीँ से हैं। अतः गुजरती शैली को ही वे ठीक मानते हैंइस कारण भी अन्य शैलियों  के मंदिरों को तोडा जा रहा है

इस प्रकरण में गच्छ का राग-द्वेष भी सम्मिलित हो गया है। गुजरात में अधिकांश आचार्य aadi  तपागच्छ से हैं जबकि गुजरात के बाहर अन्य स्थानों पर खरतर गच्छ एवं अन्य गच्छों का भी वर्चस्व रहा है। उन स्थानों पर निर्मित अधिकांश मन्दिर खरतर गच्छ, पायचन्न गच्छ, विजय गच्छ आदि के आचार्यो द्वारा प्रतिष्ठित है। ऐसी स्थिति में उन्हें ग़लत बता कर नए मन्दिर का निर्माण करवाया जाता है। इन नव निर्मित मंदिरों की प्रतिष्ठा प्रायः तपागच्छ के आचार्यों के हाथों से ही होती है। इस तरह पूर्व के अन्य गच्छों के ऐतिहासिक साक्ष्यों को मिटा दिया जाता है।

अब तो ये प्रचालन इतना अदिक बढ़ गया है की खरतर गच्छ के अनेक साधू साध्वी भी उनका अनुसरण कर अपने ही पूर्वज आचार्यों द्वारा प्रतिष्ठापित मंदिरों को अविधि से निर्मित कह कर उन्हें तुड़वा रहे हैं। कुच्छा के मुंद्रा में इसी प्रकार एक प्राचीन मंदिर को तुड़वा कर खरतर गच्छ के एक साधू द्वारा नव निर्माण करवाया जा रहा है.  यह कहा जा रहा है की भूकंप के कारन हिल जाने से मंदिर दोषपूर्ण हो गया है.

तथाकथित विधि कारक एवं सोमपुरा भी इनका साथ देते हैं। श्रावक गण भी अपनी अज्ञानता के कारण अथवा साधू साध्विओं के प्रति भक्ति के कारण इस में सम्मिलित हो जाते हैं।

अज हमें इस विषय में सावधान होना चाहिए एवं विवेक पूर्वक इस विषय पर विचार करना चाहिए। अन्यथा हम सिर्फ़ करोड़ों रुपये का दुरूपयोग करेंगे वल्कि अपनी प्राचीन संस्कृति को नष्ट करने के पाप के भागी भी होंगे


जैन धर्म की मूल भावना भाग 1
जैन धर्म की मूल भावना भाग 2
जैन धर्म की मूल भावना भाग 3
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Tuesday, September 8, 2009

Temple art of India: Jain Temples Video

Temple art of India part 1:



Temple art of India part 2:



Temple art of India part 3:




Temple art of India part 4:








Jain Bhajans by Anup Jalota

जैन धर्म की मूल भावना भाग 1
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जैन धर्म की मूल भावना भाग 3
जिन मंदिर एवं वास्तु

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Jain Bhajans by Anup Jalota: Videos

Anup Jalota Bhajan Part 1 :



Anup Jalota Bhajan Part 2 :


Anup Jalota Bhajan Part 3 :




Anup Jalota Bhajan Part 4 :





Temple art of India: Jain Temples

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Sunday, September 6, 2009

जैन धर्म की मूल भावना भाग २

आज प्रायः यह देखा जा रहा है की पुज्य साधू साध्वी भगवंत भी भगवान् महावीर के त्याग मार्ग को छोड़ कर सांसारिक आडम्बरों में फंसते जा रहे हैं। परमात्म भक्ति के नाम पर अधिकांश जगह महापुजनों का आडम्बर देखा जा रहा है। पूज्य साधू साध्वी भगवंत भी इन्हे प्रोत्साहित करते हैं। इन पूजाओं में प्रायः कर के अरिहंत परमात्मा के स्थान पर देवी देवताओं को महत्व दिया जाता है। यदि परमात्मा की पूजा इनमे होती भी है तो मात्र नाम के लिए। तथाकथित भक्त गण भी अधिकांशतः भौतिक सुख सांसारिक कामनाओं के लिए इन पूजाओं में सम्मिलित होते हैं।

इसी तरह आज अनेकों साधू साध्वी गणों के अपने अपने प्रोजेक्ट हैं जिन्हें पुरा करने में ही उनकी दिलचस्पी रहती है। उन प्रोजेक्टों के निर्माण, संचालन आदि में उनका बहुत समय चला जाता है। वे उपदेशक के स्थान पर संचालक बनते जा रहे हैं। प्रायः उन प्रोजेक्ट्स के ट्रस्टी गण उन के पसंदीदा लोग होते हैं एवं निरंतर उनके संपर्क में रहते हैं। साधू साध्वी गण धन संग्रह के लिए भक्त जानो को सिर्फ़ प्रेरित ही नहीं करते अपितु अनेक समय उन पर दबाव भी डालते हैं। धन का इस्तेमाल भी उन साधू साध्विओं की इच्छा एवं आदेश के अनुसार होता है। जैन धर्म के अनुसार साधू साध्विओं का व्रत तीन करण तीन योग से होता है। अर्थात वे न तो मन वचन काया से कोई सांसारिक कार्य करते हैं न कराते हैं और न ही उसका अनुमोदन करते हैं। परन्तु उपरोक्त कृत्य में सांसारिक कार्य कराना ही पड़ता है। इस प्रकार स्पष्ट रूप से व्रत का भंग होता है

मेरा सभी सुज्ञ जनों से निवेदन है की इस विषय पर विचार कर जिन आज्ञा अनुसार प्रवृत्ति करने पर वाल दें।
धन्यवाद
 जैन धर्म की मूल भावना भाग 1
जैन धर्म की मूल भावना भाग 2
जैन धर्म की मूल भावना भाग 3
जिन मंदिर एवं वास्तु

प्रस्तुति:
ज्योति कोठारी

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