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Thursday, May 24, 2018

जैन साधु साध्वी, जैन समाज एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

सार संक्षेप:  मात्र कुछ हज़ार समर्पित प्रचारकों के सहारे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) देश के सांस्कृतिक और राजनैतिक पटल को बदल सकता है तो फिर १५ हजार त्यागी, तपस्वी, विद्वान, पैदल विहारी जैन साधु साध्वी क्या देश से मांस निर्यात भी नहीं रोक सकते?

जैन साधु साध्वी एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 

 महावीर के पूर्णकालिक जीवनदानी स्वयंसेवक, विश्व वन्धुत्व की भावना से काम करने वाले, आत्मसाधना और निःस्वार्थ सेवा के भाव से निरंतर चलनेवाले जैन साधु-साध्वी भगवंत सम्पूर्ण समाज को दिशा देने में सक्षम हैं. आज के इस विषम काल में भी १४-१५ हज़ार जैन श्रमण-श्रमणी वृन्द भारत में विचरण कर रहे हैं. इस बात में कोई संशय नहीं है की संयमी तपस्वियों की इतनी बड़ी संख्या बहुत बड़ी क्रांति लाने में सक्षम है.

इस लेख का ये एक पहलु है दूसरी ओर हमने देश के सांस्कृतिक और राजनैतिक पटल पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को उभरते हुए देखा है. आज देश के प्रधान मंत्री से लेकर अनेक राज्यों के मुख्यमंत्री और राज्यपाल भी इस संस्था की देन हैं. अनेकों मंत्री, सांसद, विधायक अदि भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हैं. राष्ट्रीय ही नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में उनकी भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है. ये सबकुछ संभव हो सका है कुछ हज़ार प्रचारकों और बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों के कारण जो अपनी विचारधारा में टीके रहकर लगातार अपना काम करते रहते हैं. वे संघर्ष करते हैं, साथ जुटाते हैं, और जरुरत पड़ने पर अकेले ही चल देते हैं.

 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यक्रम में रविशंकर जी के साथ जैन मुनि मैत्रिप्रभ सागर  
मांस निर्यात: अहिंसा की धरती भारत पर कलंक

जैन साधु साध्वी गण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारकों से भी अधिक कठोर और त्यागमय जीवन जीते हैं. निरंतर पैदल चलने के कारन उनका जनसम्पर्क भी संघ के प्रचारकों से ज्यादा होता है. फिर क्या कारण है की इतनी बड़ी संख्या में त्यागी तपस्वी साधक प्रचारकों के होने के बाबजूद हम भारत से मांस निर्यात तक नहीं रोक पाए? जबकि अहिंसा हमारा प्रथम धर्म है. आज भी देश में हज़ारों की संख्या में यांत्रिक कत्लखाने हैं और खरबों रुपये का मांस निर्यात होता है. सबसे शर्मनाक बात तो ये है की महावीर और बुद्ध की यह धरती, हमारा महान भारत देश, दुनिया में मांस का सबसे बड़ा निर्यातक बन कर उभरा है. क्या हम इस कलंक को धो सकेंगे?

यांत्रिक कत्लखाने का लोमहर्षक दृश्य 
जैन साधु साध्वियों का बिहार एवं जैन व जैनेतर समाज पर उनका प्रभाव 

जैन साधु साध्वी साल में ८ महीने लगातार परिभ्रमण करते रहते हैं और इस दौरान बड़े नगरों से लेकर छोटे छोटे गाँव ढाणियों तक के लोगों से उनका संपर्क होता है. समाज के अमीर गरीब, बच्चे बूढ़े, महिला पुरुष सभी वर्गों से उनकी मुलाकात और बातचीत होती है. इस प्रकार उन्हें देश और समाज से जुड़े सभी पहलुओं की जमीन से जुडी हक़ीक़तों का ज्ञान हो जाता है. उन्हें समाज में होनेवाली घटनाओं और चलने वाली गतिविधियों का भी पता होता है. समाज में कौन सी अच्छाइयां है और क्या बुराइयां पनप रही है ये भी उन्हें मालूम होता है.  केवल धार्मिक ही नहीं अपितु व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, अदि सभी पहलुओं पर उनकी मजबूत पकड़ होती है और वे उनकी जड़ों पर प्रहार करने की क्षमता भी रखते हैं.

जैन साधुओं का विहार 
विहार और तपस्या के बीच निरंतर स्वाध्याय से उनका ज्ञान भी बढ़ता रहता है और अनेकों साधु साध्वी चलती फिरती लाइब्रेरी बन जाते हैं. आगम और शास्त्रों का ज्ञान निजी अनुभव से मिलकर और भी तीक्ष्ण और उपयोगी बन जाता है. उनके त्याग तप के कारण सभी समाजों में उनका आदर होता है. जैन समाज ही नहीं अपितु सर्व समाज के लिए उनका योगदान प्रशंसनीय है.

जैन साध्वियों का विहार 
भगवान महावीर एवं परवर्ती आचार्यों का राजसत्ता पर प्रभाव

महाविरोत्तर युग में प्रभावक आचार्यों ने सदा ही राजसत्ता को प्रभावित किया है और उन् पर धर्म का अंकुश बना कर रखा है. उनके ज्ञान और चारित्रवल के आगे सम्राट हमेशा नतमस्तक रहा है. जनमानस पर भी उनका व्यापक प्रभाव रहा है और इस कारण कोई राजा या सम्राट उनकी अवहेलना करने का साहस नहीं कर पाता था.

सम्राट श्रेणिक पर भगवान् महावीर का गहरा प्रभाव था और उसके बाद के युगों में मगध सम्राट चन्द्रगुप्त ने १४ पूर्वाधर अंतिम श्रुतकेवली भद्रवाहु स्वामी से दीक्षा ली थी.

श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी की गुफा 
महाविरोत्तर युग के प्रभावक आचार्य

महापद्मनंद के महामंत्री के पुत्र स्थुलीभद्र आर्य सम्भूति विजय के पास दीक्षित हुए थे. आर्य सुहस्ती एवं आर्य महगिरि के प्रभाव में था सम्राट सम्प्रति का जीवन जिन्होंने जिन धर्म की महती प्रभावना की थी. कालिकाचार्य ने अत्याचारी गर्दभिल्ल राजा के खिलाफ सेना संगृहीत कर उसका अंत किया था और सिद्धसेन दिवाकर ने अठारह देशों के अधिपति उज्जयनी के सम्राट विक्रमादित्य को प्रतिबोध किया था. उड़ीसा में महाराजा खारवेल जैन धर्म के अनुयायी थे और उन्होंने खंडगिरि और उदयगिरि की प्रसिद्द गुफाओं का निर्माण करवाया था.

कल्पसूत्र में स्थुलभद्र का प्राचीन चित्र  
दक्षिण के कर्णाटक प्रान्त में महाराजा चामुण्डराय को कौन नहीं जनता जिन्होंने गोम्मटेश्वर बाहुवली की प्रतिमा का निर्माण करवाया. गुजरात के निर्माण एवं एकीकरण में कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य की भूमिका की तुलना भारत के एकीकरण में चाणक्य की भूमिका से की जाती है. गुजरात नरेश सिद्धराज जय सिंह  पर उनका प्रभाव सर्वविदित है और पाटन नरेश कुमारपाल तो उनके साक्षात् शिष्य ही थे. यह महाराजा कुमारपाल का ही प्रभाव है की आज भी गुजरात देश के सबसे अहिंसक राज्यों में गिना जाता है.

कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य

मध्य एवं मुग़ल काल के प्रभावशाली जैन आचार्य

पाटन नरेश दुर्लभराज ने जिनेश्वर सूरी को "खरतर" की उपाधि से सन्मानित किया था. उनकी परंपरा में अभयदेव सूरी, वल्लभ सूरी, प्रथम दादा श्री जिनदत्त सूरी आदि ने मारवाड़ के अनेक राजाओं को प्रतिबोध कर जैन धर्म अंगीकार करवाया. उन्होंने सिसोदिया, सोलंकी, चौहान, भाटी, पमार, राठोड आदि अनेक वंशों के राजाओं को जैन धर्मानुयायी बनाया. दिल्लीश्वर मदनपाल ने जिनदत्त सूरी के शिष्य द्वितीय दादा मणिधारी जिनचन्द्र सूरी की आज्ञा शिरोधार्य की थी और मदनपाल के निमंत्रण पर ही वे योगिनीपुर (दिल्ली का तत्कालीन नाम) भी पधारे थे.

बादशाह मोहम्मद बिन तुग़लक़ जिनप्रभ सूरी को अपना गुरु मानता था. मुग़ल सम्राट अकबर पर जगतगुरु हीरविजय सूरी एवं चौथे दादा श्री जिनचन्द्र सूरी का प्रत्यक्ष प्रभाव था. इन आचार्यों से प्रभावित हो कर उसने अपने पुरे राज्य में साल में छह महीने अकता (जीवहत्या निषेध) की घोषणा की थी एवं सम्मेतशिखर का पहाड़ (पारसनाथ) यावत्चन्द्र्दिवाकरौ श्वेताम्बर जैनों के नाम कर दिया था. मुग़ल बादशाह जहांगीर जिनचन्द्र सूरी को बड़े गुरु के नाम से सम्वोधित करता था और उसने भी अकबर के अकता सम्वन्धी फरमानों को नए सिरे से जारी किया था. यदि मुग़ल बादशाह अकबर जीवहत्या के विरोध में फरमान जारी कर सकता है तो क्या आज की प्रजातान्त्रिक सरकार मांस निर्यात पर प्रतिवंध नहीं लगा सकती?

अकबर को प्रतिबोध करते हुए चतुर्थ दादा श्री जिन चंद्र सूरी

जैन श्रमण: आत्मसाधना एवं लोक कल्याण का समन्वय

इस प्रकार प्राचीनकाल से ले कर मध्ययुग तक जैन आचार्यों / मुनियों ने सम्राटों, राजाओं, मंत्रियों को अपनी आत्मसाधना, ज्ञान और चारित्र वल से प्रभावित किया, अहिंसा का उद्घोष कराया और जयवंत जिनशासन की प्रभावना की. यहाँ प्रश्न उठता है की जैन साधु अत्मसाधक होते हैं तो फिर उन्हें संसारी कार्यों से क्या लेना देना? जैन श्रमण जब आत्म साधना नहीं करते तब क्या करते हैं या उन्हें क्या करना चाहिए? वास्तविकता ये है की कोई भी व्यक्ति लगातार आत्मसाधना नहीं कर सकता और जब आत्मसाधना नहीं करते तब जिनधर्म की आराधना और लोकोपकार के कार्य करते हैं. सम्राटों का आचार्यों के चरणों में झुकना उनके अहंकार के लिए नहीं अपितु लोक कल्याण के लिए होता है. आचार्यों का प्रभाव राजाओं और सम्राटों को सुशासन और लोककल्याण के लिए प्रेरित करता है, उन्हें कुमार्ग से हटाकर सन्मार्ग पर स्थापित करता है.

वीडियो जैन धर्म में अहिंसा: महावीर की कथा

 वर्त्तमान के सभी जैनाचार्यों, मुनियों से मेरा निवेदन है की इस दिशा में विचार करें और संगठित हो कर अपने संयम और तपोवल से देश, समाज और राजनीती को नई दिशा दें. समाज के श्रेष्ठि वर्ग भी यदि अपने नाम के पीछे न भाग कर ऐसे कार्यों में श्रमण समुदाय का सहयोग करे तो इस उत्तम कार्य को गति मिलेगी. हम अपने अपने संप्रदाय, गच्छ, मत-मतान्तर की संकीर्णता भूलकर इस वृहत्तर यज्ञ में अपना योगदान करें. अपने अपने संप्रदाय की मान्यताओं को अपने धर्मस्थानों (मंदिर, उपाश्रय, स्थानक आदि) तक ही सीमित रखें, एक दूसरे की आलोचना न करें और महावीर के मूल सिद्धांतों जैसे अहिंसा, करुणा, अनेकांत अदि को प्रसारित करने में अपना योगदान करें.

सशक्त और समृद्धिशाली जैन समाज

जैन समुदाय एक सशक्त और समृद्धिशाली समाज है. इस समाज की साक्षरता दर देश में सबसे अधिक है और देश की समृद्धि में सर्वाधिक योगदान है. धार्मिक एवं सेवाकार्यों में दान देने की प्रवृत्ति भी है. जैन समाज प्रतिवर्ष खरबों रूपये धार्मिक आयोजनों में खर्च भी करता है परन्तु अफ़सोस की बात है की देश के सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक क्षितिज में जैनो का प्रभाव नगण्य ही है.

प्रमुख जैन उद्योगपति गौतम अडानी 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सीख

मैं पुनः अपनी मूल बात पर आता हूँ की हमे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सीखना चाहिए की किस तरह उन्होंने कम पैसे खर्च कर भी देश की सांस्कृतिक उन्नति में अपना योगदान किया और अंततः राजनैतिक वर्चस्व भी प्राप्त किया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देश को दो दो यशस्वी प्रधानमंत्री भी दिए. हम भी एक वर्ष के लिए अपना एजेंडा तय कर लें और अपने सभी संसाधनों को उस दिशा में मोड़ दें. अहिंसा हमारा मुख्य धर्म है और पशुओं के क़त्ल को रोकने की दिशा में हमारा यह प्रयत्न हो तो कितना अच्छा होगा. कम से कम देश में नए कत्लखाने न खुलें, जो खुले हुए हैं वो बंद हो और अग्रणी मांस निर्यातक होने का जो कलंक इस महान भारत देश पर है वो मिट जाये.

वीडियो गुरु गोलवलकर जी का उद्वोधन - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 

इस काम के लिए जैन साधु साध्वियों और श्रावक श्राविकाओं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सीख ले कर उनके जैसे काम करना चाहिए या नहीं इस बात पर अवश्य विचार करें.


राजस्थान में खून की नदी न बहाने दें


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Tuesday, January 30, 2018

श्री महावीर स्वामी मंदिर, कोलकाता का सार्ध शताब्दी महोत्सव सम्पन्न


श्री महावीर स्वामी मंदिर, कोलकाता का त्रिदिवसीय सार्ध शताब्दी महोत्सव अत्यंत उल्लासपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। स्थानीय जनों के अतिरिक्त जयपुर, चेन्नई, अहमदाबाद, दिल्ली, होसपेट, बेंगलुरु, मुम्बई, रायपुर, गोवा, वाराणसी, कच्छ, पुणे, चंद्रपुर, पटना,भागलपुर, अजीमगंज, जियागंज आदि स्थानों के गणमान्य व्यक्तियों ने पधार कर प्रभु भक्ति का लाभ लिया।

श्री महावीर स्वामी मंदिर कोलकाता 
26 जनवरी सायंकाल वीर मंडल, कोलकाता ने भक्ति संगीत पेश किया। वीर मंडल कोलकाता के प्रसिद्द मंडलों में से है जिनके संगीत की धूम पुरे भारत में है. साथ ही चेन्नई से पधारे श्री गौतम जैन व जयपुर से पधारे श्री प्रितेश शाह एवं ज्योति कोठारी ने भी स्थानीय कलाकारों श्री वीरेंद्र कोठारी, श्री किशोर सेठिया के साथ अपनी प्रस्तुति दी।

27 जनवरी प्रतिष्ठा दिवस के उपलक्ष्य में प्रातः काल सत्रह भेदी पूजा पढ़ाई गई, 9 वीं ध्वजपूजा के अवसर पर विधिवत शिखर पर ध्वज चढ़ाया गया। विधिकारक श्री मुल्तान चन्द जी सुराणा ने सम्पूर्ण विधि विधान सम्पन्न करवाया। परम पूज्या साध्वी श्री रत्ननिधि श्री जी, पुण्यनिधि श्री जी के सान्निध्य में होने वाले इस कार्यक्रम मे सभी ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। श्री किशोर सेठिया, अंकित चोरडिया एवं मोहित बोथरा ने शास्त्रीय रागों पर आधारित पूजा पढ़ाई। श्रीमद राजचंद्र सत्संग मंडल, हम्पी, कर्नाटक ने भी भक्तिरस की सरिता बहाई। मंदिर की मुख्य ट्रस्टी 95 वर्षीया श्रीमती पुतुल कोठारी ने अत्यंत रुग्णावस्था के बाबजूद ध्वजारोहण में पधार कर अपने दृढ़ मनोवल का परिचय दिया।

कार्यक्रम संयोजक ज्योति कोठारी ने आगमों के उद्धरणों से पूजा, ध्वजारोहण एवं प्रभुभक्ति का महत्व समझाया। उन्होंने यह भी बताया की चतुर्थ दादागुरु देव श्री जिन चंद्रसूरी के विद्यागुरु, तानसेन के समकालीन उपाध्याय साधुकीर्ति उद्भट विद्वान व शास्त्रीय संगीत के ज्ञाता थे. सत्रह भेदी पूजा साधुकीर्ति की विशिष्ट रचना है जिसकी आजसे ४५० वर्ष पूर्व रचना की गई. उनकी प्रेरणा से भक्ति का ऐसा समां बांध की उपस्थित अपार जनमेदिनी झूम उठी और घंटों तक लोग प्रभु भक्ति में झूमते रहे। एक भी पैर ऐसा न था जो थिरका न हो। समारोह के विशिष्ट अतिथि अखिल भारतीय खरतरगच्छ प्रतिनिधि महासभा के अध्यक्ष 90 वर्षीय श्री मोतीलाल जी झाबक और मंत्री श्री संतोष जी गोलेच्छा भी नृत्य किये बिना न रह सके। पूजा के दौरान वासक्षेप, गुलाबजल, व पुष्प ही नही अपितु मोती की भी वर्षा की गई।

श्री मनीष जी नाहरमोहित जी सुराणा एवं अमित जी श्रीमाल ने परमात्मा की भव्य अंगरचना की. कार्यक्रम के दौरान तीनों दिन किये गए फूलों की आंगी की सभी ने भूरी भूरी प्रशंसा की. पूजन पश्चात् साधर्मी वात्सल्य का आयोजन किया गया.

सायंकाल सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया।  सर्वप्रथम श्रीमती रुमु लोढ़ा, चंद्रपुर ने मंगलाचरण कर कार्यक्रम की शुरुआत की. विशिष्ट अतिथियों ने भगवान् महावीर के प्राचीन चित्र के सामने दीप प्रज्वलन किया. केंद्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य (केंद्रीय राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त) श्री सुनील जी सिंघी की अध्यक्षता में सभा प्रारम्भ हुई। श्री झाबक जी के अतिरिक्त जयपुर से पधारे हुए आगम मर्मज्ञ श्री सुरेन्द्र जी बोथरा, एसियाटिक सोसाइटी ऑफ इंडिया के प्रोफेसर अरुण बैनर्जी, इंडियन म्यूज़ियम, कोलकाता के निदेशक श्री राजेश पुरोहित विशिष्ट अतिथियों की पंक्ति को शोभायमान कर रहे थे।

 मंदिर के निर्माता परिवार के सदस्य डॉक्टर कुमार बहादुर सिंह, वयोवृद्ध श्री विमान जी श्रीमाल, बद्रीदास बहादुर मुकीम परिवार के वरिष्ठ सदस्य श्री चंचल कुमार सिंह मुक़ीम, कोलकाता पंचायती मंदिर के मंत्री श्री सुशील राय सुराणा, एवं खरतर गच्छ संघ, कोलकाता के अध्यक्ष श्री विनोद चन्द जी बोथरा  ने माल्यार्पण कर अतिथियों का स्वागत किया। सभी अतिथियों को सार्ध शताब्दी महोत्सव पर निकाले गए चांदी का सिक्का भी भेंट किया गया.

 न्यूयॉर्क से पधारे श्री इन्द्र रायचौधरी के सितार और वहीं से पधारे उच्छल बैनर्जी के तबले की जुगलबंदी में  राग खंबाज में प्रस्तुत दी। उनके साथ जर्मनी से पधारे ने गिटार में संगत किया. प्रस्तुति इतनी मनमोहक व सटीक थी कि उपस्थित श्रोतागण वाह वाह कर रहे थे और वन्स मोर वन्स मोर कर पुनः पुनः प्रस्तुति देने के लिए मजबूर कर रहे थे। श्री जिन दत्त सूरी महिला मंडल, कोलकाता ने भी एक भजन प्रस्तुत किया.

 इस अवसर पर आगम मर्मज्ञ विद्वतवर्य श्री सुरेंद्र जी बोथरा ने 'मौन की प्राचीर से" नाम की भगवान महावीर पर स्वरचित कविता का पाठ किया एवं उपस्थित श्रोताओं को आगम के कुछ गुढ़ रहस्य समझाये। श्री बोथरा जी अब तक अनेक आगमों का अंग्रेजी अनुवाद कर चुके हैं।

कुशल संस्कार कुंज के लगभग 40 बालक बालिकाओं ने मिलकर भगवान महावीर के जीवन की रूपरेखा प्रस्तुत की। नन्हे नन्हे बालकों की सुंदर एवं समयोपयोगी प्रस्तुति की सराहना किये बिना कोई नही रह सका।

इसके साथ ही इस दिन एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्यक्रम  "बंगाल के जैन मंदिर: एक शोध परियोजना"का शुभारंभ भी किया गया। इंडियन म्यूजियम के निदेशक श्री राजेश पुरोहित ने परियोजना का शुभारम्भ करते हुए इस परियोजना में हर तरह का सहयोग देने का आश्वासन दिया।

 इस परियोजना के निदेशक जैन इतिहासज्ञ श्री डॉक्टर शिवप्रसाद जी ने महावीर स्वामी मंदिर एवं इसके निर्माता श्री सुखलाल जी जौहरी से संवंधित इतिहास की जानकारी दी। श्री दीपंकर वैरागी ने बंगाली भाषा मे भगवान महावीर पर कविता पाठ किया।

अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री सुनील जी सिंघी ने जैन समुदाय को अल्पसंख्यक समुदाय के दर्जे से मिलनेवाले लाभ बताते हुए कहा कि समाजके धरोहरों के संरक्षण में आयोग महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कर रहा है। उन्होंने उपस्थित समुदाय से आग्रह किया कि सरकार द्वारा प्रदत्त सुविधाओं का लाभ उठाएं। उन्होंने स्वयं को जिनशासन का सेवक बताते हुए इस सम्वन्ध में सभी प्रकार की सहायता करने का वचन दिया।  कार्यक्रम का संचालन गौतम दी जैन, चेन्नई ने किया एवं ज्योति कोठारी ने धन्यवाद अर्पित किया.

२८ तारिख प्रातःकाल स्नात्र पूजा, शांति स्नात्र एवं दोपहर को दादागुरु देव की पूजा पढाई गई. पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री श्री साधन पाण्डे की धर्मपत्नी श्रीमती शुप्ति पाण्डे विशेष अतिथि के रूप में पधारीं. वे पश्चिम बंगाल सरकार में एजुकेसन कमिटी की सदस्य भी हैं. उन्होंने वर्त्तमान समय की अशान्ति एवं भोगवाद के वातावरण से निकलने के लिए जैन धर्म को एक श्रेष्ठ मार्ग बताया. उन्होंने व्यक्तिगत बातचीत में जैन-जैनेतर सभी के लिए जैन धर्म की कक्षाएं प्रारम्भ करने की प्रेरणा दी और इस सन्दर्भ में सभी प्रकार का सहयोग देने का वादा किया.

इस प्रकार यह भव्य समारोह सानंद संपन्न हुआ.

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Monday, January 22, 2018

बंगाल के जैन मंदिर: एक शोध परियोजना



Jain Temples in Bengal- A Research Project 

Our Associates

Asiatic Society of India        L D Institute           Indian Museum
     Kolkata                     Ahmadabad                 Kolkata

बंगाल के जैन मंदिर: एक शोध परियोजना 

तीर्थंकर महावीर स्वामी 

यह एक सर्वविदित तथ्य है की भगवान महावीर ने बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में परिभ्रमण किया था. वर्धमान और वीरभूम इन दोनों जिलों का नाम इस बात के प्रमाण के रूप में आज भी विद्यमान है  भगवान महावीर के १३०० वर्ष बाद तक भी जैन धर्म बंगाल के प्रमुख धर्मों में से एक रहा लेकिन ईसा की ७वीं शताब्दी के बाद से बंगाल में इसका क्षरण प्रारम्भ हुआ तथा यहाँ पर यह लुप्तप्राय हो गया। 

वीरभूम 

वर्धमान



 बंगाल, बिहार और उत्तरप्रदेश से लुप्त होता हुआ जैन धर्म दक्षिण भारत में पनपा और ईसा की ९वीं शताब्दी से यह गुजरात और राजस्थान में फलने-फूलने लगा। 

भांडाशाह मंदिर बीकानेर , राजस्थान 


जलमंदिर, बाबू देरासर, पालीताना 
 १७वीं-१८वीं सदी से राजस्थान के जैन वणिकगण फिर से बंगाल आने लगे और यहाँ पर जैन धर्म का उदयकाल पुनः प्रारंभ हुआ। नवाब मुर्शीदकुली खां के नजदीकी जगत सेठ के कारण जैन समाज का महत्व बढ़ने लगा और यहाँ से यह पुनरोदय सशक्त होने लगा।  

 तत्कालीन बंगाल सूबे की राजधानी मुर्शीदाबाद से कुछ ही मील की दुरी पर महिमापुर में जगत  सेठ ने पार्श्वनाथ भगवान् का कसौटी के पत्थर का भव्य जिनालय बनवाया।  

कसौटी का खम्भा, महिमापुर 


काठगोला का भव्य विशाल द्वार 
इसके बाद काशिमबाज़ार, दस्तुरहाट,  अजीमगंज, जियागंज, जंगीपुर आदि स्थानों में गोलेच्छा, दुगड़, मुणोत, नाहर, कोठारी, श्रीमाल, छजलानी आदि परिवारों ने अनेकों जिनमंदिर एवं दादाबाड़ियों का निर्माण करवाया।  

पंचतीर्थी- कीरतबाग, जियागंज 
श्री सम्भवनाथ मंदिर, जियागंज 
रत्नों की प्रतिमाएं, छोटी शांतिनाथ, अजीमगंज 
चौवीसी, रामबाग, अजीमगंज 

श्री पार्श्वनाथ, जंगीपुर 
स्फटिक चरण , दादाबाड़ी, अजीमगंज 
१९वीं सदी के पूर्वार्ध से ही अंग्रेजों की राजधानी होने के कारण कोलकाता का महत्व बढ़ने लगा और उत्तर प्रदेश एवं दिल्ली से जैन समाज के लोग यहाँ आ कर बसने लगे। इसके फल स्वरूप यहाँ जौहरी-साथ के धनाढ्य परिवारों ने कई मंदिरों का निर्माण करवाया।  इनमे टांक परिवार द्वारा निर्मित श्री शांतिनाथ स्वामी का पंचायती मंदिर, राय बद्रीदास बहादुर मुकीम द्वारा निर्मित विश्वप्रसिद्ध श्री शीतलनाथ स्वामी का मंदिर,

श्री शीतलनाथ स्वामी, कोलकाता 


राय बद्रीदास बहादुर मुकीम

श्री गणेशीलाल खारड़ द्वारा निर्मित श्री चंदाप्रभु स्वामी का मंदिर 
एवं श्री सुखलाल जौहरी कृत श्री महावीर स्वामी का मंदिर   विख्यात हैं।  


श्री महावीर स्वामी मन्दिर, कोलकाता का भव्य शिखर 
इन मंदिरों के निर्माण से पहले ही यहाँ एक भव्य दादाबाड़ी का निर्माण हो चूका था. 

कालान्तर में मुर्शिदाबाद से शहरवाली समाज के लोग कोलकाता आ कर बसने लगे और नाहर एवं दुगड़ परिवार ने भी यहाँ मंदिर का निर्माण करवाया।  इसके बाद गुजराती समाज व राजस्थान से आये हुए नए बसे जैनों ने (मारवाड़ी साथ) ने भी यहाँ कई मंदिरों का निर्माण करवाया।

जिनेश्वर सूरी भवन, कोलकाता 
 साथ ही बंगाल के कई अन्य स्थानों जैसे बोलपुर, दुर्गापुर, सैंथिया आदि में भी कई जिनमंदिर बने। इन मंदिरों के निर्माण एवं प्रतिष्ठा में साधु-साध्वियों के अतिरिक्त श्री पूज्यों एवं यतियों का भी विशेष योगदान रहा है.  


श्रीपुज्य जी श्री जिन विजयेन्द्र सूरी 


स्थापत्य एवं कला के अद्भुत नमूने ये सभी मंदिर जैन समाज की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर हैं परन्तु लम्बे समय से इन पर कोई शोध नहीं हुई  है।  


श्री वासुपूज्य स्वामी, अजीमगंज 

श्री नेमिनाथ मंदिर, अजीमगंज 

श्री नेमिनाथ स्वामी, अजीमगंज 
कांच का काम, श्री शीतलनाथ मंदिर, कोलकाता 

श्री नेमिनाथ स्वामी, अजीमगंज

श्री शीतलनाथ स्वामी, कोलकाता

 हमारी इस शोध परियोजना का उद्देश्य विगत तीन सौ वर्षों में बने इन मंदिरों के सम्वन्ध में ऐतिहासिक जानकारी जुटा कर उसे आम लोगों तक पहुंचाना है। जैन साहित्य में सामाजिक इतिहास का क्षेत्र लगभग परित्यक्त ही रहा है, इस दिशा  में भी शोध कार्य को आवश्यक महत्व मिले इस उद्देश्य से इन मदिरों के निर्माण और देख-रेख के कार्यों से जुड़े परिवारों से सम्बंधित इतिहास पर शोध कार्य को भी इस योजना में शामिल किया गया है। 




प्रमुख जैन इतिहासज्ञ वाराणसी के डा. श्री शिवप्रसाद जी ने इस गुरुतर कार्यभार को सँभालने की स्वीकृति दे कर हमें अनुगृहीत किया है, साथ ही देश विदेश के अनेक जानेमाने विद्वान भी इससे जुड़ चुके हैं। कोलकाता की प्रसिद्ध  एशियाटिक सोसाइटी एवं इंडियन म्यूजियम और अहमदाबाद की एल डी इंस्टिट्यूट ने भी परियोजना से जुड़कर हमारा हौसला बढ़ाया है। इसके लिए हम इन संस्थाओं के आभारी हैं। . 

कोलकाता का श्री महावीर स्वामी मंदिर भी इसी विरासत का एक अंग है जिसने आज अपने डेढ़ सौ वर्ष पूरे किए हैं। ऐसी शोध परियोजना प्रारम्भ करने का यह एक उत्तम अवसर है और हम आज इसे आपके समक्ष ला रहे हैं. हमें विश्वास है की इस महत्वाकांक्षी परियोजना में आप सबका  उदार सहयोग हमें निरंतर प्राप्त होगा।  





परियोजना निदेशक
 डा. शिवप्रसाद, वाराणसी
स्थापत्य एवं कला निदेशक
 डा. श्रीमती चंद्रमणि सिंह, पूर्व निदेशक, सिटी पैलेस म्यूजियम, जयपुर

सम्पादन सलाहकार: 
श्री सुरेंद्र बोथरा, जैन आगम मर्मज्ञ
प्रोफ़ेसर जॉन कोर्ट, डेनिसन विश्वविद्यालय, अमरीका 
प्रोफ़ेसर पीटर फ्लुगल, लन्दन विश्वविद्यालय, यू के 

 संयोजक
ज्योति कुमार कोठारी, जयपुर
२७ जनवरी २०१८

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Thursday, January 11, 2018

महावीर स्वामी मंदिर सार्ध शताब्दी पर मेडिकल कैम्प

 महावीर स्वामी मंदिर सार्ध शताब्दी पर मेडिकल कैम्प

Golden spire Mahavira Swami temple Kolkata
श्री महावीर स्वामी मंदिर कोलकाता 
श्री महावीर स्वामी मंदिर, कोलकाता के सार्ध शताब्दी महोत्सव (१५० वर्ष पूर्ति) के अवसर पर एक मेडिकल कैम्प भी आयोजित किया जायेगा. कोलकाता का खरतर गच्छ संघ इसे महोत्सव के अंतिम दिन २८ जनवरी, रविवार को आयोजित करने जा रहा है. संघ के अध्यक्ष श्री विनोदचंद जी बोथरा नियमित रूप से वर्षों से महावीर स्वामी मंदिर में पूजा एवं स्नात्र करने पधारते रहते हैं.

निःशुल्क मेडिकल कैम्प 
"सेवा" भगवान् महावीर के उपदेश का एक अभिन्न अंग है. समवशरण में देशना देते हुए (जैन आगम भगवती सूत्र में एक प्रश्न के उत्तर में) भगवान् ने कहा है की जो व्यक्ति दीं दुखियों की सेवा करता है वो मेरा सच्चा सेवक है और मेरी पूजा करने से भी अधिक फल प्राप्त करता है. सेवा वैयावच्च का ही एक रूप है और वैयावच्च  जैन धर्म के "वीस स्थानक" के वीस में से एक प्रमुख पद है.

Samavasharan painting at Mahavira Swami temple, Kolkata
महावीर स्वामी मंदिर कोलकाता में समवशरण का एक चित्र 

खरतर गच्छ संघ, कोलकाता ने मंदिर के सार्ध शताब्दी महोत्सव पर मेडिकल कैम्प आयोजित करने का निर्णय ले कर प्रभु की आज्ञा को ही क्रियान्वित किया है और इसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं.

इस मेडिकल कैम्प में कई विशेषज्ञ डाक्टरों की सेवाएं ली जाएगी और वे निःशुल्क मरीजों की जांच करेंगे. इससे लोगों को बहुत फायदा होगा, जैन समाज के कई जाने माने डाक्टर इस कैम्प में अपनी सेवाएं प्रदान करेंगे.

श्री महावीर स्वामी मंदिर, कोलकाता के सार्ध शताब्दी महोत्सव

महावीर स्वामी मंदिर के कार्यक्रम में पधारनेवाले अतिथियों का परिचय



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Friday, January 5, 2018

कोलकाता के प्राचीन जैन मंदिर

कोलकाता के प्राचीन जैन मंदिर 

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता १९ वीं एवं वीसवीं सदी में जैन धर्मावलम्वियों का प्रमुख केंद्र रहा है. इस समय में यहाँ अनेकों भव्य कलात्मक जैन मंदिरों का निर्माण हुआ. मुग़ल काल में मुर्शिदाबाद बंगाल की राजधानी थी एवं यह जैन समाज का प्रमुख केंद्र था परन्तु अंग्रेजों ने कोलकाता को अपना केंद्र बनाया और ब्रिटिश काल में जैनों की वस्ति भी मुर्शिदाबाद से धीरे धीरे कोलकाता पहुंचने लगी.

१९वीं सदी में लखनऊ से आये हुए श्रीमालोन का कोलकाता में वर्चस्व रहा और उनलोगों ने ४ जिनमंदिरों का निर्माण करवाया. आज् से दो सौ साल पहले सर्वप्रथम बड़ाबाजार (कलाकार स्ट्रीट) में टांक परिवार ने श्री शांतिनाथ स्वामी के मंदिर का निर्माण करवाया. यह मंदिर तुलपट्टी पंचायती मंदिर के नाम से विख्यात है. इसके साथ ही मानिकतल्ला में एक दादाबाड़ी का भी निर्माण करवाया गया था. यह पंचायती है और इसके निर्माता एवं निर्माण का समय ज्ञात नहीं है.

सन १८६७ में प्रसिद्द जौहरी राय बद्रीदास बहादुर मुकीम ने मानिकतल्ला में श्री शीतलनाथ स्वामी के  विश्वप्रसिद्ध मंदिर का निर्माण कराया. यह पारसनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है. यह पूरा मंदिर बेल्जियम कांच से बना हुआ है. इसके एक वर्ष बाद शीतलनाथ मंदिर के सामने एवं दादाबाड़ी के दाहिनी ओर सन १८६८ में सुखलाल जौहरी ने श्री महावीर स्वामी के विशाल मंदिर का निर्माण कराया. यह कोलकाता के सभी मंदिरों में सबसे बड़ा है इसलिए लगभग सभी बड़ी पुजाएँ यहीं पर होती है. इस मंदिर के रंगमंडप में ४०० से ५०० लोग बैठ सकते हैं.  इसी वर्ष २६ से २८ जनवरी तक इस मंदिर का सार्ध शताब्दी महोत्सव (१५० वर्ष)  मनाया जा रहा है.

महावीर स्वामी मंदिर के निर्माण के कुछ वर्ष बाद खारड़ परिवार ने श्री चंदाप्रभु स्वामी के मंदिर का निर्माण करवाया।  यह मंदिर भी भव्य एवं कलात्मक है.  मानिकतल्ला स्थित तीनों मंदिरों की विशेषता ये है की तीनो ही मंदिर काफी ऊंचाई पर बने हुए हैं और कई सीढ़ियां चढ़कर मंदिर में पंहुचा जा सकता है. तीनो हीहै. मंदिरों में परमात्मा की मनोहारी मूर्तियां है.

मुर्शिदाबाद से आये हुए शहरवाली समाज ने भी कोलकाता में मंदिरों का निर्माण करवाया. इंडियन मिरर स्ट्रीट, धर्मतल्ला में नाहर परिवार द्वारा निर्मित कुमार सिंह हॉल के मंदिर का १०० वर्ष अभी अभी पूरा हुआ है. दुगड़ परिवार का घर देहरासर धर्मतल्ला के ही क्रीक रो में अवस्थित है.

इन प्राचीन मंदिरों के अलावा कैनिंग स्ट्रीट एवं हेसम स्ट्रीट का जैन मंदिर भी लगभग ५० वर्ष पुराना है. उसके बाद कोलकाता में पिछले २०-२५ वर्षों में भी अनेकों जिन मन्दिर का निर्माण हुआ है.

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Wednesday, January 3, 2018

महावीर स्वामी मंदिर के कार्यक्रम में पधारनेवाले अतिथियों का परिचय

महावीर स्वामी मंदिर, कोलकाता के कार्यक्रम में पधारनेवाले अतिथियों का परिचय 

श्री महावीर स्वामी मंदिर, कोलकाता का सार्ध शताब्दी (१५० वर्ष) महोत्सव दिनांक २६ जनवरी से २८ जनवरी, २०१८ तक धूमधाम से मनाया जा रहा है. इस कार्यक्रम में देश मोदी के नजदीकी हैं. के अनेक गणमान्य व्यक्ति अतिथि के रूप में पधार रहे हैं. महोत्सव में पधारनेवाले अतिथियों का संक्षिप्त परिचय निम्नरूप है.

श्री साधन पाण्डे 
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री साधन पाण्डे पश्चिम बंगाल सरकार में उपभोक्ता संरक्षण एवं स्वरोजगार मंत्रालय में कैबिनेट स्तर के मंत्री हैं.  वे लोकप्रिय जनता हैं एवं कोलकाता से कई बार विधायक रह चुके हैं.



श्री सुनील जी सिंघी 

कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री सुनील जी सिंघी, अहमदाबाद कर रहे हैं. वे जैन समाज के गौरव हैं. गुजरात भाजपा में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके श्री सिंघी के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से घनिष्ठ सम्वन्ध है. राजनीति के अल्वा आप सामाजिक/ धार्मिक क्षेत्र में काफी सक्रीय रहे हैं. मूर्तिपूजक युवक महासंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष के रूप में आपने सराहनीय सेवाएं दी है.  केंद्रीय अल्पसंख्यक आयोग के माननीय सदस्य (केंद्रीय राज्यमंत्री का दर्ज़ा प्राप्त) श्री सिंघी प्रखर वक्ता के रूप में विख्यात हैं. 


Motilal Jhabak Raipur
श्री मोतीलाल जी झाबक 
विशिष्ट अतिथि श्री मोतीलाल जी झाबक वयोवृद्ध समाजसेवी एवं दानवीर हैं. अनेकों अस्पताल, एवं शिक्षण संस्थाएं उनके योगदान की ऋणी है. आपने अष्टापद तीर्थ (मालवा) में एक विशाल दादाबाड़ी का भी निर्माण करवाया है एवं वर्त्तमान में उस ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं. पालीताना में २ वर्ष पूर्व हुए खरतर गच्छ महासम्मेलन के आयोजन में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी. रायपुर निवासी सी झाबक जी अखिल भारतीय श्री जैन श्वेताम्बर खरतर गच्छ प्रतिनिधि महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. प्रतिनिधि महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री श्री संतोष जी गोलेच्छा भी आपके साथ पधार कर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाएंगे.  

Vimal Chand Surana Jaipur
श्री विमलचन्द जी सुराणा 
विशिष्ट अतिथि श्री विमलचन्द जी सुराणा वो नाम है जिसे भारतभर का जैन समाज जनता है. विलक्षण व्यापारिक प्रतिभा के धनी श्री सुराणा जी दानवीर एवं समाजसेवी होने के साथ ही विपश्यना ध्यान के वरिष्ठ आचार्य भी हैं. वे महावीर कैंसर हॉस्पिटल के मैनेजिंग ट्रस्टी, एस जे विद्यालय / महाविद्यालय समूह के संरक्षक हैं. खरतर गच्छ संघ, जयपुर एवं खरतर गच्छ महासंघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष रह चुके हैं. अन्य अनेक धार्मिक सामाजिक संस्थाओं के सञ्चालन में भी आपकी भूमिका रहती है. वर्त्तमान में वे राजस्थान प्रान्त से शेठ आनन्द जीकल्याणजी पेढ़ी के मानद प्रतिनिधि हैं. 


Surendra Bothra photograph by Brian Brazeal
श्री सुरेंद्र जी बोथरा 
विशिष्ट अतिथि श्री सुरेंद्र जी बोथरा जैन दर्शन के वरिष्ठतम विद्वानों में से हैं. आचारांग, भगवती, विपाक, उत्तराध्ययन, अनुयोगद्वार, नंदी जैसे अनेक आगमों का अंग्रेजी अनुवाद कर चुके हैं. इसके अतिरिक्त अनेक पुस्तकों का लेखन, सम्पादन, अनुवाद भी किया है. प्रचार प्रसार से दूर रहकर काम में डूबे रहनेवाले व्यक्ति श्री बोथरा जी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ विद्वान हैं. 

उपरोक्त अति विशिष्ट व्यक्तियों के अतिरिक्त चेन्नई के प्रसिद्द एस देवराज जैन परिवार के श्री गौतम जैन, प्रसिद्द जैन इतिहासकार एवं लेखक डा. शिवप्रसाद, वाराणसी, जयपुर के प्रसिद्द गायक श्री अनिल श्रीमाल, श्वेताम्बर जैन साप्ताहिक के संपादक श्री विजेंद्र सिंह लोढ़ा, आगरा, आदि अनेक गणमान्य व्यक्ति बाहर से पधार रहे हैं. इसके अतिरिक्त श्रीमद राजचन्द्र सत्संग मंडल, हम्पी, कर्णाटक के १२५ लोग भी महोत्सव में पधार कर अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे. कोलकाता के भी अनेक विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी लोग कार्यक्रम की शोभा बढ़ाएंगे. 


श्री महावीर स्वामी मंदिर, कोलकाता का सार्ध शताब्दी महोत्सव


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