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Monday, January 23, 2017

150 years celebration of Mahavira Swami temple, Kolkata

150 years celebration of Mahavira Swami temple, Kolkata

Mahavira Swami Shwetambar Jain temple is one of the oldest Jain temples in Kolkata, built by Sri Sukhlal Johri in the year 1868. There will be a year-long celebration of 150th year of the temple commencing from Monday, February 6, 2017.


There will be "Sri Mahavira Swami Mahapujan" on the establishment day, i.e Magh Shukla Dasami that falls this year on February 6. Dhwajarohan (Flag hoisting) will take place during the Mahapoojan followed by a Sadharmi Vatsalya (Lunch).

Samavasaran at Mahavira Swami temple, Kolkata

Wall painting at Mahavira Swami temple, Kolkata
The program will be organized under the auspices of Sadhvi Sri Sanyampurna Sri Ji, Chandanbala Sri Ji et al. Jyoti Kothari, Jaipur has planned and organized the Mahapoojan that is to occur first time ever. This is a distinguished Mahapoojan derived from the old Jain canons such as Sutrakritang, Samavayang, Upasagdasang and Dashashrutskandh. Sri Yashwant Golechha, Jaipur will perform all rituals.

Srimati Putul Kothari and Sri Pradip-Kuldip Mahamwal family will sponsor the whole program. This is worth mention that this is the first program of the year-long celebrations. You will be informed of about the next program in due course.

All of you are cordially invited to the celebration with your family and friends.

 श्री महावीर स्वामी मन्दिर, कोलकाता का सार्द्ध शताब्दी महोत्सव


क्या है महावीर स्वामी महापूजन?


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Thursday, January 12, 2017

क्या है महावीर स्वामी महापूजन?

क्या है महावीर स्वामी महापूजन?

क्या है महावीर स्वामी महापूजन? यह प्रश्न मुझे कई लोग पूछ रहे हैं. अभी कुछ दिन पूर्व ही मैंने इस जैन एंड जैनिज़्म ब्लॉग में लिखा था की कोलकाता के महावीर स्वामी मंदिर के १५० वर्ष प्रारम्भ होने के उपलक्ष्य में ६ फरबरी, २०१७ को श्री महावीर स्वामी महापूजन पढ़ाई जाएगी। यह पूजा विश्व में पहली बार होने जा रही है इसलिए इसके बारे में जानने  की इच्छा होना स्वाभाविक ही है. मैंने उस ब्लॉग पोस्ट में यह भी लिखा था की यह पूजा जैन आगम ग्रन्थ सूयगडांग (सूत्रकृतांग) पर आधारित है.

कोलकाता के महावीर स्वामी मंदिर के १५० वर्ष प्रारम्भ होने के उपलक्ष्य में ६ फरबरी, २०१७ को श्री महावीर स्वामी महापूजन पढ़ाई जाएगी। यह पूजा विश्व में पहली बार होने जा रही है. यह पूजा आगम ग्रन्थ सूयगडांग (सूत्रकृतांग) सूत्र पर आधारित है. अवश्य पधारें. अवसर न चुकें।
महापूजन का एक दृश्य १ 

महापूजन का एक दृश्य 
यह पूजा अत्यंत विशिष्ट कोटि की है अतः श्रद्धालु गणों से निवेदन है की पूरी पूजा में बैठ कर इस का लाभ लें. पूजा में श्लोकों के साथ उसका विवेचन भी किया जाएगा जिससे आगंतुकों को विशेष लाभ होगा। पूजा की विस्तृत जानकारी तो पूजा में आने पर ही होगी लेकिन इसका संक्षिप्त स्वरुप यहाँ बताया जा रहा है.

सूयगडांग (सूत्रकृतांग) सूत्र के प्रथम श्रुतस्कंध के छठे अध्याय में प्रभु महावीर की स्तुति की गई है जिसमे लोगों के पूछे जाने पर गणधर श्री सुधर्मा स्वामी ने भगवान् महावीर के अतिशय युक्त जीवन के सम्वन्ध में बताया है. इन्ही सूत्रों के आधार पर सर्वप्रथम भगवान् महावीर की अष्टप्रकारी पूजा होगी। इसके बाद दशाश्रुतस्कन्ध नाम के आगम के आधार पर भगवान् के कल्याणकों की पूजा होगी. तत्पश्चात भगवान् के अष्ट प्रातिहार्य व अतिशयों की पूजा होगी जिसका आधार सूयगडांग (सूत्रकृतांग) सूत्र के प्रथम श्रुतस्कंध के बारहवें अध्याय "समवशरण"व समवायांग सूत्र (चौथा अंग) होगा।

इसके बाद स्थविरावली (कल्पसूत्र) एवं गणधरवाद (विशेषावश्यक भाष्य) के आधार से ग्यारह गणधरों की व साथ में प्रभु महावीर के चौदह हज़ार साधु व छतीस हज़ार साध्वी भगवंतों की पूजा होगी। तत्पश्चात उपासक दशांग सूत्र में वर्णित दस प्रतिमाधारी श्रावकों की व भगवान् के कुल एक लाख उनसठ हज़ार श्रावकों की व तीन लाख अठारह हज़ार श्राविकाओं की पूजा होगी।

इन सबके अतिरिक्त भगवान् महावीर के माता पिता, शासन देव-देवी, अष्ट मंगल, नवनिधि, नवग्रह, दस दिकपाल आदि का आह्वान पूजन आदि भी विधि विधान से संपन्न होगा। महावीर स्वामी महापूजन के साथ ही शिखर पर ध्वजारोहण भी विधि पूर्वक कराया जायेगा।

जैन आगमों की रूपरेखा एवं इतिहास
श्री महावीर स्वामी मन्दिर, कोलकाता का सार्द्ध शताब्दी महोत्सव

#महावीर #स्वामी #मंदिर #महापूजन #सूत्रकृतांग #सूयगडांग #ध्वजारोहण #कोलकाता






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Saturday, January 7, 2017

जैन आगमों की रूपरेखा एवं इतिहास


जैन धर्म तीर्थंकर भगवन महावीर के उपदेशों पर आधारित है और उनकी गणधरों द्वारा सुत्रवद्ध वाणी एवं  १४/१० पूर्वधरों द्वारा रचित शास्त्र आगम के रूप में जानी जाती है. यह सभी जानते हैं की तीर्थंकर जो उपदेश देते हैं उन्हें गणधर भगवंत संकलित एवं सुत्रवद्ध करते हैं. इन्हें आगम कहा जाता है और यह द्वादशांगी अर्थात बारह (१२) भागों में विभाजित है. इन्हें ही अंग सूत्र कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है की भगवान् महावीर के पंचम गणधर श्री सुधर्मा स्वामी ११ गणधरों में सबसे अंत में मोक्ष गए. उन्होंने अपने प्रमुख शिष्य जम्बू स्वामी को इन बारह अंगों का उपदेश दिया और उन्होंने इसे शिष्य परंपरा से आगे बढ़ाया।  इन १२ अंगों में से १२ वां दृष्टिवाद विलुप्त हो चूका है जिसका एक भाग चौदह (१४) पूर्व के रूप में विख्यात है. इस समय ग्यारह अंग उपलव्ध हैं.

जैन आगमों का अवलोकन करते हुए विदेशी विद्वान् 
यह ग्यारह अंग निम्न प्रकार हैं
१. आचारांग २. सूत्रकृतांग ३. स्थानांग ४. समवायांग ५. भगवती (व्याख्या प्रज्ञप्ति) ६. ज्ञाताधर्मकथा ७. उपासक दसांग ८. अंतकृत दसांग ९. प्रश्नव्याकरण १०. अनुत्तरोपपातिक ११.  विपाक

गणधर कृत एवं वर्त्तमान में उपलव्ध ११ अंगों के अलावा चौदह एवं दस पूर्वधर आचार्यों द्वारा लिखित सूत्र भी आगम माना जाता है. चौदह एवं दस पूर्वधर आचार्यों द्वारा लिखित या संकलित बारह उपांग, छह छेद, दस प्रकीर्णक, चार मूलसूत्र, अनुयोगद्वार और नंदी सूत्र इस प्रकार चउतीस और मिला कर कुल पैतालीस आगम वर्त्तमान में पाए जाते हैं.

भगवान् महावीर स्वामी के समय ये सभी सूत्र लिखे नहीं जाते थे और गुरु परंपरा से शिष्य इन्हें श्रुत रूप में प्राप्त करते थे. इसलिए इन आगमों के ज्ञान को श्रुत ज्ञान भी कहा जाता है।  कालक्रम से स्मृति शक्ति कमजोर होने पर इन्हें याद रखना कठिन हो गया तब भगवान् महावीर के निर्वाण के ९८० वर्ष बाद देवर्धिगणी क्षमाश्रमण ने इन्हें संकलित कर लिपिवद्ध करवाया तब से आगमों को लिखने की परंपरा प्रारम्भ हुई.

इन आगमों पर परवर्ती आचार्यों एवं विद्वान् मुनियों ने निर्युक्ति, चूर्णी, भाष्य एवं टीकाएँ लिखी। इन के माध्यम से उन्होंने आगमों के अर्थ को समझाया एवं उस पर विस्तृत विवेचन किया। मूल आगम, निर्युक्ति, चूर्णी, भाष्य एवं टीका (कुल पांच) मिलकर पंचांगी बनती है और इस पंचांगों को जैनागम कहा जाता है. मूर्तिपूजक परंपरा पैतालीस आगमों की पंचांगों को स्वीकार करती है जबकि स्थानकवासी एवं तेरापंथी परंपरा इनमे से ३२ आगमों को हिमान्याता देती है. स्वाभाविक रूप से जिन आगमों में मूर्तिपूजा का उल्लेख है उन्हें यह परंपराएं (मूर्ति एवं मंदिर का निषेध करने के कारण) मान्य नहीं करती।

वर्तमान में उपलव्ध सभी जैन शास्त्रों का आधार इन्ही ४५ आगमों को माना जाता है. भगवान् महावीर के बाद २५०० वर्षों से भी अधिक समय व्यतीत हो चूका है और इस अवधि में पूर्वाचार्यों,  विद्वान् संतों, यतियों, भट्टारकों, यहाँ तक की श्रावकों ने भी विपुल मात्रा में जैन आध्यात्मिक एवं धार्मिक साहित्य का सृजन किया है. ये ग्रन्थ जन- जन का मार्गदर्शन करते हैं एवं उनके ज्ञान में अभिवृद्धि करते हैं.

सूत्रकृतांग एवं अन्य अगम ग्रंथों पर आधारित महावीर स्वामी महापूजन का आयोजन ६ फरबरी, २०१७ को कोलकाता में होने जा रहा है. जानने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें


श्री महावीर स्वामी मन्दिर, कोलकाता का सार्द्ध शताब्दी महोत्सव


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Jain and Jainism,  Jain Agam, Jain Canon,
जैन आगमों की रूपरेखा एवं इतिहास
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Thursday, January 5, 2017

श्रीपूज्य श्री जिन विजयेंद्र सूरी जन्म शताब्दी


श्रीपूज्य श्री जिन विजयेंद्र सूरी जी बीकानेर गद्दी के श्रीपूज्यों की परंपरा के महान संत थे. उनका सरल स्वभाव, उज्वल चरित्र एवं सर्वोपरि जिन धर्म के प्रति उनकी निष्ठां अतुलनीय थी. खरतर गच्छ में श्रीपूज्यों की कई गद्दियां थी जिनमे से बीकानेर, जयपुर एवं लखनऊ की गद्दिया विशेष रूप से प्रसिद्द थी. इन सबमे भी बीकानेर की गद्दी का सबसे महत्वपूर स्थान था एवं इनके अनुयायी भारत में दूर दूर तक फैले हुए थे.


Bada Upashray Bikaner Rangdi chowk vijayendra suri
बीकानेर बड़ा उपाश्रय में पूजा का एक दृश्य १ 
sripujya jin vijayendra suri bada upashray bikaner
बीकानेर बड़ा उपाश्रय में पूजा का एक दृश्य २ 


बीकानेर के रांगड़ी चौक स्थित बड़ा उपाश्रय इसका मुख्य स्थल था जहाँ पर श्रीपूज्य जी के अतिरिक्त अनेक यतिगण निवास करते थे. उस समय के यतिगण जैन शास्त्रों के अतिरिक्त विधि-विधान, ज्योतिष, मन्त्र, चिकित्सा आदि के भी ज्ञाता होते थे. समाज में इनकी काफी उपयोगिता थी और ये जान साधारण के संकट मोचक के रूप में माने जाते थे. इन लोगों ने विभिन्न विषयों पर बड़े पैमाने पर साहित्य की भी रचना की है. इन सभी यतियों के सिरमौर श्रीपुज्य जी हुआ करते थे और श्रीपूज्य श्री जिन विजयेन्द्र सूरी उन्ही में से एक महत्वपूर्ण श्रीपूज्य जी थे.

Jain Sripujya Sri Jin Vijayendra Suri of Bikaner
श्रीपूज्य जी श्री जिन विजयेंद्र सूरी जी महाराज १ 
 तत्कालीन श्री पूज्य श्री जिन चारित्र सूरी के के देवलोकगमन के पश्चात् जयपुर के विद्वान् यति श्री श्यामलाल जी के आबाल ब्रह्मचारी शिष्य यति श्री विजयलाल जी सुयोग्य जान कर उन्हें बीकानेर की बड़ी गद्दी का श्रीपुज्य बनाने का निश्चय हुआ. श्रीपूज्य बनने के बाद अपनी योग्यता, विद्वत्ता, साधना एवं सरल व परोपकारी स्वभाव से जिन शासन की जबरदस्त सेवा की.

Jain Sripujya Sri Jin Vijayendra Suri of Bikaner
श्रीपूज्य जी श्री जिन विजयेंद्र सूरी जी महाराज २ 
 आपका जन्म आज से सौ वर्ष पूर्व हुआ था और यह उनका जन्म शताब्दी वर्ष है. उल्लेखनीय है की आपकी दीक्षा दादा श्री जिन कुशल सूरी की प्रत्यक्ष दर्शन स्थली मालपुरा में ही हुआ था. वे अत्यंत दयालु प्रवृत्ति के होने के कारण भक्तों के कष्ट हरण में भी तत्पर रहते थे और उनकी विशिष्ट साधना चमत्कार का पर्याय बन गई थी। यहाँ तक की उनके आशीर्वाद से उनके छड़ीदार गोपाल ने दादागुरु के लिए जो लिखा वह गुरु इकतीसा के नाम से जगत प्रसिद्द हो गया. आज भी श्री जिन विजयेंद्र सूरी के छड़ीदार गोपाल की रचना गुरु इकतीसा भक्तों के कंठ में बसी है और भक्त गन उसे मनोवांछित पूरक और संकटमोचक मानते हैं.
Jain Sripujya Sri Jin Vijayendra Suri at Azimganj Kothari family
श्रीपूज्य जी श्री जिन विजयेंद्र सूरी जी महाराज अजीमगंज में  
बीकानेर के बाद अजीमगंज की गद्दी दूसरे स्थान में मानी जाती थी और वो भी उनकी कर्मभूमि रही. वहां पर भी उन्होंने कई चौमासे किये और उसे भी अपनी तपोभूमि बनाई। अजीमगंज के बड़ी पौषाल में होनेवाले उनके प्रवचन में केवल जैन ही नहीं अपितु बड़ी संख्या में अजैन भी उपस्थित होते थे.  उस समय यद्यपि मेरा जन्म नहीं हुआ था परंतु हमारा परिवार भी आपके घनिष्ठ संपर्क में रहता था.

खरतर गच्छ की अपनी परंपरा से बंधे होने एवं इस गुरुतर दायित्व का निर्वहन करते हुए भी वे किसी मत-पंथ के आग्रही नहीं थे. उनका उदार चरित्र तो केवल जिन शासन की सेवा में ही रत था. अजीमगंज के प्रख्यात चित्रकार श्री इंद्र दुगड़ ने श्री जिन विजयेंद्र सूरी का जो रेखाचित्र बनाया है उसके नीचे लिखी दो पंक्तियाँ इस भाव को सुन्दर रूप से दरसाती है.

"समकित व्रत को निर्मल कर लो, मारने से मत घबराओ.
व्यर्थ पंथ, मत, वाद आदि में अपना मन मत भरमाओ".

सं १९६३ में मात्र ४७ वर्ष की अल्पायु में देवलोकगमन से पूर्व ही आपने जिन शासन की सेवा के इतने काम किये की उसका वर्णन करना मुश्किल है. जैन शासन के इस जाज्वल्यमान नक्षत्र को वंदन करते हुए हम भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.
श्री महावीर स्वामी मन्दिर, कोलकाता का सार्द्ध शताब्दी महोत्सव

Thanks,
Jyoti Kothari
(Jyoti Kothari, Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur represents Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is adviser, Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also ISO 9000 professional)

#श्रीपूज्य #विजयेंद्रसूरी #जन्मशताब्दी, #बीकानेर, #मालपुरा, #दादागुरु #इकतीसा, #अजीमगंज
Jin Vijayendra Suri, Bikaner, Khartar Gachchh, Sripoojya, Centenary, Jain Jainism  
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Tuesday, January 3, 2017

श्री महावीर स्वामी मन्दिर, कोलकाता का सार्द्ध शताब्दी महोत्सव


श्री महावीर स्वामी जैन मन्दिर, कोलकाता की प्रतिष्ठा ईश्वी सन १८६८ में हुई और इस साल २०१७ में यह अपनी प्रतिष्ठा के डेढ़ सौवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है. मंदिर के ट्रूस्टीयों ने एक वर्षव्यापी सार्द्ध शताब्दी महोत्सव मनाने का निर्णय किया है. श्री महावीर स्वामी मन्दिर, कोलकाता की प्रतिष्ठा तिथी माघ शुक्ल दशमी तदनुसार अंग्रेजी तारिख ६ फरबरी, २०१७ सोमवार से कार्यक्रम प्रारम्भ होगा। उल्लेखनीय तथ्य ये है की श्री सुखलाल जी जौहरी ने इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया था।

mahaveer swami mahapoojan mahavira swami temple kolkata
महावीर स्वामी महापूजन 
इस उपलक्ष्य में प्रातः साढ़े आठ बजे से श्री महावीर स्वामी महापूजन पढ़ाई जाएगी एवं विजय मुहूर्त में ध्वजारोहण होगा। जैन आगमों में प्रमुख स्थान रखनेवाले दूसरे अंग सुयगडांग सूत्र पर आधारित यह पूजा विश्व में पहली बार पढाई जाएगी। इस महापूजन में अन्य आगम ग्रंथों का भी आधार लिया गया है. इस प्रकार यह एक विशिष्ट कोटि की पूजा होगी।

Main deity Mulnayak sri mahaveera swami at kolkata
मूलनायक श्री महावीर स्वामी, कोलकाता 
इस पूजन की परिकल्पना एवं संयोजन श्री ज्योति कोठारी कर रहे हैं एवं अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विधिकारक श्री यशवंत गोलेच्छा, जयपुर सम्पूर्ण विधि विधान संपन्न करवाएंगे. श्रीमती पुतुल कुमारी, वीरेंद्र, प्रदीप, राजकुमार, राजेश, चेतन, कीर्ति, धरणेन्द्र, दीपक कोठारी परिवार एवं श्री प्रदीप कुमार कुलदीप कुमार महमवाल परिवार की और से यह सम्पूर्ण कार्यक्रम आयोजित होगा. प् पू स्व प्रवर्तिनी श्री चंद्रप्रभा श्री जी म सा की सुशिष्या श्री संयमपूर्ण श्री जी, श्री चंदनबाला श्री जी आदि ठाणा के पावन सान्निध्य में यह महापूजन पढ़ाया जायेगा।

६ फरबरी को वर्षव्यापी महोत्सव का शुभारम्भ होगा और अगले वर्ष पूर्णाहुति तक समय समय पर अन्य आयोजन होते रहेंगे। मंदिर के १५० वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में पिछले २ वर्षों से मंदिर के जीर्णोद्धार एवं साज-सज्जा का काम जोरों से चल रहा है. खासकर उत्तुंग शिखर के जोर्णोद्धार एवं रंगमंडप को सुसज्जित किया जा रहा है. उपरोक्त कार्यक्रम में आप सभी सपरिवार आमंत्रित हैं.

महावीर स्वामी का यह प्राचीन मंदिर कोल्कता के मानिकतल्ला अंचल में २७, बद्रीदास टेम्पल स्ट्रीट में स्थित है, और कोल्कता हवाई अड्डे से करीब १२ किलोमीटर, हावड़ा स्टेसन से ७, सियालदह से ५ एवं कोलकाता रेल स्टेसन से २ किलोमीटर की दुरी पर है. यह मंदिर विश्वप्रसिद्ध शीतलनाथ मंदिर, चंदाप्रभु मंदिर एवं दादाबाड़ी से कुछ ही कदमो की दुरी पर है. ठहरने के लिए निकट ही श्री शीतलनाथ भवन में उचित व्यवस्था है.

जैन आगमों की रूपरेखा एवं इतिहास

Mahavira Swami Jain Temple in Kolkata


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Jain and Jainism: 150 years' celebration of Mahavira Swami Jain temple, Kolkata
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Tuesday, December 27, 2016

साधुकीर्ति रचित सत्रह भेदी पूजा का अर्थ


१६वीं सदी के विद्वान् जैन मुनि साधुकीर्ति रचित सत्रह भेदी पूजा जैन साहित्य भंडार का अनमोल रत्न है. यह भक्ति साहित्य का उत्कृष्ट उदहारण है. इसका अर्थ गहन है और इस पूजा के शब्दार्थ एवं भावार्थ को समझना एक कठिन काम है. आज के समय में यह पूजा बहुत कम जगह गाइ जाती है परंतु इसकी उत्कृष्टता के कारण इसका संरक्षण एवं पुनःप्रचालन जैन समाज के लिए लाभकारी है. यहाँ यह भी उलेख करना प्रासंगिक होगा की साधुकीर्ति भी खरतर गच्छ परंपरा के थे जिस गच्छ के श्रीमद देवचंद ने अनेकों उत्कृष्ट भक्ति एवं आध्यात्मिक साहित्य  की रचना की है.

अजीमगंज स्थित श्री नेमिनाथ स्वामी मंदिर 
मेरा बचपन बंगाल प्रान्त के मुर्शिदाबाद जिले के अजीमगंज में बीत और वहां पर यह सत्रह भेदी पूजा बहु प्रचलित है. गुजराती भाषा में इसे સત્તર ભેદી પૂજા  कहते हैं. स्वाभाविक रूप से बचपन से ही यह पूजा सुनते आये हैं. सैंकड़ों बार जिसे भक्ति से गाया हो उसके प्रति अनुराग होना सहज है. इसलिए वर्षों से इच्छा थी की इसका अर्थ किया जाए जिससे लोग इसे समझ सकें और इसका आनंद उठा सकें। परंतु जब ये काम करने लगा तो पता लगा की यह काम सरल नहीं है.

यह पूजा साढ़े चार सौ साल से भी अधिक पुराना है और इतने समय में हिंदी भाषा ने अपना स्वरुप बहुत बदल लिया है, ऐसी स्थिति में शब्दों और पदों का अर्थ करना कठिन हो जाता है. दूसरी कठिनाई ये है की यह रचना बहुभाषी है. इसमें संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश आदि प्राचीन भाषाओँ का बहुतायत से उपयोग हुआ है. साथ ही राजस्थानी, गुजराती, ब्रज, और कहीं कहीं तो मराठी भाषा का भी प्रयोग किया गया है. हो सकता है की कुछ शब्द इसके अतिरिक्त अन्य भाषाओँ में से भी लिया गया हो. जैन साधु प्रगाढ़ पांडित्य के साथ अपनी भ्रमणशीलता के कारण विभिन्न प्रदेशों की भाषा और बोलियों से परिचित होते थे और उनका काव्यों में यात्र तत्र उपयोग करने में नहीं हिचकते थे.

साधुकीर्ति शास्त्रज्ञ होने के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत के भी मर्मज्ञ विद्वान्इ थे. तत्कालीन लब्ध प्रतिष्ठ गायक एवं अकबर के नवरत्नों में से एक तानसेन से भी आपका घनिष्ठ परिचय था. सत्रह भेदी पूजा में उन्होंने अनेक राग-रागिनियों का इस्तेमाल किया है साथ ही संगीत की बारीकियां बतानेवाले कई श्लोक व पदों का भी समावेश इसमें किया है. यदि इसे पुराणी शास्त्रीय रागों में गा कर उसकी CD बना ली जाए तो ये काम बहुत उपयोगी होगा एवं जैन संस्कृति के संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

भक्ति के माध्यम से होनेवाली संवर-निर्जरा के प्रसंग और कारणों की भी पूजा में संदर्भानुसार व्याख्या की गई है. द्रव्य पूजा किस प्रकार भाव पूजा में रूपांतरित होती है उसे भी दर्शाया गया है. उपरोक्त विभिन्न कारणों से सत्रह भेदी पूजा का अर्थ करना एक दुरूह काम है. परंतु इस काम को करने की मेरी भावना मुझे लगातार इस काम को करने प्रेरणा देती रहती है.

मेरी ईस भावना में सहयोगी बनी मेरी धर्मपत्नी ममता और उसके साथ अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विधिकारक श्री यशवंत गोलेच्छा। उन दोनों ने कहा की आप मौखिक अर्थ करें और हम उसे लिख लेंगे। इस तरह इस पर काम करना चालु हुआ. मैं इन दोनों का आभारी हूँ जिन्होंने इस सुन्दर काम में मुझे निरंतर सहयोग दिया।

अभी कुछ दिनों पहले एक सुन्दर संयोग हुआ जिससे यह काम तेजी से आगे बढ़ गया. आगम मर्मज्ञा विदुषी साध्वी स्व. प्रवर्तिनी श्री सज्जन श्री जी महाराज की सुशिष्या एवं प्रवर्तिनी श्री शशिप्रभा श्री जी महाराज की अज्ञानुवर्तिनी विदुषी साध्वी श्री सौम्यगुणा श्री जी, डी. लिट्, का बाड़मेर चातुर्मास था और एक शिविर में पढ़ाने के लिए मैं वहाँ गया था. मैंने उनसे कहा की सत्रह भेदी पूजा का अर्थ किया जाए और उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दे दी. मैंने मौखिक अर्थ किया और साध्वी जी ने उसे लिखने का परिश्रम किया। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है की विदुषी साध्वी सौम्यगुणा श्री जी ने इस पूजा को अजीमगंज- कोल्कता में प्रचलित पुराणी रागों में गया है जिसे यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं. जहाँ पर सटीक अर्थ नहीं बैठ रहा था या जिन शब्दों का अर्थ समझ में नहीं आ रहा था उनकी एक सूची बना ली.

अब विभिन्न माध्यमों से उन अनजाने-अनसमझे शब्दों के अर्थों की तलाश शुरू हुई और इस कार्य में मनीषी मूर्धन्य श्री सुरेंद्र जी बोथरा का पूर्ण मार्गदर्शन मुझे प्राप्त हो रहा है. आवश्यकतानुसार अन्य विद्वानों से भी सहयोग लिया जाएगा। जिन शब्दों के अर्थ और सन्दर्भ फिर भी नहीं समझ में आएगा उन्हें इस ब्लॉग में विद्वानों के लिए पोस्ट कर दिया जाएगा जिससे किसी को भी अगर अर्थ मालूम हो तो वो मुझे बता सकें। मुझे विश्वास है की आप सभी के सहयोग से जल्दी ही ये काम पूरा हो जायेगा।

आनंदघनजी पर पुस्तक का विमोचन हंगरी दूतावास में


ज्योति कोठारी
जयपुर
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Thursday, December 15, 2016

जयपुर में खरतर गच्छीय मेरुरत्नसागर जी की दीक्षा संपन्न


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जयपुर के मानसरोवर स्थित मीरा मार्ग जैन मंदिर में खरतर गच्छीय प् पू गणिवर्य श्री मणिरत्न सागर जी महाराज एवं तपागच्छीय महत्तर साध्वी श्री सुमंगला श्री जी की शिष्या श्री कुसुमप्रभा श्री जी महाराज आदि ठाना  की निश्रा में बाड़मेर (हाल इरोड) निवासी श्री मोहनलाल जी बोथरा (पुत्र श्री आशुलाल जी एवं श्रीमती सीतादेवी) की छोटी दीक्षा संपन्न हुई. दीक्षा के पश्चात् दीक्षाप्रदाता गुरु गणिवर्य श्री मणिरत्न सागर जी ने  नवदीक्षित मुनि को श्री मेरुरत्नसागर का नाम दिया। नामकरण की बोली श्री महेश जी महमवाल ने ली. यह सभी कार्यक्रम खरतर गच्छाधिपति प् पू श्री मणिप्रभ सूरीश्वर जी महाराज की आज्ञा से संपन्न हुआ.

मेरुरत्नसागर जी को दीक्षा विधि कराते हुए गणिवर्य श्री मणिरत्न सागर जी 
मानसरोवर स्थित श्री आदिनाथ जिनमंदिर एवं निर्माणाधीन दादाबाड़ी प्रांगण में १० दिसम्बर २०१६, मौन एकादशी को प्रातः काल शुभ मुहूर्त में दीक्षा विधि प्रारम्भ हुई एवं गणिवर्य श्री ने स्वयं यह विधि सम्पूर्ण करवाई। सर्वप्रथम कार्यक्रम का शुभारम्भ करते हुए मानसरोवर संघ के मंत्री श्री महेश जी महमवाल ने आगंतुकों का स्वागत किया एवं ऐसा शुभ अवसर प्रदान करने के लिए गणिवर्य श्री  का आभार व्यक्त किया।

मेरुरत्नसागर जी प्रवचन देते हुए साथ में गणिवर्य श्री मणिरत्न सागर जी
दीक्षार्थी भाई के धर्म के माता पिता बने श्री चिमन भाई रंजनबेन मेहता। यहाँ यह उल्लेखनीय है की श्री चिमनभाई स्वयं मुमुक्षु हैं.  उपस्थित श्री संघ द्वारा प्रदत्त ओघा गणिवर्य द्वारा दीक्षार्थी मुनि के हाथ में  प्रदान किया गया; ओघा ले कर नृत्य करते हुए मुनि के जयकारे से पूरा पंडाल गूंज उठा. कार्यक्रम संचालन ओसवाल परिषद्, जयपुर के मंत्री एवं खरतरगच्छ संघ के पूर्व मंत्री ज्योति कोठारी कर रहे थे।

मेरुरत्नसागर जी दीक्षा के वेश में 
इस अवसर को श्री अविनाश जी शर्मा द्वारा टीवी प्रोग्राम के लिए सूट किया गया.  मुल्तान खरतर गच्छ संघ के मंत्री श्री नेमकुमार जी जैन, मालवीयनगर संघ के मंत्री श्री मनोज बुरड़, नित्यानंदनगर संघ के अध्यक्ष श्री हरीश जी पल्लीवाल, श्यामनगर संघ के श्री विजय जी चोरडिया,  आदि जयपुर के विभिन्न संघों के पदाधिकारियों ने सभा को संबोधित किया एवं मुनि श्री के संयम ग्रहण की अनुमोदन की. इसके अतिरिक्त गुड मॉर्निंग अखबार के संपादक श्री सुरेंद्र जी जैन, मानसरोवर संघ के पूर्वमंत्री श्री नरेंद्रराज दुगड़,  सैनिक कल्याण परिषद् के अध्यक्ष श्री प्रेम सिंह जी राजपूत, शंखेश्वर मंदिर  के श्री शालिभद्र हरखावत, धर्म पिता श्री चिमन  एवं माता श्री रंजन बेन, खरतर गच्छ युवा परिषद् के श्री पदम् चौधरी, एवं संयम की भावना रखनेवाले संयम जैन ने भी सभा को संबोधित किया।

अखिल भारतीय खरतर गच्छ प्रतिनिधि महासभा की और से काम्बली ओढाते हुए श्री ज्योति कोठारी ने नवदीक्षित मुनि के सुदीर्घ आगमोक्त मुनिजीवन के लिए शुभकामनाएं दी. उपस्थित अन्य संघों की और से भी मुनि श्री को काम्बली ओढाई गई.

मुम्बई से पधारे हुए श्री दामोदर जी पल्लीवाल, भरतपुर से श्री भूपत जी जैन, सोनीपत से श्री सुब्रत जी जैन, मंडावर से श्री महावीरजी जैन आदि बहार से पधारे हुए गणमान्य व्यक्तियों ने भी सभा को संबोधित किया।

अपने उद्बोधन में गणिवर्य श्री ने बताया की श्री मोहनलाल जी सुदीर्घ काल से धर्माराधना कर रहे हैं एवं उनकी दीक्षा के समय भी वे सारथी बने थे. आपने अपने जीवन में उपधान  आराधना भी  प्रति दिन बियासने का तप करते हैं.  नवदीक्षित मुनि श्री मेरुरत्नसागर जी ने बताया की दस महीने पहले ही उनकी दीक्षा होनेवाली थी परंतु कुछ कारणों से यह उस समय संभव नहीं हो पाया। उन्होंने यह भी बताया की जीवन की क्षणभंगुरता की याद दिला कर किस प्रकार उन्होंने परिवारजनो की स्वीकृति प्राप्त की और खरतर गच्छाधिपति श्री मणिप्रभ सूरीश्वर जी महाराज की आज्ञा एवं गणिवर्य के कर कमलों द्वारा आज यह शुभ अवसर प्राप्त हुआ।  इसके बाद तपागच्छीय महत्तरा साध्वी श्री सुमंगला श्री जी की  शिष्य कुसुमप्रभा श्री जी महाराज ने भी सभा को संबोधित किया और कहा की गणिवर्य श्री का व्यवहार ही उन्हें यहाँ तक खेंच के लाया है।

अंत में संघ की उपाध्यक्षा चंद्रकांता जी ने सभी का आभार व्यक्त किया।

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