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Monday, May 30, 2016

अल्पसंख्यकों के लिए राज्य सरकार का १०० करोड़ का बजट : अतिरिक्त मुख्य सचिव


Additional Chief secretary Rajasthan and Secretary Rajasthan Chamber of Commerce at Vardhaman Infotech
दर्शन कोठारी, के एल जैन एवं विपिन चन्द्र शर्मा छात्रों के साथ
श्री विपिन चन्द्र शर्मा, अतिरिक्त मुख्य सचिव राजस्थान सरकार ने कहा की सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए प्रति वर्ष १०० करोड़ का बजट रखा है. श्री शर्मा ३० मई को वर्धमान इंफोटेक द्वारा आयोजित  उद्यमिता एवं प्रवंधन कौशल विकास कार्यक्रम के उद्घाटन के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे. ज्ञातव्य तथ्य ये है की जैन समाज अल्पसंख्यक वर्ग में आता है. इस अवसर पर उन्होंने कहा की प्रभु के प्रति समर्पण, गुरु की आज्ञा का पालन एवं माता पिता की सेवा ये तीन चीजें ऐसी है जो किसी को सफल उद्यमी बनाती है.

वर्धमान इंफोटेक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी दर्शन कोठारी ने बताया की यह कार्यक्रम मेगा डिजिटल प्रोजेक्ट क्योरसिटी के साथ मिल कर किया जा रहा है. इस डिजिटल प्रोजेक्ट में ६ लाख चिकित्सकों का डेटा तैयार किया जा रहा है और उसे मरीजों के लिए उपलव्ध कराया जायेगा। क्योरसिटी के नीरज ने क्योरसिटी मेगा प्रोजेक्ट के बारे में बताते हुए कहा की किस तरह से इसका काम चल रहा है. उन्होंने दर्शन कोठारी के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा की उनके तकनीकी एवं व्यापारिक ज्ञान की वजह से ही इस प्रोजेक्ट में गति आई है.

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राजस्थान चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के मानद सचिव श्री के एल जैन ने कहा की सफल उद्यमी एवं प्रवन्धक बनने के लिए विनम्र व समर्पित रहना एवं सदा पोसिटिव सोच रखना अति आवश्यक है. क्योरसिटी के मार्केटिंग अधिकारी दिवस कायथ ने कार्यक्रम का सञ्चालन किया एवं अंत में श्री ज्योति कोठारी ने सभी को धन्यवाद अर्पित किया।

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Monday, April 25, 2016

Popular questions about Jainism in Google search


24 Tirthankara in a Jain symbol 

Jain Tirthankara idol 
I found these three questions very popular in Google search about Jainism and prompted to answer. These three popular questions are as follow:

1. What is the religion Jainism?
2. Who is the founder of Jainism in India?
3. What are the basic beliefs of Jainism?

I am trying to answer all three one by one.
 
1. The first question is What is the religion Jainism?

The word Jain is derived from "Jina" a Sanskrit word, that means conqueror. One, who has conquered one self, one's cravings, desires, anger, greed etc is a Jina. A Jina, after achieving omniscience, preaches the path of liberation. One who follows Jina's preaching is a Jain and doctrine o a Jina is Jainism.

2.  The second question is Who is the founder of Jainism in India?

Jainism is eternal. Hence, there is no question of any founder. However, "Tirthankara" reestablish and restrengthen basic principles of Jainism from time to time and those reestablishing the Dharma are called founder many times.

Rishabhdev Adinath is the first Tirthankara in this Avasarpini era (Half-time-cycle according to Jain faith) and Lord Mahavira is the 24th and last. Rishabhdev is a prehistoric figure whereas Mahavira is well known to modern historians. Rishabhdev is a founder of Jainism for laymen and many one mistakes Mahavira as a founder of Jainism in India.

3. The third question is What are the basic beliefs of Jainism?

As I indicated in first answer that basic goal of Jainism is liberation, liberation from all sorrows by eliminating all Karma bondage. Jainism believes that an individual Atman (Soul) moves in birth cycles and face miseries due to ignorance (Mithyatwa-Ajnyan). When that mundane soul comes into contact of an omniscient or an enlightened person and have faith on that enlightened; the mundane soul starts getting wisdom. Gradually, by virtue of A. Right view 2. Right knowledge and 3. Right conduct, he or she liberates himself or herself.

1. Ahimsa 2. Satya 3. Asteya 4. Brahmacharya and 5. Aparigraha are main five vows (Vrata) related to right conduct.


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Sunday, April 24, 2016

जयपुर के मोहनबाड़ी में महाप्रभाविक भक्तामर महापूजन का आयोजन


मोहनवाड़ी में निर्माणाधीन जैन मंदिर का प्रारूप


ऋषभ प्रसाद का नक्शा


मोहनवाड़ी में निर्माणाधीन जैन मंदिर का प्रारूप २ 
कल दिनांक २३ अप्रैल २०१६ को जयपुर के मोहनबाड़ी में निर्माणाधीन श्री आदिनाथ जिनालय के प्रथम पाषाण का मुहूर्त संपन्न हुआ. प्रातः ६ बजे मंत्रोच्चारण के साथ श्रीमती प्रेमबाई कमलचंद सुराणा परिवार के द्वारा प्रथम शिला रखी गई.

प्रातः ९ बजे से महाप्रभाविक भक्तामर महापूजन का आयोजन रखा गया जिसमे लगभग ३०० जोड़ों ने बैठ कर पूजा भक्ति का लाभ लिया।  इस अवसर पर नृत्य गीत आदि के माध्यम से भगवान् श्री ऋषभ देव की भक्ति की गई. विधिकारक श्री यशवंत गोलेच्छा ने विधि-विधान का सम्पूर्ण कार्यक्रम संपन्न करवाया।

इस अवसर पर जैन विद्वान ज्योति कोठारी ने भक्तामर स्तोत्र के विशिष्ट एवं अन्तर्निहित अर्थों पर प्रकाश डाला। उन्होंने अनेक आगमों के उद्धरणों से परमात्मा के पांचों कल्याणकों का सम्वन्ध भक्तामर स्तोत्र की गाथाओं से जोड़ते हुए सारगर्भित तरीके से परमात्मा, भक्तामर स्तोत्र एवं भक्ति की विवेचना की.

 ज्योति कोठारी ने परमात्मा के आगे भक्तिवश नृत्य का महत्व बताते हुए कहा की हमारा अहंकार ही हमें प्रभु के आगे नृत्य करने से रोकता है और जो व्यक्ति जिनेश्वर देव के आगे नहीं नाचता सम्पूर्ण संसार उसे अपने इशारों पर नाचता है जबकि प्रभु के आगे नृत्य करने से व्यक्ति अहंकार और पाप कर्म के वंधनो से मुक्त होता है. उनके आह्वान पर उपस्थित सम्पूर्ण जनसमुदाय ने खड़े हो कर प्रभु के आगे नृत्य कर जिन भक्ति प्रदर्शित की.

यह सम्पूर्ण कार्यक्रम प पू मरुधर ज्योति साध्वी श्री मणिप्रभा श्री जी की निश्रा में संपन्न हुआ. प पू साध्वी श्री विद्युतप्रभा श्री जी एवं प पू साध्वी श्री हेमप्रज्ञा श्री जी ने अपने मधुर गायन से सबको मन्त्र मुग्ध किया। कार्यक्रम के अंत में साधर्मी वात्सल्य का आयोजन किया गया जिसमे बड़ी संख्या में लोग सम्मिलित हुए. इस कार्यक्रम को सफल बनाने में श्री प्रकश चन्द लोढ़ा का विशेष योगदान रहा.


आइये हम सब मिलकर पानी बचाएं, इसका दुरूपयोग बंद करें

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Wednesday, April 13, 2016

पानी बचाने के लिए जैन समाज आगे आए और अपना धर्म निभाये



कटगोला जैन मंदिर में तालाव, मुर्शिदाबाद 

जैन दादाबाड़ी में तालाव, कोलकाता 

जैन समाज से मेरा निवेदन है की पानी  बचाने के लिए आगे आए और अपना धर्म निभाये। देश आज पानी के भयंकर संकट  गुजर रहा है. देश के १० राज्य सूखाग्रस्त घोषित हो चुके हैं. देश के सर्वोच्च न्यायालय एवं कई उच्च न्यायालयों ने केंद्र एवं राज्य सरकारों को सूखे का संज्ञान लेकर त्वरित कार्यवाही करने  के लिए कहा है. मुंबई उच्च न्यायालय ने IPL के १३ मैचों को सूखे के कारण महाराष्ट्र  से बाहर कराने का आदेश दिया है. लातूर लोग पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं और सरकारों को रेल भर भर कर वहां पानी भेजना पड़ रहा है.

जैन धर्म ही एकमात्र ऐसा धर्म है जिसमे पानी में जीव एवं पानी बहांने में जीव-हिंसा का पाप माना गया है और इसीलिए जैन लोग धार्मिक कारण से (परम्परागत रूप से) पानी का कम इस्तेमाल करते रहे हैं. परन्तु ऐसा देखने में आ रहा है की आज के जैन लोग भी पानी बचाने में उतने तत्पर नहीं रहे. मारवाड़ी समाज में कहावत थी  पानी को घी से भी ज्यादा संभल  खर्च करना चाहिये पर आज इस समाज में भी खूब पानी ढोला जाता है. आज जैन एवं मारवाड़ी समाज भी अन्य समाजों के जैसे पानी का दुरूपयोग करने लगा है.

पानी के महत्व को समझते हुए हमें फिर से अपनी पुरानी परम्पराओं को पुनर्जीवित करना है और जल-संरक्षण के महत्व को समझना है. जैन समाज इस नए सामाजिक क्रांति का अग्रणी बन सकता है. मौसम विभाग ने इस वर्ष अच्छे मानसून की भविष्यवाणी की है यदि हम अभी से सचेत हो कर जल-संरक्षण की अपनी पुराणी विधाओं का इस्तेमाल करें तो आनेवाले कई वर्षों तक हमें पानी के लिए तरसना नहीं पड़ेगा.

अनेक दादावाडियाँ, नसियां, आदि जैन समाज की धरोहर हैं जहाँ पर्याप्त जमीन है. इन स्थानों पर तालाव, कुएं, टांके आदि का निर्माण करवा कर  वर्षा जल संरक्षित किया जा सकता है. इन कामों के लिए तकनीक सहज ही उपलव्ध है, साथ ही इसमें अनेक तरह की सरकारी मदद भी मिलती है. केंद्र सरकार ने इस वर्ष के बजट में इस काम के लिए बहुत बड़ी राशि का प्रवन्ध भी किया है.

आइये हम सब मिलकर पानी बचाएं, इसका दुरूपयोग बंद करें एवं प्रकृति से प्राप्त इस अमूल्य धन को सहेजने का प्रयत्न करें। जैन समाज इस कार्य में अग्रणी बने यही भावना है.

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Thursday, April 7, 2016

जैन समाज एवं सुचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में व्यापार की सम्भावनाएं


जैन समाज एक प्रगतिशील, विचारवान, शिक्षित एवं समृद्ध समाज है. अपने परिश्रम, लगन एवं सूझबूझ से इस समाज ने समृद्धि के शिखर को छुआ है. अमेरिकी इतिहासकार पॉल डुंडस ने एक जगह ओसवाल जैन समाज के बारे में लिखा है की राजस्थान के सूखे मरुस्थल से खली हाथ चला हुआ इस समाज का वणिक वर्ग------------- कुछ ही वर्षों में गंगा-यमुना डेल्टा की आधी संपत्ति पर कब्ज़ा जमा लिया था. उस समय भारत ही नहीं पुरे विश्व का सबसे धनाढ्य परिवार था जगत सेठ परिवार। दिल्ली के मुग़ल बादशाह भी अक्सर उनके कर्जदार हुआ करते थे.  बीसवीं सदी के प्रथमार्ध तक भारत के व्यापार जगत में ओसवाल जैन समाज का दवदवा था परन्तु स्वतंत्रता के बाद से ही व्यापार जगत में ओसवाल समाज कमजोर होने लगा. यद्यपि यह समाज आज भी समृद्ध है परन्तु अन्य समजो के मुकाबले यह पिछड़ने लगा है.

बीसवीं सदी के शुरुआत से ही जब भारत में यांत्रिकीकरण होने लगा और भारतीय व्यापारी उसमे भागीदारी करने लगे- जैन समाज ने केवल व्यापार में ही रूचि ली और बहुत ही कम संख्या में जैन व्यापारिक घरानों ने उद्योग लगाने की राह पकड़ी। इसका फल ये हुआ पारसी, माहेश्वरी, अग्रवाल आदि समाज के लोगों में से बड़े औद्योगिल घरानों की स्थापना हुई और जैन समाज के लोग मात्र उन औद्योगिक घरानों के वितरक बन कर रह गए. हाँ, हीरा उद्योग एक ऐसा उद्योग था जिस पर जैन समाज की गहरी पकड़ थी और १९६० के दशक से आज तक केवल हीरा ही नहीं अपितु सम्पूर्ण रत्न एवं आभूषण उद्योग में जैन समाज का ही वर्चस्व है.

बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में भारत की अर्थनीति ने फिर से एक नई दिशा पकडी. पुरे विश्व में सुचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की धूम थी. भारत में भी इसकी बयार आने लगी. कई नए उद्यमियों ने इस क्षेत्र  में प्रवेश किया। विप्रो, इनफ़ोसिस, टीसीएस जैसी कई बड़ी बड़ी कम्पनियाँ इस क्षेत्र की की दिग्गज के रूप में सामने आई. सैंकड़ो की संख्या में माध्यम दर्ज़ की और हज़ारों छोटी कंपनियों का भी आगाज हुआ. आज सुचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में लाखों की संख्या में कम्पनियाँ कार्यरत है और लगातार उज्वल भविष्य की और बढ़ रहीं हैं.

दिल्ली, मुंबई, पुणे, बंगलुरु, हैदराबाद, जैसी पारम्परिक शहरों के साथ अहमदाबाद, जयपुर, इंदौर, कोल्कता आदि शहर भी इस क्षेत्र की प्रगति से अछूते नहीं रहे. गौरतलब है की इन सभी शहरों में जैन समाज का काफी वर्चस्व है और यहाँ पर जैन समाज के बड़े व्यवसायिक घराने लम्बे समय से कार्यरत हैं. इसके बाबजूद आश्चर्य की बात ये है की सुचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में जैन व्यापारियों ने कोई विशेष कदम नहीं रखा. सही में कहा जाये तो जैन व्यापारी इस क्षेत्र की ताक़त आंकने में चूक गए.

२०१४ में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नै सरकार बनने के बाद इस उद्योग की तरक्की और भी तेज़ हो गई क्योंकि सरकार ने डिजिटल इंडिया का सपना साकार करने को अपना लक्ष्य बना लिया। अभी भी समय है, जैन व्यापारियों को अपने परंपरागत रवैय्ये को छोड़ कर नए क्षेत्रों की ओर भी ध्यान देना चाहिए, अन्यथा वो दिन दूर नहीं जब जैन समाज देश के आर्थिक जगत में अपनी शक्ति खो बैठेगा।

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Monday, October 19, 2015

ऋषिमण्डल स्तोत्र व मन्त्र का अंतरंग गूढ़ रहस्य


ह्रीं- ऋषिमण्डल वीजमन्त्र 
श्री ऋषिमण्डल स्तोत्र एक महाप्रभाविक स्तोत्र है एवं इसकी महिमा अपरम्पार है. इस स्तोत्र के विधिपूर्वक पाठ करने से आठ महीने के अंदर ही महा तेजस्वी अर्हत बिम्ब के दर्शन होते हैं एवं उस बिम्ब के दर्शन करनेवाला साधक आठ भव के अंदर ही मोक्ष प्राप्त करता है. इसके साथ ही वह साधक सभी प्रकार के इहलोक / परलोक सम्वन्धी भय से भी मुक्त होता है और सभी सांसारिक सुख-समृद्धि भी प्राप्त करता है.

ऐसा क्यों होता है और इस स्तोत्र व मन्त्र में ऐसी क्या चीज है इसे जानने के लिए इस के अंतरंग गूढ़ रहस्य को जानना जरूरी है. स्वयं स्त्रोत्रकर्ता ने ऋषिमण्डल स्तोत्र की पहली दो गाथा में इसका उत्तर दे दिया है.

आद्यन्ताक्षर संलक्ष्यमक्षरम्, व्याप्य यत्स्थितम्
अग्निज्वाला समं नादम्, विंदू रेखा समन्वितम्।।

अग्निज्वाला समाक्रान्तम्, मनोमल विशोधकम्
देदिप्यमानम् हृत्पद्मे, तत्पदं नौमि निर्मलम।

गाथा रहस्य: संस्कृत भाषा एवं देवनागरी लिपि का आदि अर्थात प्रथम अक्षर "अ" एवं अंतीम अक्षर "ह" है तथा इन दोनों अक्षरों को जोड़ने से बनता है "अह". अ और ह के बीच में वर्णमाला के सभी अक्षर आ जाते हैं. और सम्पूर्ण शब्दावली इन्ही अक्षरों से बनती है. अर्थात जगत के समस्त पदार्थों को इन अक्षरों के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता है.

जैसे अंग्रेजी भाषा में "A to Z" का अर्थ होता है सब कुछ उसी प्रकार इन दोनों अक्षरों के बीच में रहे हुए अक्षरों के विन्यास से जो बन सकता है उसका अर्थ होता है सब कुछ. अंग्रेजी भाषा का "A to Z" हिंदी/संस्कृत के "अह" का पर्यायवाची है.

संस्कृत वर्णमाला में प वर्ग अर्थात प,फ, ब, भ, एवं  म, (व्यंजन) आकाश तत्व का द्योतक है एवं म विशुद्ध आकाश तत्व है. प वर्ग के उच्चारण करते समय मुह बंद हो जाता है. अह के साथ म जुड़ने से अहम् शब्द बनता है और यह बहुत ही महत्वपूर्ण शब्द है. यह अर्थात सम्पूर्ण जगत एवं म (आकाश तत्व), जैसे आकाश सभी को अपने में समां लेता है; और जैसे मुह बंद होने पर अंदर गई हुई चीज अंदर ही रह जाती है वैसे ही "अहम्" में व्यक्ति सब कुछ को अपने में समाते हुए महसूस करता है.

इसका गंभीर रहस्य ये है की अहं के विकार से ग्रस्त व्यक्ति ऐसा मानता एवं चाहता है की सम्पूर्ण जगत वही है और सारा जगत उसी के इर्दगिर्द घूमता रहे. ऐसी मानसिकता वाले जीव को अहंकारी या घमंडी भी कहा जाता है.  यही अहम जीव को संसार में परिभ्रमण करवाता है और मुक्ति का द्वार बंद कर देता है.

संस्कृत भाषा में र को अग्नीवीज माना गया है, जब इस अहं शब्द में रेफ की मात्रा जुड़ जाती है तो "अर्हम" शब्द बन जाता है और जैसे अग्नि सब कुछ भस्म कर देती है उसी प्रकार अहम् में रेफ लगने का अर्थ होता है अहंकार का भष्म होना। अहंकार नष्ट होने पर ही जीव अर्हम बन जाता है अर्थात जगत पूज्य वीतराग अरिहंत हो जाता है. उसके सभी दुःख समाप्त हो जाते हैं.

ऋषिमण्डल स्तोत्र में यही दुर्लभ रहस्य छुपा हुआ है और जो व्यक्ति इसे हृदयंगम कर अपने अहम को नष्ट करता हुआ चलता है उसे किसी भी वस्तु की आकांक्षा नहीं रहती, आकांक्षा से रहित वह व्यक्ति सर्वत्र निर्भय हो कर विचरण करता है, पापबंध से रहित वह पुण्यात्मा जगत में सुख व समृद्धि प्राप्त करता है और अंत में मोक्ष रूप शास्वत सुख का वरण करता है. सम्पूर्ण कर्म का क्षय कर, समस्त दुखों से निवृत्त वह जीव परम शांति को प्राप्त होता है.

ऋषिमण्डल मन्त्र भी अरहंत के आश्रय से बना हुआ है एवं सिद्धचक्र का वीज उसमे समाहित है अतः उसके निरंतर जप, मनन, ध्यान, एवं निदिध्यासन से जीव सर्वकर्म रहित हो कर सिद्धि गति का वरण करता है. ऋषिमण्डल स्तोत्र व मन्त्र के रहस्य को इस प्रकार जान कर निरंतर इसके अभ्यास में दत्त चित्त होना इसलोक एवं परलोक के लिए श्रेयष्कर है.

जैन साधू साध्विओं के चातुर्मास की शास्त्रीय (आगमिक) विधि


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Friday, October 9, 2015

यांत्रिक कत्लखानों- मांस निर्यात के विरोध में आंदोलन ६ दिसंबर से

श्री श्री रविशंकर, जगतगुरु शंकराचार्य एवं मुनि श्री मैत्रीप्रभसागर 
प पू  जीवदया प्रेमी मुनि श्री मैत्रीप्रभ सागर जी महाराज यांत्रिक कत्लखानों एवं मांस निर्यात के विरोध में ६ दिसंबर से आंदोलन करेंगे. यह घोषणा उन्होंने कल ८ अक्टूबर को जयपुर के सवाई मनसिंह इन्वेस्टमेंट ग्राउंड से "हिन्दू आध्यात्मिक एवं सेवा मेला" के उदघाटन अवसर पर किया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा आयोजित इस मेले के उद्घाटन के अवसर पर संघ के सह सर कार्यवाहक डा कृष्णगोपाल, प्रमुख चिंतक एस गुरुमूर्ति, सेवा भारती के प्रमुख श्री गुणवंत जी कोठारी सहित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनेक पदाधिकारी मौजूद थे।  इस के अतिरिक्त देशभर से आये हुए सनातन हिन्दू धर्म के पूज्य शंकराचार्य एवं अनेक अन्य संत व बौद्ध, सिख आदि धर्मो के अनेक धर्मगुरुओं के साथ आर्ट ऑफ़ लिविंग के प्रणेता श्री श्री रविशंकर भी मंच पर आसीन थे.

ऐसे विशिष्ट अवसर एवं गणमान्य लोगों व ५० हज़ार से अधिक जनता के बीच मुनि श्री मैत्रीप्रभ सागर जी ने यह घोषणा की. उन्होंने यांत्रिक कत्लखानो से होनेवाले नुक्सान से लोगों को अवगत कराया और कहा की भारत से मांस निर्यात पर पूर्ण प्रतिवंध होना चाहिए। इसे अंजाम देने के लिए उन्होंने भगवन महावीर के दीक्षा दिवस (६ दिसम्बर, २०१५) से जयपुर से अान्दोलन प्रारम्भ करने की घोषणा की. जीवदया प्रेमी मुनि श्री मैत्रीप्रभ सागर जी के आह्वान का उपस्थित मंचासीन संतों एवं विशाल जनसमूह ने करतल ध्वनि से स्वागत किया।

उल्लेखनीय है की  मुनि श्री मैत्रीप्रभ सागर जी ने यांत्रिक कत्लखानों के विरोध में अनेक बार अनशन किया है एवं उनके सद-प्रयासों से उत्तरप्रदेश में आठ एवं राजस्थान के दूदू में एक कत्लखाने को निरस्त किया गया. आप का जीवन अत्यंत त्याग तपस्यामय है एवं जीवन का मुख्य उद्देश्य जीवदया है. भगवान महावीर के "अहिंसा परमो धर्मः" के सिद्धांत के आधार पर चलनेवाले यह मुनि खरतर गच्छीय गणाधीश श्री मणिप्रभ सागर जी के शिष्य हैं एवं आपकी तीन सांसारिक बहाने व एक भतीजी ने भी भगवती दीक्षा अंगीकार कर साध्वियों के रूप में विचरण कर रही हैं.

हम मुनि श्री के इस प्रयास की पुनः पुनः अनुमोदना करते हैं एवं सभी जीवदया प्रेमी महानुभावों से निवेदन करते हैं की इस आंदोलन को सफल बनाने में तन मन धन से योगदान करें।

Ravishankar inaugurated Hindu Spiritual and Service Fair in Jaipur


ज्योति कोठारी,
संयोजक,
सकल जैन समाज, जयपुर

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